कविता---सार-असार संसार--डा श्याम गुप्त.......
सार- असार- संसार
( डा श्याम गुप्त )
जगत जीवन सार है निस्सार है ,
इसका कोइ ख़ास पैमाना नहीं |
हर किसी को स्वयं ही पहचान कर ,
अपना पैमाना बनाना चाहिए ।
जीते मरते तो सभी ही हैं मगर ,
जीना मरना सफ़ल उसका नाम है।
देश संस्क्रिति और दुनिया के लिये,
मर मिटे आये सभी के काम है ।
सत्य है, शिव है जो सुन्दर कर्म है,
सुखी जीवन का वही तो मर्म है।
जो जिये और मरे औरों के लिये,
बस यही तो नित्य मानव धर्म है।
जग तो परिवर्तन का ही आयाम है,
ज़िन्दगी सत्कर्म का ही नाम है।
सुख से जीना ज़िन्दगी का सार है,
यूं, जगत यह ’सार’ होना चाहिये।
लोभ लालच मोह से मन लिप्त है ,
शान्ति से सुख चैन से यदि रिक्त है।
जो स्वयम के लिये ही जीये मरे,
सुख की अति अभिलाषा ही आसक्ति है।
प्रेम की सुख शान्ति की फ़िर बात क्या,
ज़िन्दगी वह व्यर्थ का व्यापार है।
एसे जीवन-तथ्य में तो यह जगत,
सत्य ही ’ निस्सार’ होना चाहिये।
जगत जीवन सार है निस्सार है,
इसका कोई खास पैमाना नहीं।
हर किसी को कर्म से, पहचान कर,
अपना पैमाना बनाना चाहिये॥
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( डा श्याम गुप्त )
जगत जीवन सार है निस्सार है ,
इसका कोइ ख़ास पैमाना नहीं |
हर किसी को स्वयं ही पहचान कर ,
अपना पैमाना बनाना चाहिए ।
जीते मरते तो सभी ही हैं मगर ,
जीना मरना सफ़ल उसका नाम है।
देश संस्क्रिति और दुनिया के लिये,
मर मिटे आये सभी के काम है ।
सत्य है, शिव है जो सुन्दर कर्म है,
सुखी जीवन का वही तो मर्म है।
जो जिये और मरे औरों के लिये,
बस यही तो नित्य मानव धर्म है।
जग तो परिवर्तन का ही आयाम है,
ज़िन्दगी सत्कर्म का ही नाम है।
सुख से जीना ज़िन्दगी का सार है,
यूं, जगत यह ’सार’ होना चाहिये।
लोभ लालच मोह से मन लिप्त है ,
शान्ति से सुख चैन से यदि रिक्त है।
जो स्वयम के लिये ही जीये मरे,
सुख की अति अभिलाषा ही आसक्ति है।
प्रेम की सुख शान्ति की फ़िर बात क्या,
ज़िन्दगी वह व्यर्थ का व्यापार है।
एसे जीवन-तथ्य में तो यह जगत,
सत्य ही ’ निस्सार’ होना चाहिये।
जगत जीवन सार है निस्सार है,
इसका कोई खास पैमाना नहीं।
हर किसी को कर्म से, पहचान कर,
अपना पैमाना बनाना चाहिये॥

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