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सोमवार, जुलाई 12, 2010

सोमवार, जुलाई 12, 2010 2
भारत के उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी शंख क्षेत्र श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है। कलयुग में पूरी के श्री जगन्नाथ धाम की यात्रा की विशेष महता है| उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगन्नाथ जी ही माने जाते हैं। यहाँ के वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ जी हैं। इसी प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ से संपूर्ण जगत का उद्भव हुआ है। श्री जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों लाखों की संख्या में बाल वृद्ध युवा नारी देश विदेश के सुदूर प्रांतों से आते हैं। रथ यात्रा का प्रारंभ होने की कथा यह है कि राजा इंद्रद्युम्न जो सपरिवार नीलांचल सागर के पास रहते थे को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मंदिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली। महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी व्यर्थ दु:खी मत हो हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो। आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मंदिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथयात्रा बहन सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है। यहाँ की मूर्ति स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। कोणार्क का अद्भुत सूर्य मंदिर भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजा धौल-गिरि और उदय-गिरि की गुफ़ाएँ जैन मुनियों की तपस्थली खंड-गिरि की गुफ़ाएँ लिंग-राज साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ के मंदिर दर्शनीय है। पुरी और चंद्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा चंदन तालाब जनकपुर और नंदनकानन अभ्यारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है। शास्त्रों और पुराणों में भी रथ-यात्रा की महत्ता को स्वीकार किया गया है। स्कंद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि रथ-यात्रा में जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी का दर्शन करते हुए प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाते हैं वे सीधे भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं। जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं। भगवान जगन्नाथ तो पुरुषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम श्रीकृष्ण बुद्ध महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है। उनके अनेक नाम है वे पतित पावन हैं। रथयात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम उसके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा व सुदर्शन चक्र और अंत में गरुण ध्वज पर या नंदीघोष नाम के रथ पर श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं। बलभद्र जी का रथ तालध्वज कहलाता है और सुभद्रा जी का रथ को देवलन कहलाता है, जो जगन्नाथ जी के रथ से कुछ छोटे हैं। संध्या तक ये तीनों ही रथ मंदिर में जा पहुँचते हैं। अगले दिन भगवान रथ से उतर कर गुंडिचा मंदिर में प्रवेश करते हैं और सात दिन वहीं रहते हैं। गुंडीचा देवी (भगवान की मौसी) मंदिर में इन नौ दिनों में श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को आड़प-दर्शन कहा जाता है। श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतया प्रसाद ही कहा जाता है। श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला। कहते हैं कि महाप्रभु बल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुँचने पर मंदिर में ही किसी ने प्रसाद दे दिया। महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया और उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव प्राप्त हुआ। नारियल लाई गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से इस दिन मिलता है। मौसी बाड़ी ( गुंडिचा देवी के मंदिर) में भगवान जगन्नाथ दसों अवतार का रूप धारण करते हैं, विभिन्न धर्मो और मतों के भक्तों को समान रूप से दर्शन देकर तृप्त करते हैं। इस समय उनका व्यवहार सामान्य मनुष्यों जैसा होता है। यह स्थान जगन्नाथ जी की मौसी का है। लक्ष्मी जी जिनको भगवान बिना बताए अपनी मौसी के घर आ जाते हैं, रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को भगवान जगन्नाथ को ढूँढ़ते यहाँ आती हैं। तब भगवान जगन्नाथ के सेवक दरवाज़ा बंद कर देते हैं जिससे लक्ष्मी जी नाराज़ होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और हेरा गोहिरी साही पुरी का एक मुहल्ला जहाँ लक्ष्मी जी का मंदिर है वहां लौट जाती हैं। बाद में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं। उनसे क्षमा माँगकर और अनेक प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। लक्ष्मी जी को भगवान जगन्नाथ के द्वारा मना लिए जाने को विजय का प्रतीक मानकर इस दिन को विजयादशमी और वापसी को बोहतड़ी गोंचा कहा जाता है। रथयात्रा में पारम्परिक सद्भाव सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भूत समन्वय देखने को मिलता है। श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा में भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा या रुक्मिणी नहीं होतीं बल्कि बलराम और सुभद्रा होते हैं। उसकी कथा कुछ इस प्रकार प्रचलित है - द्वारिका में श्री कृष्ण रुक्मिणी आदि राज महिषियों के साथ शयन करते हुए एक रात निद्रा में अचानक राधे-राधे बोल पड़े। महारानियों को आश्चर्य हुआ। जागने पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं होने दिया लेकिन रुक्मिणी ने अन्य रानियों से वार्ता की कि सुनते हैं वृंदावन में राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु ने हम सबकी इतनी सेवा निष्ठा भक्ति के बाद भी नहीं भुलाया है। राधा की श्रीकृष्ण के साथ रहस्यात्मक रास लीलाओं के बारे में माता रोहिणी भली प्रकार जानती थीं। उनसे जानकारी प्राप्त करने के लिए सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की। पहले तो माता रोहिणी ने टालना चाहा लेकिन महारानियों के हठ करने पर कहा ठीक है। सुनो सुभद्रा को पहले पहरे पर बिठा दो कोई अंदर न आने पाए भले ही बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों। माता रोहिणी के कथा शुरू करते ही श्री कृष्ण और बलराम अचानक अंत:पुर की ओर आते दिखाई दिए। सुभद्रा ने उचित कारण बता कर द्वार पर उन दोनों को ही रोक लिया। अंत:पुर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की वार्ता श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही सुभद्रा भी भाव विह्वल होने लगीं। