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शनिवार, जनवरी 15, 2011

शनिवार, जनवरी 15, 2011 6
पूस के माह में संभोग जायज़ या नाजायज़ ?
@ जनाब डा. श्याम गुप्ता जी ! कृप्या ‘चैरिटी‘ शब्द की स्पैलिंग चेक कर लीजिएगा आपको पता चल जाएगा कि इस कहावत को आपने कहां ग़लत लिखा है। आपको तो मात्र इशारे से ही समझ जाना चाहिए था लेकिन आप तो साफ़ बताने के बाद भी नहीं जान पाए। दूसरी बात यह है कि इस कहावत में ‘मस्ट‘ नहीं है बल्कि ‘चैरिटी बिगिन्स फ़्रॉम होम‘ है। मस्ट की तो फिर भी चल जाएगी लेकिन स्पेलिंग मिस्टेक तो आपको दुरूस्त करनी ही पड़ेगी।
2. हिंदुओं में जितनी परंपराएं प्रचलित हैं उनमें जितनी लिखी हुई हैं इससे ज़्यादा वे हैं जो अलिखित हैं। फिर अलग अलग जातियों के ही नहीं बल्कि अलग अलग गांवों तक के रिवाज अलग हैं। आप किसी यदुवंशी से पूछिए कि ‘पूस के मास में नवविवाहित यदुवंशियों को संभोग से क्यों रोका गया है ?‘
भगवान के साथ भेदभाव क्यों ?
3. आप अलिखित हिंदू रस्मों को तो क्या जानेंगे  ?
आपको यह भी पता नहीं है कि श्रीमद्भागवत महापुराण में महात्मा बुद्ध को विष्णु जी का अवतार बताया गया है। आप कह रहे हैं कि हम तो महात्मा बुद्ध को केवल एक विद्वान मानकर उन्हें आदर देते हैं ?
आपको श्री रामचंद्र जी का अवतार होना तो पता है लेकिन महात्मा बुद्ध का अवतार होना पता नहीं है। यह अज्ञान नहीं है तो और क्या है ?
4. यदि वास्तव में ही महात्मा बुद्ध विष्णु जी के अवतार थे तो आपके मंदिरों में श्रीरामचंद्र जी और उनके वानर तक के तो चित्र मिलते हैं लेकिन उन्हीं के एक और अवतार महात्मा बुद्ध के चित्र या मूर्ति आदि क्यों नहीं मिलते ?
5. क्या इससे यह पता नहीं चलता कि आप लोग केवल इंसानों में ही भेदभाव नहीं करते बल्कि अगर भगवान भी आप लोगों के बीच जन्म ले ले तो आप उसके साथ भी भेदभाव करते हैं। उसके एक रूप की पूजा करेंगे और दूसरे रूप का एक चित्र तक किसी मंदिर में नहीं रखेंगे ?
क्या ईश्वर भी कभी अनीश्वरवादी हो सकता है ?
6. क्या ईश्वर भी कभी अनीश्वरवादी हो सकता है ?
जब श्रीमद्भागवत महापुराण महात्मा बुद्ध को ईश्वर घोषित कर रहा है तो फिर क्या महात्मा बुद्ध यह भूल गए थे कि वे स्वयं ईश्वर हैं और उन्हें अनीश्वरवादी और यज्ञ का विरोधी नहीं होना चाहिए ?
7. महात्मा बुद्ध ने यज्ञ में अन्न-फल जलाने का विरोध क्यों किया ?
8. अगर उन्होंने विरोध कर भी दिया तो तत्कालीन वेदाचार्यों ने बौद्धों के विरोधस्वरूप यज्ञ को कलिवज्र्य क्यों घोषित कर दिया ?
अगर यज्ञ धर्म था तो उसे किसी अनीश्वरवादी विद्वान के कहने से बंद नहीं करना चाहिए था। जैसे कि हम अज्ञानियों के विरोध के बावजूद कुरबानी बंद नहीं करते।
हिंदू धर्म के सिद्धांतों को लगातार बदला जाता रहा है
9. आपने धर्म को खेल समझ रखा है कि जब चाहो और जितना चाहो उसे बदल दो।
