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शनिवार, जनवरी 29, 2011

शनिवार, जनवरी 29, 2011 6
एक टी. वी. सीरियल के सैट पर
आपका भाई अनवर जमाल
किसी आदमी के सच्चे या झूठे होने का फैसला इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं बल्कि उसका आधार यह है कि उसकी बात कितनी सच है ?
@ भाई हरीश जी ! आप मेरी बात को देखिये और बताइए कि सलीम भाई को जो उपदेश मैंने दिया है , वह सच्चा है या नहीं ?
अगर वह झूठा होगा तो मैं उसे अभी छोड़ दूंगा .
अब आप अपने कहे के मुताबिक़ मेरे शिष्य बन चुके हैं और मैंने आपको  ज्ञान देना भी शुरू कर दिया है .
अब आप मुझ पर आरोप लगाना छोड़ कर मुझ से कुछ सीखना शुरू करें वरना आपकी मर्ज़ी .
खुद सलीम खान साहब से आप पूछियेगा कि मेरी सलाह उन्हें  ठीक लगी या ग़लत ?
आपमें संभावनाएं हैं , उन्हें काम में लायें .
मेरा एक मिशन है . मेरा प्यार , गुस्सा , झिड़की और धिक्कार , मेरा सोना-जागना , गर्ज़ यह कि एक एक गतिविधि सब कुछ  डिज़ाइण्ड है.
आप चाहे तो उसे सीख सकते हैं , मैंने आज तक किसी को उसे सिखाया नहीं है . मैंने आपसे कहा था कि जो कुछ अक्सर नज़र आता है , हकीक़त उसके खिलाफ़ भी हुआ करती  है , यह सच है .
ख़ैर जैसा आप चाहें .
बहस करनी है तो बहस करें .
सीखना है तो सीखें . हर तरह आपका स्वागत है .
अपने अहंकार के बारे में भी किसी दिन आपको ज्ञान दूंगा , तब आप जानेंगे कि भारत में ऐसे ज्ञानी भी हैं जो सांप के काटे की दवा सांप के ज़हर से ही बनाते हैं .  
http://hamarivani.com/blog_post.php?blog_id=173

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इस कमेन्ट की बैकग्राउंड जानने के लिए देखें -
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html?showComment=1296316503459#c3042839187340538457

6 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!

  1. अनवर भाई आपकी सभी बाते मुझे स्वीकार हैं, बस एक बात का ख्याल रखिये, कमेन्ट बॉक्स की बाते वही होनी चाहिए, यह मेरा निवेदन है, गुरु जी शिष्य की भावनाओ का भी ख्याल रखिये ताकि ब्लॉग का नियम कानून भंग न हो. आपकी हर बातो का स्वागत है. मैं सीख रहा हू मुझे सिखाइए बाकी लोग मूढ़ हैं आपकी ज्ञानवर्धक बाते उनकी समझ में नहीं आएँगी. .

  2. @ हे ज्ञानार्थी ! आप ब्लागिंग की समझ रखने वाले दो चार बिग ब्लागर्स से पूछकर आईये कि क्या टिप्पणी को पोस्ट का रूप देना ब्लागिंग के नियमों के विपरीत है ?
    उनमें से हरेक आपको यही जवाब देगा कि 'नहीं , कोई भी ब्लागर अपनी या किसी की भी टिप्पणी को पोस्ट का रूप दे सकता है'।