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखते थे। सुदर्शन चक्र विगलित हो गया। उसने लंबा-सा आकार ग्रहण कर लिया। यह माता रोहिणी के महाभाव का गौरवपूर्ण दृश्य था। अचानक नारद के आगमन से वे तीनों पूर्व वत हो गए। नारद ने ही श्री भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। महाप्रभु ने तथास्तु कह दिया। कल्पना और किंवदंतियों में जगन्नाथ पुरी का इतिहास अनूठा है। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु कृष्ण और वामन भी हैं और बुद्ध भी। अनेक कथाओं और विश्वासों और अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो मतों और विश्वासों का अद्भूत समन्वय है। जगन्नाथ मंदिर में पूजा पाठ दैनिक आचार-व्यवहार रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव वैष्णव बौद्ध जैन यहाँ तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। यहाँ जैन और बुद्ध की भी मूर्तियाँ हैं पुरी का जगन्नाथ मंदिर तो धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर कि पीछे विमला देवी की मूर्ति है जहाँ पशुओं की बलि दी जाती है, वहीं मंदिर की दीवारों में मिथुन मूर्तियां चौंकाने वाली है। जो तांत्रिकों के प्रभाव के जीवंत साक्ष्य भी हैं। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को नीलमाधव कहा गया। इसी नीलमाधव को १४ वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है। जरा नाम के शबर के वंशज कई पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है। संपूर्ण भारत में वर्षभर होने वाले प्रमुख पर्वों होली दीपावली दशहरा रक्षा बंधन ईद क्रिसमस वैशाखी की ही तरह पुरी का रथयात्रा का पर्व भी महत्त्वपूर्ण है। पुरी का प्रधान पर्व होते हुए भी यह रथयात्रा पर्व पूरे भारतवर्ष में लगभग सभी नगरों में श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाया जाता है। जो लोग पुरी की रथयात्रा में नहीं सम्मिलित हो पाते वे अपने नगर की रथयात्रा में अवश्य शामिल होते हैं। रथयात्रा के इस महोत्सव में जो सांस्कृतिक और पौराणिक दृश्य उपस्थित होता है उसे प्राय: सभी देशवासी सौहार्द्र भाई-चारे और एकता के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। जिस श्रद्धा और भक्ति से पुरी के मंदिर में सभी लोग बैठकर एक साथ श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद प्राप्त करते हैं उससे वसुधैव कुटुंबकम का महत्व स्वत: परिलक्षित होता है। उत्साहपूर्वक श्री जगन्नाथ जी का रथ खींचकर लोग अपने आपको धन्य समझते हैं। भगवान जगन्नाथ सात दिनों तक गुण्डिचामंदिर में प्रवास करते हैं। इसके बाद वे श्री मंदिर लौटते हैं। भगवान की वापसी यात्रा वैशाख शुक्ल दशमी को प्रारम्भ होती है। श्रीमंदिर लौटने पर तीनों मूर्तियों को रत्नवेदी पर स्थापित कर दिया जाता है। इसके बाद नियमित देवपूजा देवदर्शन और भोग का क्रम प्रारम्भ हो जाता है।देश का सबसे बड़ा रसोईघर पुरी के प्रसिध्द जगन्नाथ मंदिर का है । यहां भगवान जगन्नाथ को महाप्रसाद जिसे अब्धा कहा जाता है, चढ़ाने के लिए तकरीबन पांच सौ रसोइये हैं । विभिन्न प्रकार के महाप्रसाद चढ़ाने के लिए तीन सौ सहायक रसोइये इन रसोइयों की मदद करते हैं । भगवान श्री जगन्नाथ को दिन में छह बार महाप्रसाद चढ़ाया जाता है । रसोई घर बत्तीस कमरों से मिलकर बना है। इसमें चूल्हे और लाख मिट्टी के बर्तन है । भोजन में सात विभिन्न प्रकार के चावल चार प्रकार की दाल नौ प्रकार की सब्जियां और अनेक प्रकार की मिठाईयां परोसी जाती है । मीठे व्यंजन तैयार करने के लिए यहां शक्कर के बजाय अच्छे किस्म का गुड़ प्रयोग में लाया जाता है । किन्तु आलू टमाटर और फूलगोभी का उपयोग मन्दिर में नहीं होता। जो भी भोजन यहां तैयार किया जाता है, उसका नाम जगन्नाथ वल्लभ लाडू माथपुली और इसी तरह के कई अन्य नाम रखे जाते हैं । देश में कहीं भी आप इस तरह का रसोई घर नहीं पा सकते । एक घंटे में यहां एक लाख श्रध्दालुओं के लिए भोजन तैयार किया जा सकता है, यहां जो भी श्रध्दालु आते हैं, उन्हें भोजन दिया जाता है। देश और विदेशों में स्थित जगन्नाथ मंदिरों में पूजा की अलग-अलग विधियों को देखते हुए पुरी स्थित प्रमुख मंदिर के प्रशासन ने इन सभी मंदिरों में पूजा की एक ही विधि सुनिश्चित करने की पहल की है। पुरी के गजपति महाराज श्री दिव्यसिंहदेव ने बताया कि देश में और विदेशों में बडी संख्या में जगन्नाथ मंदिर हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर को पुरी स्थित सर्वाधिक प्राचीन जगन्नाथ मंदिर की पूजा पद्धति की जानकारी नहीं है। गजपति महाराज ने हाल ही में आयोजित दो दिवसीय एक कार्यशाला में बताया कि पुरी के मंदिर की परंपरा पूजा पद्धति और महोत्सवोंका पालन करना इन सभी मंदिरों के लिए संभव नहीं है लेकिन कुछ समरूपताआ जाए इसके लिए प्रयास तो किए जा सकते हैं। गजपति महाराज श्रीजगन्नाथमंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने बताया कि मंदिर प्रशासन ने एक पुस्तिका श्रीमंदिर परंपरा तैयार की है जिसमें पूजा की मानक पद्धति के बारे में बताया गया है। गजपति महाराज के अनुसारदेश-विदेश में स्थित भगवान जगन्नाथ के सभी मंदिरों की सूची तैयार करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। जगन्नाथ मंदिरों की वास्तविक संख्या अभी मालूम नहीं है लेकिन जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी सुरेन्द्रनाथमिश्र के हवाले से प्रबंधन समिति के सदस्य रविन्द्रनाथ प्रतिहारी ने बताया कि उडीसा में भगवान जगन्नाथ के मंदिर अन्य राज्यों में मंदिर और विदेशों में मंदिर हैं।

