अगर एक भी ब्यक्ति का खून न बहाने बाले बाला साहब ठाकरे को आदमखोर कहेंगे तो फिर सिंगूर में निर्दोश किसानों,मजदूरों,महिलाओं ,बच्चों का खून बहाने बालों को क्या कहेंगे । और उन लोगों को जिन्होंने माओबाद,नक्सलबाद के नाम पर अपनी राजनिती चमकाने के लिए लाखों हिन्दूओं के घर उजाड़ दिए।अगर ठाकरे जी आदमखोर हैं फिर इन बामपंथियों के लिए कौन सा शब्द प्रयोग करेंगे ।बेहतर हेगा अगर आप ऐसे शब्दों को आगे आने बाले बुरे बक्त के लिए बचाकर रखें नहीं तो बहुत मुसिकल होगी आपको अपनी राजनिति चमकाने के लिए और बहुत से मौके मिलने बाले हैं।
आपने गुजरात की बात की क्या आपको जानकारी है कि गुजरात में क्या हुआ ? याद करो कैसे 2000 मुसलमानों की भीड़ ने ईक्टठे होकर गोधरा के पास रेल को रोक कर 58 हिन्दूओं को जिन्दा जला दिया । इस मुसलमानों की भीड़ में गोधरा के तीन कांग्रेसी पार्षद भी सामिल थे । सारे देश को सांप सूंघ गया । हिन्दूओं को उमीद थी कि देश के सब राजनितीक व समाजिक दल एक स्वर से मुसमानों द्वारा की गई इस बरबरता का न केबल विरोध करेंगे पर साथ ही कातिलों के विरूध ठोस कार्याबाही की भी मांग करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं ।सेकुलर गिरोह सहित अनेक हिन्दूविरोधी संगठनों ने हिन्दूओं के इस नरसंहार के लिए हिन्दूओं को ही दोषी ठहराना शुरू कर दिया। आखिर संयम की भी एक सीमा होती है। जब हिन्दूओं ने हिन्दूओं के इतने बड़े नरसंहार के बाद भी कुछ सांसदों को इन मुसलिम कातिलों का पक्ष लेते सुना तो उनकी सब्र का बांद टूट गया ।सब हिन्दूओं ने उंच-नीच जात-पात सब भुलाकर इस मुसलिम हमले का एकजुटता से जबाब दिया जिसमें कुछ हिंसा हुई। अब आप जरा अपने विवेक का इस्तेमाल कर सोचो कि इस हिंसा की शुरूआत किसने की ।सपष्ट है मुसलमानों ने भरोसा नहीं तो हिंसा के दूसरे दिन के अखवार निकाल कर पढ़ो सब पता चल जाएगा ।अगर मुसलमान हिन्दूओं को जिन्दा न जलाते तो क्या ये सब होता नहीं न । पर अब हम आपसे पूछते हैं कि जब आप गुजरात का मुद्दा उठाते हैं तो फिर कश्मीर घाटी का मुद्दा क्यों छोड़ देते हो जिसमें हजारों हिन्दूओं का कत्ल करने के बाद लाखों हिन्दूओं को विस्थापित किया गया । हमने पहले भी लिखा था कि मुसमानों द्वारा की गई हिंसा के लिए मुसलमान उतने दोषी नहीं हैं जितने इस हिंसा को जायज ठहराने बाले दोसी हैं अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि आप(सुमन) भी उन में से एक हैं। आप लोग मुसलमानों द्वारा किए गय अपराधों के लिए हिन्दूओं को दोषी ठहराकर उनकी आने बाले बच्चों को गलत(आतंकवाद) रास्ते की ओर धकेलते हैं फिर वो या तोसुरक्षबलों के हाथों मारे जाते हैं या फिर आपस में लड़कर ।बेहतर होगा अगर आप लोग हिन्दूओं के अन्दर पायी जाने बाली सहनसीलता(जो हमारे जैसे लोगों में नहीं है) व सर्वधर्मसम्भाव को मुसलमानों तक पहुंचाए ताकि वो सहनशील बनें और शांति और भाईचारे से जीना सीखें ।उनको समझाओ राम और अल्हा भगवान के अलग-अलग नाम हैं।भगवान सबका एक है।पर आप लोग न केबल मुसलमानों को हिन्दूओं के विरूद्ध भड़का रहे हैं बल्कि साथ ही हिन्दूओं को जात-पात के नाम पर लड़ाने की कुचेष्ठा भी कर रहे हैं।