10. जितना बदलने की इजाज़त होती है वह या तो अनुकूलन में आता है या फिर आपद्-धर्म होता है। उसमें धर्म के मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखा जाता है। ऐसा नहीं होता कि समय बदले तो धर्म के मूल सिद्धांत ही बदल कर रख दिए जाएं। जब सिद्धांत बदल दिए जाते हैं तो फिर धर्म भी बदल जाता है। इसे धर्म परिवर्तन कहा जाता है, न कि नवीनीकरण।
पद सोपान क्रम में जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का आधार है। चाहे वह जन्मना हो या फिर गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर। इन चारों जातियों के अधिकार बराबर नहीं हैं। यह वर्ण-व्यवस्था का स्पष्ट सिद्धांत है लेकिन आज भारत में हरेक वर्ण को, हरेक श्रेणी के कर्मचारी को बराबर अधिकार है। ब्राह्मण किसी पर भी श्रेष्ठता नहीं है।
ऐसे ही हिंदू जीवन पद्धति का आधार चार आश्रम हैं। आप 50 साल से ऊपर के हो चुके हैं लेकिन आज भी यहीं घूम रहे हैं मुसलमानों की तरह। आप जंगल जाने के लिए तैयार ही नहीं हैं एक वानप्रस्थी की तरह। जब आपको हिंदू जीवन पद्धति की महानता पर यक़ीन है तो आप इस्लाम पर अमल क्यों कर रहे हैं ?
अपने धर्म से पतित होना और क्या होता है ?
चारों आश्रमों का त्याग क्यों ?
11. आज हिंदू अपने बच्चों को गुरूकुलों में भेजने के बजाय कान्वेंट में भेज रहे हैं और बच्चे भी ‘ब्रह्मचर्य‘ का पालन नहीं कर रहे हैं। आप चारों आश्रमों में से किसी एक भी आश्रम का पालन नहीं करते तो फिर आप अपने धर्म के नास्तिक हुए कि नहीं ?
12. आप विवाह करते हैं लेकिन गृहस्थ के लिए हिंदू धर्म में जो विधान है कि अगर गर्भ ठहर जाए तो पति अपनी पत्नी से संभोग न करे । आप इसके भी पाबंद नहीं हैं। यहां भी आप इस्लाम पर ही अमल कर रहे हैं । अपने आश्रम के अनुसार आप आचरण क्यों नहीं करते ?
13. अगर वे अव्यवहारिक हैं तो आप मानते क्यों नहीं ?
हिंदू विवाह : संस्कार या समझौता ?
14. हिंदू धर्म में विवाह एक संस्कार है। पति के मरने के बाद भी औरत उसी की पत्नी रहती है। इस्लाम में पति की मौत के साथ ही रिश्ता टूट जाता है और तलाक़ से भी टूट जाता है तथा औरत दूसरा विवाह कर सकती है। आपने भी अपने संस्कार को मुसलमानों की तरह ‘समझौते‘ में ही बदल कर रख दिया है। जब हमने उसे आपकी तरह संस्कार नहीं माना तो आपने उसे हमारी तरह समझौता क्यों मान लिया ?
क्या इस्लाम हिंदू धर्म की नक़ल है ?
15. अगर इस्लाम आपके नज़रिये वाले हिंदू धर्म की नक़ल होता तो इसमें हिंदू धर्म के मौलिक सिद्धांत ज़रूर होते जैसे कि अवतारवाद, अंशवाद, बहुदेववाद, सती, नियोग, ऊंचनीच, छूतछात, जुआ, ब्याज, संगीत की अनुमति, देवदासी, मूर्तिपूजा, यज्ञ, सोलह संस्कार, चार आश्रम, आवागमन, गोपूजा, गाय का पेशाब पीना, हिंदुस्तान का कोई तीर्थ या सन्यास लेना आदि। इनमें से कोई भी चीज़ इस्लाम में सिरे से ही नहीं है। अलबत्ता आप खुद इन चीज़ों से अपना पीछा छुड़ाते जा रहे हैं और अपने धर्म को इस्लाम जैसा बनाते जा रहे हैं।
