डा श्याम गुप्त की कविता..... कविता ..
बिस्तर पर था लेटा
मन में आया एक विचार;
कविता ऐसी लिखूं न जिसपर ,
हो मेरा अधिकार ।
खूब विचारा,
सोचा मन में,
और कलम भी तोड़ दिया;
गुस्से में आकर ऊपर से
पानी एक गिलास पिया|
सोचामन में -
चलूँ चांदनी के उपवन में;
वहां बनेगी अवश्य ,
एक कविता
भव्य भविता।
पहुंचा झट पट छत पर,
खाते हुए,
जीने के पत्येक मोड़ पर ,
एक एक टक्कर।
देखा, बेचारा चन्द्रमा तो
पीला पड़ चुका था; और-
शनैः शनैः डूबता था।
आया झट मन में विचार-
लिखूं , छायावादी कविता,
पर क्या है उसमें ,
कोरी भावुकता ।
मन के अंतर्द्वंद्व से
यह विचार-
उभरकर आया;
चेतना ने ,
जीवन की कविता -
लिखने को सुझाया।
'संसारी कविता लिखो,
जीवन-रस, श्रृंगार ।
सब वादों का वाद है ,
सभी रसों का सार ॥'
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मन में आया एक विचार;
कविता ऐसी लिखूं न जिसपर ,
हो मेरा अधिकार ।
खूब विचारा,
सोचा मन में,
और कलम भी तोड़ दिया;
गुस्से में आकर ऊपर से
पानी एक गिलास पिया|
सोचामन में -
चलूँ चांदनी के उपवन में;
वहां बनेगी अवश्य ,
एक कविता
भव्य भविता।
पहुंचा झट पट छत पर,
खाते हुए,
जीने के पत्येक मोड़ पर ,
एक एक टक्कर।
देखा, बेचारा चन्द्रमा तो
पीला पड़ चुका था; और-
शनैः शनैः डूबता था।
आया झट मन में विचार-
लिखूं , छायावादी कविता,
पर क्या है उसमें ,
कोरी भावुकता ।
मन के अंतर्द्वंद्व से
यह विचार-
उभरकर आया;
चेतना ने ,
जीवन की कविता -
लिखने को सुझाया।
'संसारी कविता लिखो,
जीवन-रस, श्रृंगार ।
सब वादों का वाद है ,
सभी रसों का सार ॥'

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