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अब के बरस

Saturday, February 27, 2010

होली को तो हर वर्ष आना ही था

सो इस बरस भी आगई|

अबीर,,गुलाल ,पिचकारी 

तो मिलते हैं बाजार में 

पर नहीं मिला करती

मन की उमंगें |

मौसम तो फागुनी

हो ही होजाता है 

पर नहीं होते स्पंदित 

मन की वीणा के तार|

होली मन की खुशियों 

का त्यौहार है

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता 

कि यह महीना फागुन हो या बसंत|

अभी कुछ बरस पहले  

चिलचिलाती दुपहरी में 

मन खुशियों का खजाना था|

तन बिन वस्त्र आभूषण के 

ओज से दीप्त था 

और दीवारें बिना रंग-रोगन के

भी उल्लसित थी|

आँगन दूधिया चांदनी से 

नहाया था |

अचानक मौसम बसंती हो आया 

रंगों की फुआरे पड़ी

और होली,दीबाली सब एक 

साथ घर में घुस आई|

होली है होली है

रंग बिरंगी होली है|

यह तो कहा हीजाता है 

पर होली

हमेशा होली नहीं हुआ करती|

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