हिंदू धर्म के कुछ मतों के मानने वालों की शक्ल तक मुसलमानों से इतनी मिलती जुलती हो गई है कि अमेरिका में उन्हें मुसलमान समझकर मारने की घटना भी पेश आ चुकी है।
16. धर्म के सिद्धांतों को ही बदलकर रख दिया गया है और आप कह रहे हैं कि यही तो वैज्ञानिकता है। यह वैज्ञानिकता नहीं है बल्कि मूर्खता है और जनता को सदा मूर्ख बनाए रखने के लिए साज़िश का एक फंदा है। भारत में पहले बौद्ध धर्म का और जैन धर्म का सिक्का जम गया तो हिंदू धर्म को उनके सिद्धांतों के अनुसार ढाल दिया गया और जब मुसलमान आ गए तो उनकी तरह बन गए और अब यूरोपियन्स की तूती बोल रही है तो अपना रहन-सहन उनकी तरह कर डाला। धर्म से आपको कभी मतलब रहा ही नहीं। आप तो वक्त के हाकिम के रिवाज के मुताबिक अपनी मान्यताएं और परंपराएं बदलते चले आ रहे हैं। इसी उलट पलट में आपसे आपका धर्म खोया गया। आप भूल गए लेकिन मुझे याद है क्योंकि मेरे पास ‘वह‘ है जो आपके पास नहीं है।
17. कृप्या अपनी हालत पर ग़ौर करें और ऐसी हालत में भी अपनी महानता के झूठे दंभ को आप त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, सिवाय अफ़सोस के और क्या किया जा सकता है ?
धर्म एक प्रचारक अनेक
18. आप कहते हैं कि इस्लाम मात्र 1500-1600 साल पुराना है। मैं आपको बता चुका हूं कि इस्लाम सनातन है। एक ही सिद्धांत का प्रचार करने वाले लगभग एक लाख चैबीस संदेष्टा हुए हैं जो कि सब के सब हज़रत मुहम्मद साहब स. के आने से पहले ही हुए हैं। पैग़म्बर साहब स. की पैदाईश को भी 1500-1600 साल नहीं हुए हैं। इससे पता चलता है कि आपने इस्लाम के बारे में महज़ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर एक कल्पना गढ़ ली है। आप इस्लाम को जानने के लिए उसके मूल स्रोत से ज्ञान लेने के प्रति गंभीर नहीं हैं।
19. इस्लाम के प्रति तो आप क्या गंभीरता दिखाएंगे जबकि आप जिस धर्म को धर्म मानते हैं उसी का पालन करते हुए जंगल जाने के लिए तैयार नहीं हैं। धोती, चोटी और जनेऊ ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हैं।
20. आप हवन करने को पर्यावरण शुद्धि के ज़रूरी मानते हैं और दिन में 3 बार ऐसा किया जाना हिंदू शास्त्र आवश्यक मानते हैं। लेकिन आप जिस चीज़ को लाभकारी और धर्म मानते हैं उसे दिन में एक बार भी करने के लिए तैयार नहीं हैं।
21. आप इस्लाम की सत्यता पर विश्वास नहीं रखते लेकिन आपके कितने ही कर्म इस्लाम के अनुसार संपादित हो रहे हैं और जिस हिंदू जीवन पद्धति के कल्याणकारी होने का विश्वास आपके दिलो-दिमाग़ में रचा-बसा है, उसके अनुसार आप अमल करने के लिए तैयार नहीं हैं।
ऐसा विरोधाभास आपके जीवन में क्यों है ?
ज़रा इन बिंदुओं पर ग़ौर कीजिएगा। यह जीवन कोई तमाशा नहीं है और न ही धर्म कोई कपड़े हैं कि अपनी मर्ज़ी से जब चाहे इसका ड़िज़ायन चेंज कर लिया।