    'आदमी जिस नेमत की क़द्र नहीं करता , वह नेमत भी उनके पास बाक़ी नहीं रहती।'
    मैं यहाँ आया और इस ब्लाग की ज़िंदगी बनकर आया । 120 लेखक सदस्यों और 182 फ़ॉलोअर्स वाले इस ब्लाग के अध्यक्ष रवींद्र प्रभात जी की पोस्ट पर भी टिप्पणियां शून्य रहती थीं।
    इसे एक एसोसिएशन के अध्यक्ष का आदर सम्मान कहा जाएगा या अपमान ?
    ज़ाकिर अली रजनीश जैसे सम्मान विशेषज्ञ बताएं कि अगर अपने अध्यक्ष को उन जैसा उपाध्यक्ष और आप जैसा प्रचारक ही नज़रअंदाज़ करके अपमानित करेगा तो फिर दूसरों के दिलों में भी उसकी कोई क़द्र हरगिज़ हो नहीं सकती और मौक़ा मिलते ही वे उसकी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ाने में ज़रा भी रियायत न बरतेंगे और तब सारी कार्यकारिणी मिलकर भी अपने अध्यक्ष को उस अपमान से बचा न पाएंगे और न ही आप बचा सके ।
    किसी की सदस्यता रद्द करके भी नहीं क्योंकि तब तक वह जो कर चुका होगा उसके प्रभाव को आप अध्यक्ष जी के दिल से कभी डिलीट नहीं कर सकते , स्वयं अध्यक्ष जी भी नहीं।

    अपने तमाम मतभेद के बावजूद मैं कहता हूं कि हमारे अध्यक्ष जी एक विद्वान लेखक हैं। उन्होंने एसोसिएशन के लिए बहुत मेहनत की है । वर्ष 2011 के हजारों ब्लागर्स को उन्होंने देखा और पढ़ा। उनका विश्लेषण भी किया और उन सभी ब्लागर्स को सदा के लिए यादगार बना दिया और ऐसी यादगार पोस्ट LBA को भेंट करके उन्होंने इस ब्लाग की गरिमा को बढ़ाया लेकिन जब भी कोई पाठक उन पोस्ट्स को पढ़ेगा तो उसके मन में यह सवाल ज़रूर उठेगा कि सिपहसालार रवीन्द्र प्रभात अकेला क्यों खड़ा है ?
    इसके सिपाही कहां हैं ?
    इतने लंबे लंबे धारावाहिक यह किसके लिए लिख रहा है ?
    सदस्य तो क्या इसकी तो कार्यकारिणी के सदस्य ही इन्हें पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं ?

    हरीश जी ! आप कैसे प्रचारक हैं कि आप संयोजक और अध्यक्ष जी जैसे अति महत्वपूर्ण लोगों की यादगार पोस्ट्स की सूचना भी एसोसिएशन के सदस्यों को ईमेल नहीं कर सकते ?
    आप मेरे विरोध में तो लंबे लंबे लेख लिख सकते हैं लेकिन अपने अध्यक्ष जी की पोस्ट का प्रचार नहीं कर सकते ?
    आप और ज़ाकिर दोनों को सोचना चाहिए कि आपने अपने पद की जिम्मेदारियों को कितना पूरा किया ?
    संयोजक और अध्यक्ष महोदय दोनों को सोचना चाहिए कि अध्यक्ष जी का परोक्ष रूप से अपमान करने वाले एसोसिएशन के लिए निकम्मे और कामचोर लोगों को उनके पदों पर बनाए रखने से एसोसिएशन को सिवाय नुक़्सान के और क्या मिलने वाला है ?

    मेरी अनिवार्य सलाह :-
    LBA की कार्यकारिणी के हरेक सदस्य पर अनिवार्य किया जाए कि वे इस एसोसिएशन के संयोजक और अध्यक्ष की पोस्ट पढ़ें और उस पर अपने विचार भी दें ताकि दूसरे भी प्रेरित हों और हमारे अति महत्वपूर्ण लोगों की पोस्ट्स लोकप्रिय होकर ब्लाग की लोकप्रिय पोस्ट्स के कॉलम में नज़र आएँ और वे सदा पढ़ी जाती रहें। जो भी ऐसा न करे उसे एसोसिएशन के हितों पर चोट करने वाला समझकर तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए जैसा कि ज़ाकिर जी की ख्वाहिश दूसरों के बारे में है और इसके लिए मार्च का भी इंतज़ार न किया जाए बल्कि इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया जाए ।

    क्यों हरीश जी ! मेरी सलाह में कोई कमी तो नहीं है न ?

