डेल्ही ब्लोग्गेर्स की इस छोटी सी ब्लागर मीट ने यह साबित कर दिया कि अगर दिल में खुलूस और सच्चाई हो तो नफ़रतों को दम तोड़ने में देर नहीं लगती।
Thursday, June 10, 2010
मौलाना वहीदुददीन खान साहब से किसी ने उनके लेक्चर के बाद सवाल किया कि मुसलमान मजहब के नाम पर इतनी नफरत क्यों करता है तो उन्होंने जवाब दिया कि आज आम मुसलमान कौमी तहजीब पर है इस्लाम पर नहीं। आप किसी से पूछिये कि क्या तुमने कभी खुदा से हिदायत की दुआ करके शुरू से आखिर तक एक बार भी पूरा कुरआन पढ़ा है ?
आपको नहीं मिलेगा। मैंने एक आर्टिकल के लिए पूरा कुरआन पढ़ा है।
मौलाना के संबोधन में इस बात का पूरा जवाब मौजूद है कि आज आदमी और आदमी के दरम्यान रिश्ते क्यों कमज़ोर पड़ रहे हैं और उसका हल क्या है ?
मौलाना के पास जाने का आकर्षण साथ जाने वालों की मौजूदगी ने और भी ज़्यादा बढ़ा दिया था। तारकेश्वर गिरी जी तो ख़ैर मुख्य आकर्षण थे। इस छोटी सी ब्लागर मीट ने यह साबित कर दिया कि अगर दिल में खुलूस और सच्चाई हो तो नफ़रतों को दम तोड़ने में देर नहीं लगती। इसी तजर्बे को समाज में बड़े पैमाने पर आज़माये जाने की ज़रूरत है।
17 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!:
SAHI HAI...
कश्मीर के मसले को भी मुसलमानों ने ही बिगाड़ा है। सन् 1949 में वल्र्ड वॉर सेकंड में जापान ने ओकिनावा जज़ीरे पर क़ब्ज़ा कर लिया। जापान के रिकन्सट्रक्शन के लिए वहां के रहनुमा ने 30 का एक प्रोग्राम बनाया। उसने ओकिनावा को वैसे ही छोड़ दिया। जापान इकॉनॉमिक सुपर पॉवर बनकर उभरा और 1972 में अमेरिका को वहां से अपना क़ब्ज़ा हटा लिया। इसे ‘डीलिंकिंग पॉलिसी‘ कहा जाता है।
पाकिस्तान को बिज़नेस की अपॉरचुनिटी पर ध्यान देना चाहिये और कश्मीर के मसले बातचीत के लिए मेज़ पर छोड़ देना चाहिये।
जापान ने सब्र किया और इकॉनॉमिक सुपर पॉवर बन गया और पाकिस्तान ने बेसब्री दिखायी और आज वह एक फ़ेल्ड स्टेट बनकर रह गया है। वह आज अमेरिका की मदद से चल रहा है।
यही हाल सददाम हुसैन का हुआ। 57 मुस्लिम देश हैं। सब जगह इस्राईल को सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है। मैं कहता हूं कि अरब देश अपनी ग़लत पॉलिसियों की क़ीमत अदा कर रहे हैं।
nice post .
मौलाना बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात कह रहे थे और मैं सोच रहा था कि यह सब आज एक सपना हो चुका है। आज जितने भी वाद हैं वे दरअस्ल विवाद हैं न कि विवादों का समाधान । सारे मसलों का हल सच को जानना और मानना है।
पदम भूषण मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान साहब की महफिल में एक दिन में क्या एक साल का ज्ञान मिल गया था,यकीन नहीं होता 4 घण्टे में इतनी अच्छी बातें सुनने को मिली थीं चार ब्लाग वाले सुना रहे हैं और खत्म नहीं हो रहीं हैं
यह बात तो वाकई बहुत ज़बरदस्त है कि
"अगर दिल में खुलूस और सच्चाई हो तो नफ़रतों को दम तोड़ने में देर नहीं लगती।"
नफरत तो मिटनी ही चाहिए
तुम नफरत मे सड़े लोग नफरत को बढ़ा सकते हो मिटा नही सकते ये सब तुम्हारी चाले है जिन्हे मै खूब समझता हूँ मैं तुम्हारी इस चाल को कभी सफल नही होने दूँगा यहाँ हमारा राज चला है हमारा ही चलेगा
""अगर दिल में खुलूस और सच्चाई हो तो नफ़रतों को दम तोड़ने में देर नहीं लगती। इसी तजर्बे को समाज में बड़े पैमाने पर आज़माये जाने की ज़रूरत है""
सौ टके की बात कहीं ..बढ़िया पोस्ट...
@त्यागी जी आप भी नफरत छोड़ दीजिए और सब्र के साथ ठंडे दिमाग से सोचे कि इस देश का नफरत मे भला है या प्यार मे?
हमने हाथ बढ़ाया और गिरी जी ने हमारे हाथो को चूम लिया प्यार देने से प्यार ही मिलता है वह हमसे ऐसे मिले जैसे कोई कुंभ मे बिछड़ा हुआ भाई मिला हो
Dr sahab se sahmat!!!!
प्यार बाँटते चलो यह कम नही होता बढ़ता है
Nice post .
वन्दे ईश्वरम मेँ भी देखिये मौलाना का मज़मून ।
sachmuch prem se badhkar kuch bhi nahi hai.
तारक ईश्वर ! तू दिल दे बैठा है मुल्लाओ को , निकल आ दलदल से । बखिया उधेड़ दे इनकी पहले की तरह ।
एक टिप्पणी भेजें