6 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!

  1. अनवर साहब, हिन्‍दू धर्म एक सनातन धर्म है, कोई मत या सम्‍प्रदाय नहीं जैसे कि इस्‍लाम, या ईसाई सम्‍प्रदाया हिन्‍दू धर्म के अन्‍दर विभिन्‍न मत या सम्‍प्रदाय देखने को मिलते हैं तो इसका मतलब यही है कि हिन्‍दू धर्म में व्‍यक्ति को अपनी इच्‍छानुसार भगवान को पूजने और धर्म का पालन करने की छूट दी गयी हैा यहॉं किसी कटटरता का पाठ नहीं पढाया जाताा आप जिन कर्मकाण्‍डों के पालन को धर्म समझ रहे हैं वह धर्म नहीं हैा जहां तक वर्ण और आश्रम व्‍यवस्‍था की बात है, ये एक प्रकार की सामाजिक व्‍यवथायें थीं न कि धार्मिक नियम व परम्‍परायेंा सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं का स्‍वरूप समय के साथ बदलता रहता हैा जहां तक जात पात और छुआ छूत की बात है तो आपके इस्‍लाम में भी तो शिया और सुन्‍नी सम्‍प्रदाय हैं,शेख और सैयद हैं, ईसाई धर्म में थी कैथ्‍लिक, प्रोटेस्‍टेण्‍ट और मैथोडिस्‍ट सम्‍प्रदाय हैंा काफिर और मुहाजिर की परिभाषा भी आपके इस्‍लाम की ही देन हैा वस्‍तुत: धर्म मनुष्‍य के लिए है,मनुष्‍य धर्म के लिए नहींा धर्म मनुश्‍य के कल्‍याण के लिए बनाया गया हैाअत: समय के साथ ही पुरानी व्‍यवस्‍था के स्‍थान पर नई व्‍यवस्‍था आ जाती हैा धर्म में रूढिवादिता और जड़ता के लिए कोई स्‍थान नहीं होताा धर्म स्‍वयं सही या गलत नहीं है, व्‍यक्ति उसका सही या गलत इस्‍तेमाल करता हैा आज विश्‍व में जितना आतंकवाद फैला है, उसमें से अधिकांश इस्‍लाम से संबंधित हैा यह मैं नहीं कह रहा, दुनिया भर की मीडिया के तमाम आंकड़े दावा कर रहहे हैंा तो क्‍या यह कहा जाये कि इस्‍लाम आतंकवाद की शिक्षा देता हैा