    इस पोस्ट में आपके लिए बहुत कुछ है , अगर आप मुझसे कुछ सीखना चाहते हैं तो !

  3. अनवर भाई,

    मैं इस एसोसिएशन के एक सदस्य होने के नाते न चाहते हुए भी ये लिखने के लिए मजबूर हूँ कि हमारे अध्यक्ष महोदय की श्रंखला को किसी भी प्रचार या प्रसार की जरूरत नहीं है. वो ब्लॉग जगत के लिए एक मील का पत्थर है और उसके लिए जितना भी परिश्रम उन्होंने किया है वह किसी धन या यश के लालच में नहीं. कौन पढता है और कौन नहीं - इसकी भी कोई बाध्यता नहीं होती. साझा ब्लॉग किसी प्रचार या प्रसार के लिए नहीं बनाया जाता है. अच्छे विषय और अच्छे विचारों की अभिव्यक्ति ही किसी भी ब्लॉग के महत्व को बढाती है. ये एक परिवार है और इसका हर सदस्य आम घरों की तरह से अलग अलग स्वभाव का है कौन इसकी गतिविधियों के प्रति अधिक गंभीर है और कौन कम - इसका कोई महत्व नहीं है. बस एक बात है कि विवादस्पद विषय आने से परिवार में अशांति का माहौल बनने लगता है और इसलिए आपसे प्रार्थना है कि किसी को चुनौती देने वाले वक्तव्य जारी न करें. आप प्रबुद्ध व्यक्ति हैं और हम उसकी क़द्र करते हैं.

  4. रेखा बहन आपने बिल्कुल सच कहा.हम भी नहीं समझते की किसी पोस्ट पर किसी को भी टिप्पणी की लालसा रखनी ही चाहिए. अगर यह लालसा हमारे अध्यक्ष महोदय को रहती तो शायद कभी न कभी वे अपनी भावना अवश्य ही व्यक्त करते. सिर्फ टिप्पणी के लिए हमारे अनवर साहेब ही लिखते है क्योंकि वही सिर्फ तारीफ के भूखे है.

    और अनवर साहेब आप बेमतलब किसी पर आरोप लगाने आदत छोड़ ही नहीं सकते, और बार बार किसी को चुनौती देना आपकी आदत बन चुकी है.

    आपको समझाया ही नहीं जा सकता , आप कितने बड़े ज्ञानी है मैं ही नहीं सभी जान चुके हैं. आपका अहंकार आपको मुबारक हो, आपका यह नाकारा, नालायक, मूढ़, अज्ञानी, मंदबुद्धि, शठ, महाशठ [कुछ शब्द स्वयं जोड़ लीजिये] भाई आज से आपके पोस्ट पर आने की गुस्ताखी कभी नहीं करेगा. आपकी मर्ज़ी है, जो चाहे बकते रहिये. अलविदा हमेशा के लिए.