2 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!

  1. बीना शर्मा says:

    मै पुरीभी गई हूँ और रथयात्रा में शामिल भी हुई पर उसके इतने विस्तृत परिचय से अनभिज्ञ थी | बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी|

  2. पुरी के सम्बन्ध में और उसके आसपास के दर्शनीय स्थलों की और भी कुछ जानकारी मैं देना चाहता था किन्तु पोस्ट बड़ी हो रही थी इस कारण इतने में ही जो संभव था पोस्ट कर पाया| टिप्पणी के लिए बीना जी को बहुत धन्यवाद !!!

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आप सभी को हर्ष और बधाई के साथ यह सूचना देना चाहता हूँ कि LBA अपनी सफलता के उस मुक़ाम तक आ चुका है कि इसकी सदस्यता संख्या अपने चरण तक पहुँच चुकी है और जो ब्लॉगर्स बन्धु इससे जुड़ने की इच्छा रख रहे हैं और जिनके मेल मुझे मिल रहे हैं उसको मद्देनज़र रखते हुए नयी सदस्यता के इच्छुक ब्लॉगर्स को एक और भी शक्तिशाली और नया मंच का गठन आज किया जा रहा है जिसका नाम है 'ऑल इंडिया ब्लॉगर्स असोसिएशन' अर्थात AIBA ! इस मंच का हिस्सा सभी भारतीय बन सकते है, फ़िर चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहें हों !!!
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