  2. हिंदू भाईयों के तीन मेजर कॉम्पलैक्स
    @ भाई घनश्याम मौर्य जी ! इस तत्व चर्चा में आपका स्वागत है।
    आप लोगों के साथ एक बड़ी प्रॉब्लम आपका अज्ञान है और दूसरी बेसलेस अहंकार और तीसरी प्रॉब्लम यह है कि आप लोग केवल वक्तव्य देते हैं लेकिन उसे प्रमाणित करने के लिए सुबूत कुछ भी नहीं देते। आप अपने नज़रिये वाले हिंदू धर्म को सनातन भी कह रहे हैं और धर्म भी और यह भी कह रहे हैं कि यह कोई मत या संप्रदाय नहीं है। जबकि हक़ीक़त यह है कि मौजूदा हिंदू धर्म मात्र एक मत या संप्रदाय नहीं है वरन् मतों और संप्रदायों का एक बहुत बड़ा समूह है। इसमें किसी भी आदमी के लिए किसी भी मत-संप्रदाय में आस्था रखना और उसके नियमों का पालन करना अनिवार्य नहीं है। आज एक हिंदू किसी एक या दो या एक साथ कई मतों में आस्था रख सकता है या सिरे से हरेक मत की निंदा भी कर सकता है। वह चाहे तो किसी भी नियम का कठोरता से पालन कर सकता है और वह चाहे तो सारे नियमों को ताक़ पर रख सकता है। लोगों को यह छूट हिंदू धर्म ने अपनी किसी उदारता के कारण नहीं दी है बल्कि जब वह लोगों को उनके जीवन की समस्याओं से मुक्ति दिलाने के बजाय उनकी परेशानी बढ़ाने वाला सिद्ध होने लगा तो लोगों ने खुद उससे अपना पिंड छुड़ाकर इधर-उधर भागना शुरू कर दिया। किसी ने एक गुरू का दामन पकड़ा और किसी ने दूसरे गुरू का। कोई खुद ही गुरू बन कर शुरू हो गया और कोई इन सब गुरूओं के ही खि़लाफ़ खड़ा हो गया।


    हिंदू और मुस्लिम मतों में बुनियादी अंतर क्या है ?

    आप हिंदू धर्म के मतों की तुलना शिया-सुन्नी आदि मुस्लिम मतावलंबियों से नहीं कर सकते। एक हिंदू वेद और ईश्वर को मान भी सकता है और उनकी निंदा भी कर सकता है। वह कुछ भी कर सकता है, धर्म के मामले में उसका कोई ऐतबार नहीं है कि वह क्या कह बैठे ? और क्या कर बैठे ?

    लेकिन शिया-सुन्नी हों या वहाबी-बोहरा किसी को भी कुरआन के ईश्वरीय होने में या खुदा के मौजूद होने में कोई शक नहीं है। सभी नमाज़-रोज़ा, ज़कात और हज को एक जैसे ही फ़र्ज़ मानते हैं। इन मतों के उद्भव का कारण खुदा, रसूल, दीन या कुरआन में अविश्वास नहीं है बल्कि परम चरम विश्वास है। हरेक ने अपने विश्वास और आचरण में एक दूसरे से बढ़ने की कोशिश की और इसी विश्वास में वे यह समझे कि कुरआन की व्यवस्था को जैसा उन्होंने समझा है, दूसरा वैसे नहीं समझ पाया। सबके केन्द्र में ईश्वर और ईश्वर की वाणी ही है। जबकि हिंदुओं में ऐसा नहीं है।


    हाथ कंगन तो आरसी क्या ?

    आज विश्व में कुल 153 करोड़ मुसलमान हैं और लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। दुनिया का हर चैथा आदमी आज मुसलमान है। दुनिया की हर नस्ल और हरेक कल्चर का आदमी इसलामी समाज का अंग है।

    इनमें से आप किसी से भी और कितनों से भी पूछ लीजिए कि वह कुरआन को क्या मानता है ?

    उनमें से हरेक एक ही जवाब देगा कि ‘वह कुरआन को ईश्वर की ओर से अवततिरत ज्ञान मानता है ?‘

    अब आप यही बात ज़्यादा नहीं बल्कि मात्र दस-पांच हिंदू भाईयों से पूछ लीजिए। उनमें से हरेक का जवाब एक-दूसरे से अलग होगा, विपरीत होगा।

    सच एक होता है और झूठ कभी एक नहीं होता लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदू धर्म की बुनियाद कभी सत्य पर नहीं रही। नहीं बल्कि ईश्वर की ओर से इस पवित्र भूमि पर ‘ज्ञान‘ उतरा है और उसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। वे अवशेष भी अपने आप में इतने समर्थ कि पूरे सत्य को आज भी प्रकट कर सकते हैं, अगर कोई वास्तव में सत्य को उपलब्ध होना चाहे तो।

