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बेरागी जी ,,,आदाब अर्ज़ हे ,,

Monday, June 07, 2010

बेरागी जी,, ने फिरदोस खान ,, के ब्लॉग पर एक मसला उठाया था हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लहुअलेहिव्सल्लम के बारे में., उनका कहना था कि जो व्यक्ति सात साल की बच्ची से शादी करे वह धर्मगुरु केसे हो सकता हे ?, में ने वादा किया था कि इस सम्बन्ध से मै एक शोध प्रस्तुत करूँगा जिस से स्पष्ट होजाएगा कि शादी (रुखसती)के समयं हज़रत आयशा की आयु २१ साल थी ,अतः उस शोध का एक अंश यहाँ प्रस्तुत हे ,
हज़रत आयशा की बड़ी बहिन( हज़रत अस्मां बिन्त अबुबकर ) जो उन से दस साल बड़ी थीं ,उन्हों ने सो साल की आयु पाई ओर उनका सवरगवास सन बहत्तर हिजरी में हुआ ,इस पर तमाम इतिहासकार सहमत हें ,इस हिसाब से ज़ाहिर हे कि हिजरत के समय हज़रत अस्मां की आयु २८ साल बनती हे ,अर्थात इस समय उन की छोटी बहिन आयशा(जो अस्मां से दस साल छोटी हें ) की उम्र १८ साल हुयी ,ओर यह बात भी तारिख के दामन में महफूज़ हे कि हज़रत मुहम्मद साहब (सल्लाल्लाहुअलेहीवसल्लम) का निकाह हज़रत आयशा के साथ सन एक हिजरी में ओर रुखसती उसके दो साल बाद तीन हिजरी में हुयी , इस का मतलब यह निकलता हे कि निकाह के समय हज़रत आयशा की उम्र १९ साल ओर रुखसती के समय २१ साल थी ,,,,,ओर यह ऐसा गणितीय तर्क हे जिसे झुटलाया नहीं जा सकता ,क्यों कि जो कुछ ऊपर लिखा गया वह तारीखी हकीक़त हे ,जिस से साफ ज़ाहिर होता हे ,कि सात साल कि बच्ची से शादी रसूलुल्लाह (सल्लाल्लाहुअलेहीवसल्लम) पर महज़ मुखालिफीन का इलज़ाम हे , ,,जिस का यकीन नहीं किया जासकता ,,,,

6 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!:

Ratan Singh Shekhawat Monday, June 07, 2010 8:56:00 AM  

मेरे ख्याल से इस तरह के सवाल उठाना ही गलत था ,
किसी भी व्यक्ति के अच्छे कार्यों से सीख लेनी चाहिए

इतने पुराने वाकये की खाल उधेड़ने की कोई जरुरत ही नहीं थी |

सलीम ख़ान Monday, June 07, 2010 12:20:00 PM  

सात साल कि बच्ची से शादी रसूलुल्लाह (सल्लाल्लाहुअलेहीवसल्लम) पर महज़ मुखालिफीन का इलज़ाम हे , ,,जिस का यकीन नहीं किया जासकता

Mohammed Umar Kairanvi Monday, June 07, 2010 1:11:00 PM  

A study of her age at the time of her marriage with the Prophet Muhammad

Direct Link
http://ilovezakirnaik.com/madamayeshah/index.htm

Contents
Introduction
Aishah’s marriage and her exact age
The ancient historical references
Some thought-provoking suggestions
Some historical facts that need considering carefully:
The age of Aishah in relationship to the age of her sister Asma
Abu Bakr’s children were born before the advent of Islam
Abu Bakr’s marriage to Umm Ruman
Aishah was one of the first children to embrace Islam
Some background details of the marriage
Abu Bakr’s concern about the delay of Aishah’s full wedding
Aishah was playing on a swing when called to her marriage
The date of the death of Aishah
The status of the narratives in the Sahih collections
Sayyid Sulayman Nadvi’s statement examined
Aishah’s dolls
Aishah’s ‘playmates’
Aishah’s Needlework
Aishah’s Account of the Miraj and the Hijrah
Aishah’s role in the Battle of Uhud
Aishah’s knowledge
Her status as a jurist