आपने कंधमाल की बात की ।क्या आपको जानकारी है वहां पर क्या हुआ ।जिस तरह गोधरा मुसलिम बहुल क्षेत्र है ठीक उसी तरह कंधमाल ईसाई बहुल क्षेत्र है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वहां पर एक हिन्दू संत स्वामी लक्षमणान्नद जी पिछले कई दसकों से बंचित हिन्दूओं की सेवा का कार्या कर रहे थे ।जिसकी बजह से इसाईयों को धर्मांत्रण करबाने में दिक्कतें आ रही थीं। ईसाईयों ने नौ बार हमला किया लेकिन सेबकों की चुस्ती की बजह से स्वामी जी बच गए। इस बार ईसाईयों ने भेष बदल कर हमला किया जिसमें 80 बर्षीय सन्त अपने सेवकों सहित मारे गए। आप सोचो जरा जो ब्यक्ति दशकों से सेवा के कार्या में लगा हो उसके कितने समर्थक होंगे ।उन समर्थकों का क्रोध आपे के बाहर हो गया जिसे स्थानीय प्रबुध हिन्दूओं ने नियन्त्रित किया बरना हालात और भी बदतर हो सकते थे। यहां पर भी ईसाईयों ने एक और चाल चली ये कहकर कि स्वामीलक्षमणान्नद जी का कत्ल माओवादियों ने किया है ताकि हिन्दू-हिन्दू से टकराए ।पर वो हिन्दू मेरी और आपकी तरह मुर्ख नहीं थे जो आपस में टकराते वो जानते थे कि जिन ईसाइयों ने नौ बार हमला किया है दसवीं बार भी हमला उन्हीं के द्वार किया गया है। वाकी सब ईसाईनियन्त्रित मिडीया का दुस्प्रचार था।
देख भाई सुमन अपनी सोच विल्कुल सपष्ट है कि किसी भी झगड़े के लिए दोषी उस झगड़े की शुरूआत करने बाला होता है न कि आत्मरक्षा में उसका प्रत्युतर दने बाला वो चाहे हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई कोई भी हो।कानून के अनुसार भी आत्मरक्षा का अधिकार हमें प्राप्त है और इस अधिकार का हम हर हाल में प्रयोग करेंगे ।आपके गाली-गलौच से हम ये अधिकार छोड़ने बाले नहीं ।बल्कि ये गाली गलौच हमें और ताकबर बनकर इस हमले का सामना करने की प्रेरणा देता है। बैसे भी जब कश्मीर में मुसलमानों ने हिन्दूओं का कत्लयाम किया तो आप जैसे मुसलमानों के ठेकेदारों को भी उन्होंने जिन्दा नहीं छोड़ा अगर छोड़ देते तो हम खुद भी आप जौसे बन जाते और अपने साथियों को भी आप जैसा बनने की प्रेरणा देते । काश ऐसा होता तो हम प्यार भाईचारे की बातें कर पाते । समझो हम मजबूर हैं जिस दिन ये मुसलिम आतंकवादी हमला करना छोड़ देंगे हम अपने आप शांत होकर अपने घर लौटकर शांति से जिन्दगी जीना चाहेंगे । क्या कभी ऐसा होगा ?
1 टिप्पणीयाँ: on "लोकसंघर्ष को सीधा उत्तर"
sunder sateek avm samayik sargrbhit rchna...badhayee
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