    नेकी को इल्ज़ाम न दीजिए

  3. इस्लाम में न कट्टरता कल थी और न ही आज है
    एक नेक औरत अपने एक ही पति के सामने समर्पण करती है, हरेक के सामने नहीं और अगर कोई दूसरा पुरूष उस पर सवार होने की कोशिश करता है तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जाती है। वह जिसे मारती है दुनिया उस मरने वाले पर लानत करती है और उस औरत की नेकी और बहादुरी के गुण गाती है। इसे उस औरत की कट्टरता नहीं कहा जाता बल्कि उसे अपने एक पति के प्रति वफ़ादार माना जाता है। दूसरी तरफ़ हमारे समाज में ऐसी भी औरतें पाई जाती हैं कि वे ज़रा से लालच में बहुतों के साथ नाजायज़ संबंध बनाये रखती हैं। उन औरतों को हमारा समाज, बेवफ़ा और वेश्या कहता है। वे किसी को भी अपने शरीर से आनंद लेने देती हैं, उनके इस अमल को हमारे समाज में कोई भी ‘उदारता‘ का नाम नहीं देता और न ही उसे कोई महानता का खि़ताब देता है।

    अपने सच्चे स्वामी को पहचानिए
    ठीक ऐसे ही इस सारी सृष्टि का और हरेक नर-नारी का सच्चा स्वामी केवल एक प्रभु पालनहार है, उसी का आदेश माननीय है, केवल वही एक पूजनीय है। जो कोई उसके आदेश के विपरीत आदेश दे तो वह आदेश ठोकर मारने के लायक़ है। उस सच्चे स्वामी के प्रति वफ़ादारी और प्रतिबद्धता का तक़ाज़ा यही है। अब चाहे इसमें कोई बखेड़ा ही क्यों न खड़ा हो जाय।

    बग़ावत एक भयानक जुर्म है
    जो लोग ज़रा से लालच में आकर उस सच्चे मालिक के हुक्म को भुला देते हैं, वे बग़ावत और जुर्म के रास्ते पर निकल जाते हैं, दौलत समेटकर, ब्याज लेकर ऐश करते हैं, अपनी सुविधा की ख़ातिर कन्या भ्रूण को पेट में ही मार डालते हैं। वे सभी अपने मालिक के बाग़ी हैं, वेश्या से भी बदतर हैं।
    पहले कभी औरतें अपने अंग की झलक भी न देती थीं लेकिन आज ज़माना वह आ गया है कि जब बेटियां सबके सामने चुम्बन दे रही हैं और बाप उनकी ‘कला‘ की तारीफ़ कर रहा है। आज लोगों की समझ उलट गई है। ज़्यादा लोग ईश्वर के प्रति अपनी वफ़ादारी खो चुके हैं।

    खुश्बू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से
    अपनी आत्मा पर से आत्मग्लानि का बोझ हटाने के लिए उन्होंने खुद को सुधारने के बजाय खुद को उदार और वफ़ादारों को कट्टर कहना शुरू कर दिया है। लेकिन वफ़ादार कभी इल्ज़ामों से नहीं डरा करते। उनकी आत्मा सच्ची होती है। नेक औरतें अल्प संख्या में हों और वेश्याएं बहुत बड़ी तादाद में, तब भी नैतिकता का पैमाना नहीं बदल सकता। नैतिकता के पैमाने को संख्या बल से नहीं बदला जा सकता।
    दुनिया भर की मीडिया उन देशों के हाथ में है जहां वेश्या को ‘सेक्स वर्कर‘ कहकर सम्मानित किया जाता है, जहां समलैंगिक संबंध आम हैं, जहां नंगों के बाक़ायदा क्लब हैं। सही-ग़लत की तमीज़ खो चुके ये लोग दो-दो विश्वयुद्धों में करोड़ों मासूम लोगों को मार चुके हैं और आज भी तेल आदि प्राकृतिक संपदा के लालच में जहां चाहे वहां बम बरसाते हुए घूम रहे हैं। वास्तव में यही आतंकवादी हैं। जो यह सच्चाई नहीं जानता, वह कुछ भी नहीं जानता।

