हमें अपनी कमियों से लड़ने कि आदत डालनी चाहिए
Sunday, March 14, 2010
एक शक्तिशाली शासक था तथा हर कोई उसकी वीरता और शासन के प्रबंध की तारीफ किया करता था| किन्तु उस शासक के चेहरे पर एक भद्दा सा दाग था| उस शासक की वीरता और शासन का कुशल प्रबंधक होने के कारण उस शासक के चेहरे के दाग के बारे में कोई भी व्यक्ति कुछ भी कह सकने का साहस नहीं रखता था|
एक बार एक चित्रकार ने उस शासक का चित्र बनाते समय चित्र में शासक के चेहरे के दाग को छुपा दिया और बड़ा सुन्दर सा चेहरा चित्रित कर दिया| उसे आशा थी की वह शक्तिशाली शासक उसके इस कार्य से प्रसन्न होगा और चित्र में उसकी बदसूरती को दूर करके चित्रित करने के कारण उसे भरपूर ईनाम देगा|
अपना सुन्दर सा चित्र देख कर उस शासक ने कहा- नहीं -नहीं मैं जैसा बदसूरत हूँ , मेरा वैसा ही चित्र बनाओ| चित्रकार खुशामदी किस्म का व्यक्ति था वह बोला- आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ? क्या यह चित्र अच्छा नहीं बना है ? मैं आप का अभिप्राय समझ नहीं पाया ? चित्रकार की पीठ थपथपा कर शासक ने कहा- तुम फ़िक्र मत करो| मुझे अपनी कमियों से लड़ने की आदत हो चुकी है| जीवन कि ऊँचाई कमजोरियों को छिपाने में नहीं है, उन्हें दूर करने में है| यदि कोई मुझे मेरी निर्बलताए न बतलाता,तो भला मैं कैसे अपनी कमजोरिओं को दूर सकता और आज इतना सफल शासक बन पाता ? उस शासक ने विस्तृत रूप से समझाते हुए कहा कि “ मैंने अपने चेहरे कि कुरूपता को अपनी योग्यता और वीरता के अद्भुत कार्यों से ढँक दिया है| चेहरे का निर्माण करना तो ऊपर वाले के हाथ में था| लेकिन अपनी आदतों को अच्छा बनाना, सत्कर्म करना, वीरत्व के मार्ग पर चलना, सचरित्रवान बनना तो मेरे अपने हाथ में था और मैंने अपने कर्तव्य का पालन सच्चे दिल से किया है| उस शासक का यह उदाहरण हमें बाहरी सौन्दर्य तक ही स्वयं को सीमित न रखने और कुरूपता, विकलांगता या किसी अन्य व्याधि से ग्रस्त होने के बावजूद भी निराशा और चिंता से मुक्त बने रहने का दिव्य सन्देश देता है | हमें अपनी कमजोरियों को दूर करना चाहिए, न कि चिंतित और निराश हो कर बैठ जाना चाहिए| मन में जब असमर्थता या हीनता का भाव आता है तो हम अपने आत्मबल को भूल जाते हैं| निराशा और चिंता के विचारों का घातक प्रभाव शरीर की प्रतिरोधक शक्ति पर पड़ता है , शरीर की प्रतिरोधक शक्ति ही हमें विरोधी वातावरण से संघर्ष कर सकने में सक्षम बनाती है| इसलिए किन्ही भी परिस्थितियों में निराशा और चिंता के भावों को अपने पास भी नहीं आने देना चाहिए| आशा और उत्साह से ही हममें ईश्वर पर विश्वास तथा मन में पवित्रता बनी रह सकती है|
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प्रेरक बोध कथा के संदर्भ से बहुत अच्छी सीख है धन्यवाद्
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