  5. लोगों के सद्गुणों की प्रशंसा से समाज में सद्गुणों की वृद्धि होती है
    @ बहन रेखा श्रीवास्तव जी ! एलबीए एक ऐसा परिवार है जिसमें परिवार भाव की नितांत कमी है। हमारे परिवार में एक छोटा सा बच्चा भी जब अपना रिज़ल्ट लेकर लौटता है तो उसे हरेक आदमी देखता है, अच्छे नम्बर देखकर हम उसकी तारीफ़ करते हैं ताकि उसका हौसला बढ़े और भविष्य में वह और भी ज़्यादा बेहतर रिज़ल्ट दे सके। हमारा बच्चा अपने स्कूल के फ़ंक्शन में जब कोई प्रज़ेंटेशन देता है तो हम अपने ज़रूरी कामों को आगे-पीछे करके उसका प्रोग्राम देखने के लिए स्कूल जाते हैं। उसका मक़सद भी उसकी दिलजोई करना होता है, उसका हौसला बढ़ाना होता है। बचपन से ही हम अपने बच्चों को ऐसे डील करते हैं।
    बच्चों को ही नहीं बल्कि बच्चों के बाप को भी हम पूरी तवज्जो देते हैं अपने हरेक परिवार में। शाम को जब बाप के लौटने का वक्त होता है तो हरेक आदमी के कान दरवाज़े पर लगे होते हैं और बिना देर किये तुरंत बाप के लिये दरवाज़ा खोला जाता है और जो चीज़ भी वह लेकर आता है उसे पूरी तवज्जो से देखा जाता है ऐसे हरेक घर में जिसमें कि बाप का कोई सम्मान किया जाता है।
    अच्छे काम सम्मान और वाहवाही पाने के लिये नहीं किये जाते लेकिन अच्छे कामों की वाहवाही की जाती है। देवताओं से लेकर जितेंद्रिय कहलाने वाले योगियों की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। ऋग्वेद का पहला मंत्र ही ईश्वर के स्तवन-वंदन से शुरू होता है। कुरआन की पहली आयत के पहले शब्द ही परमेश्वर की तारीफ़ से भरे हुए हैं। सद्गुण जहां भी हो, उसकी तारीफ़ की जाए, यह एक सनातन रीति है। इस रीति का पालन करना भी अपने आप में एक सद्गुण है। परस्पर सद्भाव और सहयोग के लिए परस्पर सहमति और मान्यता एक परिवार की बुनियादी ज़रूरत है।
    आप एक सरकारी कर्मचारी हैं। आप अपना काम पूरी लगन और कर्तव्यनिष्ठा से करती हैं और साल पूरा होने पर आपकी सर्विस बुक में आपका अधिकारी अपने हाथ से उसमें ‘उत्कृष्ट‘ लिखता है। आपने ‘उत्कृष्ट‘ लिखवाने के लिए अपनी बेस्ट परफ़ॉर्मेंस नहीं दी थी लेकिन आपकी बेस्ट परफ़ार्मेंस इस बात की हक़दार है कि उसे ‘उत्कृष्ट‘ कहा जाय।
    जो आदमी कहता है कि वह वाहवाही नहीं चाहता है। वह झूठ बोलता है। हक़ीक़त यह है कि एक लेखक, कवि और कलाकार दरअसल चाहता ही केवल वाहवाही है।
    श्री रवीन्द्र प्रभात जी ने वर्ष 2010-2011 के हिंदी ब्लाग्स का विश्लेषण किया और उसमें हज़ारों ब्लागर्स का उनके ब्लाग सहित परिचय कराया। यह कोई मामूली काम नहीं था, जिसे उन्होंने अंजाम दिया। यह एक आला दर्जे का शोध कार्य है। इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करता हूं और यह उनका हक़ है। इस ब्लाग जगत में मैं ऐसा अकेला आदमी हूं जो अपने विरोधियों के गुणों की सराहना कर सकता है। वर्ना तो लोग अपने दोस्तों की पोस्ट पर ‘नाइस पोस्ट‘ के दो शब्द भी लिखने से कतराते हैं।
    इस धारावाहिक विश्लेषण में मुस्लिम ब्लागर्स को यथोचित जगह नहीं दी गई है। इस पर मैंने अपनी आपत्ति जताई और अपना मतभेद भी। जो ग़लती जहां देखता हूं, मैं टोकता हूं। मुझे इससे कोई सरोकार नहीं है कि यह अध्यक्ष जी हैं और यह संयोजक जी हैं। बड़े ओहदे वाले को संभलने की ज़रूरत सामान्य सदस्यों की अपेक्षा हमेशा ज़्यादा ही पड़ती है। अगर इस मतभेद को अलग रखकर देखा जाए तो श्री रवीन्द्र प्रभात जी के लेख और परिश्रम में आखि़र क्या कमी है कि उसकी सराहना न की जाए ?
    और अगर मैं उनकी सराहना की प्रेरणा दूं तो मुझे टोका जाए कि मैं ऐसी प्रेरणा क्यों दे रहा हूं ?
    क्या मैं किसी ग़लत काम की प्रेरणा दे रहा हूं ?
    चलिए मान लेते हैं कि श्री रवीन्द्र प्रभात जी ने अपनी वाहवाही के लिए और टिप्पणियां पाने के लिए लेख नहीं लिखा, लेकिन क्या उनका यादगार लेख उपयोगी और सराहनीय नहीं है कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाए ?
    अगर उनका लेख ज़्यादा लोगों तक पहुंचता है तो क्या उन हज़ारों ब्लागर्स को इसका लाभ न मिलेगा जिनका नाम उनके लेख में दर्ज है ?
    अगर उनके काम को यथोचित सम्मान और तवज्जो नहीं दी गई तो क्या आइन्दा वे कभी इतनी मेहनत करेंगे ?
    क्या उनके हौसले में अंतर नहीं आएगा ?
    जो कहता है कि नहीं आएगा, दरअसल वह मानव मनोविज्ञान के बारे में कुछ भी नहीं जानता।
    एलबीए एक परिवार है तो इसमें ऐसा भाव भी होना चाहिए जो कि एक परिवार में होता है। जहां हरेक सदस्य के अच्छे काम की सराहना की जाती है, चाहे उसने वह काम सराहना पाने के उद्देश्य से न भी किया हो।