  4. मीडिया का छल
    आप मीडिया को बुनियाद बनाकर मुसलमानों पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं। यही पश्चिमी मीडिया भारत के नंगे-भूखों की और सपेरों की तस्वीरें छापकर विश्व को आज तक यही दिखाता आया है कि भारत नंगे-भूखों और सपेरों का देश है, लेकिन क्या वास्तव में यह सच है ?
    मीडिया अपने आक़ाओं के स्वार्थों के लिए काम करती आई है और आज नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया का आक़ा मुसलमान नहीं है। जो उसके आक़ा हैं, उन्हें मुसलमान खटकते हैं, इसीलिए वे उसकी छवि विकृत कर देना चाहते हैं। आपको इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
    ग़लतियां मुसलमानों की भी हैं। वे सब के सब सही नहीं हैं लेकिन दुनिया में या इस देश के सारे फ़सादों के पीछे केवल मुसलमान ही नहीं हैं। विदेशों में खरबों डालर जिन ग़द्दार भारतीयों का है, उनमें मुश्किल से ही कोई मुसलमान होगा। वे सभी आज भी देश में सम्मान और शान से जी रहे हैं। उनके खि़लाफ़ न आज तक कुछ हुआ है और न ही आगे होगा। उनके नाम आज तक किसी मीडिया में नहीं छपे और न ही छपेंगे क्योंकि मीडिया आज उन्हीं का तो गुलाम है।

    सच की क़ीमत है झूठ का त्याग
    सच को पहचानिए ताकि आप उसे अपना सकें और अपना उद्धार कर सकें।
    तंगनज़री से आप इल्ज़ाम तो लगा सकते हैं और मुसलमानों को थोड़ा-बहुत बदनाम करके, उसे अपने से नीच और तुच्छ समझकर आप अपने अहं को भी संतुष्ट कर सकते हैं लेकिन तब आप सत्य को उपलब्ध न हो सकेंगे।
    अगर आपको झूठ चाहिए तो आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अगर आपको जीवन का मक़सद और उसे पाने का विधि-विधान चाहिए, ऐसा विधान जो कि वास्तव में ही सनातन है, जिसे आप अज्ञात पूर्व में खो बैठे हैं तब आपको निष्पक्ष होकर न्यायपूर्वक सोचना होगा कि वफ़ादार नेक नर-नारियों को कट्टरता का इल्ज़ाम देना ठीक नहीं है बल्कि उनसे वफ़ादारी का तौर-तरीक़ा सीखना लाज़िमी है।
    धन्यवाद!
    http://commentsgarden.blogspot.com/2011/01/main-difference-between-hinduism-and.html

  5. @ घनश्याम मौर्य

    इस्लाम के बारे में आपको काफी गलत फहमियां हैं, आतंकवाद के मसले पर अप मेरा यह लेख पढ़ सकते हैं...

    आतंकवाद और इस्लाम!