Direct Link
http://ilovezakirnaik.com/madamayeshah/index.htm

सच का बोलबाला, झूठ का मुँह काला Monday, June 07, 2010 5:25:00 PM  

Q.
@बैरागी
मुहमद साहब के पास १ नोकर था जैद नाम का
मुहमद साहब उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते थे और उसकी (जैद ) की दूसरी शादी "जैनब" से हुई थी "जैनब" कुरैशी खानदान की थी व् मुहमद भी कुरैशी खानदान के थे इस तरह जैनब मुहमद की फुफेरी जाति "बहन" थी
१ दिन मुहमद जैद के न होने पर उसके घर जा पंहुचा चिक ( परदे ) की आड में जैनब बैठी थी उसने रसूल (जो उसका ससुर भी था) की आवाज सुनी तो जल्दी से उसे भीतर लाने का प्रबंध करने लगी
मुहमद की निगाह उसके सुन्दर बदन पर पड़ी बस फिर क्या था ??
दिल पर १ बिजली सी गिर पड़ी व् मुहँ से निकला आह सुभान अल्ला तू कैसे - कैसी खूबसूरती की कारीगरी करने वाला है ?
जैनब ने ये शब्द सुने और दिल ही दिल में पैगेम्बर के दिल पर कब्जा प् जाने की खुशी जताई जैद से शायद उसकी न बनती थी बस फिर हो गया फुफेरी जाति "बहन" से मिलन ????
जब जैद घर आया तो जैनब ने उसे सारा किस्सा बताया फिर क्या था वह मुहमद के पास गया व् जैनब को तलाक देने व् उसे अपनाने की बात कहने लगा
चाहे कुछ भी हो था तो ये गुनाह ही व् ऐसा नही था की मुहम्मद अपने गुनाह न जानता था बल्कि वह जनता था कि अगर उसकी बेहुद गियाना नज़र जैनब पर न पड़ती तो ये दिन - दहाड़े ये अंधेर न होता अतं जो हुआ अब जो हो गया सो हो गया अब आगे देखो आगे मुहमद के मोमिनों पर खासकर उनकी बीबियो पर कन्ट्रोल के लिए पवित्र कुरान में ये आयत लिखी



ऐ मोमिनों रसूल के मकान में न जाओ जब तुम्हे कुछ पूछना हो तो परदे की आड में पूछो यह तुम्हारे व् उनके दिलो के लिए बेहतर होगा यह मुनासिब नहीं की तुम रसूल के दिल को दुखाओ और न यह कि उनके बाद उनकी बीबियो से शादी करो रसूल की बीबिया मोमिनों की माएं (माँ ) है " सुरह अखराब रकूब ५ "

औरते अकसर १०- १० शादिया कर लेती थी जिन्होंने २ -२ खाविन्द किये
उनकी तादात बहुत कम थी जो अपने पति को बुढा होते देखती या दूसरे से उसकी आखं लड़ जाती तो वह मक्के सरीफ की सेवा में हाज़िर होती और मामला फैसला करा अपने पहले पति को छोड देती और किसी दूसरे से जो जवान व् खूबसूरत हो तो उसके साथ निकाह कर लेती
तो इन पर कंट्रोल करने के लिए हमारे प्यारे मुहम्मद साहब ने पर्दा चालू करवाया

Dr. shyam gupta Wednesday, June 09, 2010 1:37:00 PM  

शायद दोनों ही बातें सच हॆं---- उन जमानों में शादियां बचपन में ही तय होजाया करती थीं; दुश्मनों द्वारा महिलाओं, बच्चियों को छीन ले जाने के डर से नये रिश्ते बनाकर बलशाली-रिश्तेदारी के लिये; गौना( या रुखसत) काफ़ी बाद में लडकियों के युवा होने पर होता था।
---सभी धर्मों- जातियों, पन्थों में यह रिवाज़ आम था ।

Dr. shyam gupta Wednesday, June 09, 2010 1:43:00 PM  

परदे प्रथा वाली बात का कारण भी सच ही है, ------हिन्दुओं में भी --एकान्त में मां, बहिन, पुत्री के साथ भी बैठना वर्ज़ित है।-- बाद में घून्घट प्रथा भी इसीलिये प्रारम्भ हुई.

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