  6. सलाहियतें किसी सनद की मोहताज नहीं होतीं
    मैं एक योग्य आदमी हूं। आपने माना, मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं वर्ना सलाहियतें किसी सनद की मोहताज नहीं होतीं।
    जिन विषयों पर हज़ारों साल से विवाद चला आ रहा है, उन विषयों को यहां उठाया जाएगा तो विवाद का उठना स्वाभाविक है। अगर लोग ध्यान से पढ़ते ही न हों या उनमें किसी विश्लेषण की क्षमता और सुधार की आकांक्षा ही न हो तो बेशक वे ख़ामोश रहेंगे लेकिन जो आदमी ऐसा न हो और वह सच भी जानता हो तो वह ज़रूर बोलेगा।
    कम योग्यता का आदमी जब अपने से ज़्यादा ज्ञानवान के मुंह में लगाम डालने की कोशिश करेगा तो उसे चैलेंज के सिवा कुछ भी सुनने को नहीं मिलेगा। उसे चाहिए कि वह चैलेंज स्वीकार करके अपनी क्षमता और पात्रता सिद्ध करे वर्ना अपने पांडित्य प्रदर्शन से बचे। हर आदमी ऐसा हिंदू नहीं होता जैसे कि वे खुद होते हैं। अभी ज़माने में अनवर जमाल जैसे हिंदू भी मौजूद हैं जिन्हें वास्तव में ‘तत्व‘ का बोध है। जो मेरा अनुसरण करेगा, उसे भी यह बोध नसीब होगा। अपने सूक्ष्म शरीर के जिन रहस्यों के बारे में उसने केवल ग्रंथों में पढ़ा है, अनवर जमाल उनकी अनुभूति उसे कराएगा। जो उस ज्ञान को जान लेगा, मौत उसे मार नहीं सकती और कोई निराशा उस पर हावी हरगिज़ हो नहीं सकती। कोई शत्रु उसे परास्त नहीं कर सकता। विजय और ऐश्वर्य उसका नसीब है , लोक में भी और परलोक में भी। जो चाहे आज़मा ले।
    हाथ कंगन को आरसी की ज़रूरत कभी नहीं रही।
    इसका नाम आत्मविश्वास है, जिसे लोग ग़लती से अहंकार कहते हैं।
    आपके शुभ वचनों के लिए अनवर जमाल आपका आभारी है।
    धन्यवाद !

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भईया-जन को ये सलाह है की वह LUCKNOW BLOGGERS' ASSOCIATION को Google Chrome ब्राउज़र पर ही खोले जिससे उन्हें ब्लॉग पढने में और अधिक आनंद आएगा !

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