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Tips & Tricks WILDLIFE aag aankh aarati ajadee alankar alvida aman ka paigham amrit anchal anugeet chhand arab india relation arth asmyik hindi kavita atal biharee ayodhya balidan banee basant bhagat azad. bhajan bhasha bhav bimb bhojpuree bhojpuri doha bhoo bhopal book review bundelee chatushpadee chhatisgarhee chunautiyan chunav creation creatior daman dandkala chhand dard dard una ladakon ka desh dharm aur lekhan dhool dhuaan dil doha gazal dohe durmila chhand educational institute in india elegy emaan falak fasal galib ganesh datt sarasvat gantantra divas garal gas treagedy geeta chhand geetika ghalib gulf news haiku hamara dharm harish singh harsh hindee ke haiku hindi laghu katha hindi short story. kargil hindi shortstory hindi smriti geet hinsa aur ham http://sajiduser.blogspot.com/ http://www.sajiduser.blogspot.com/ imarat. india is great india. indian women and arabian shekh indipendence day jabalpur. jannah is man's destination jantantra jhulna chhand kabeer kaikeyee kamand chhand kamlinee kamroop chhand khalish khazana. kiran kriti charcha laghukatha lakhnaoo laloo laxmi lay lokneeti. loktantra lotus love manav mandir manhagaayee marhatha chhand maut meeran krishna megh mekal mirza ghalib narmada neta pakistan pita father's day prakriti prarthna pratibandh pratibha prem pyar quran and gayatri mantra rachna rachnakar radha rajneeti ram janm bhoomi ras sabab sada sakhee salgirah. sanjiv sansadji.com saraswati sat satyagrahee. sanjiv 'salil' shaheed shakeel badyoonee ship shiv shok geet shok samachar sincerity in intention sitasat siya soniya gandhi stuti sundar svasthya aur uchit ilaj svatantrata swaroopanand tadbeer talent. tam taqdeer the world is not enough tomorrow may be or not may be toofan tribhangi chhand ujala ummeed ved and quran ved mantra veenapanee vidyarthiji vivadit maamale aur ham vivek ranjan wildlife DUDHWA अ ध्यक्ष अंग्रेज़ी अंचरा अंतर्द्वंद्व अंतर्मंथन अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन अंतस अंधविश्वास अंशकालिक अनुदेशक अखंडता अगीतायन अग्ने अचेतन अठखेली अति सुखा अभिलाषा अतुकांत कविता अदा अदावत अनमन अनवर जमाल अनाहत नाद. अनैतिकता अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस अन्धविश्वास अन्न अन्ना हज़ारे अन्य कविताएँ अप:तत्व अपरा-शंभु संयोग अपराधीकरण अपशब्द अभिभावक अभेद बुद्धि अमोघ अस्त्र अरमां अर्धनारीश्वर अल्पना अल्लाह अवतार अशांति अशोभनीय - धन असार अहं आंसू आज आजादी आणविक परिवार आतंक की समस्या आतंक हैरान नज़रें आदत आदि-वाणी आदिशक्ति आभूषण आरक्षण आलिंगन आवश्यक सूचना आशनां आस्था आज़ाद शहीद दिवस इंडियन ब्लॉगर्स असोसिएशन इच्छा इच्छाएं इन्डली इन्डियन धारावाहिक इन्डिया गेट इमली ईषत इच्छा उ. प्र. राजनीति के ये घोटाले उक्ति उचित मार्ग उत्तर प्रदेश असोसिएसन उत्तर प्रदेश का सच उत्तर प्रदेश ब्लॉगर्स एसोसियेशन उदारीकरण उदासीनता उधार उपन्यासकार और पटकथा उमन्ग उर्दु ऋचाएं ऋषि ऋषि अनंग एक तत्व एतबार एश्वर्य एसे गीत ऐसी तान ओउम औरत क्या है कंगना कछारन कथा निराली | कन्घा कन्या भ्रूण-हत्या कब्र कर्नाटक कलम कलियुग के मोहन कलुष कवि लखनऊ कविता दुबे कागज़-कलम काफिया काम-सृष्टि कामनाएं कामिनि कारण कारण-ब्रह्म कारोबार कार्य कालकांज काव्य गोष्ठेी कीर्तिदा कुंभ कुञ्ज गली कुरआन कौन क्यूं न हुआ क्रमिक विकास खुरचहा पति खुशबू खुशियों की थिरकन खुशी खेल-व्यवसाय खेळ खौफ गणतंत्र दिवस गरीबी ग़ज़ल अंदाज़े-बयाँ गाँव की गोरी गांव की समस्या; 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