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देखिये , क्या कर रहे हैं अरब के श्‍ोख साहब भारतीय महिला के साथ?

Sunday, March 14, 2010


अतिथि देवो भवःयह भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों में से है बल्कि मेहमान का सत्कार तो हरेक संस्कृति में पाया जाता है । लेकिन मेहमान की भी एक मर्यादा होती है और मेज़बान की भी । दोनों को इसका पाबन्द रहना चाहिये ख़ास तौर से तब तो और भी ज़्यादा जबकि वे दोनों दो मुल्कों के प्रतिनिधि बनकर मिल रहे हों ।श्‍ोख अल मख़तूम यू ए ई के प्रधानमन्त्री और उप राष्ट्रपति हैं । वह भारत आये तो उन्हें भारतीय महिला से अरब और इसलामी परम्परा के अनुरूप दूर से ही सलाम करना चाहिये था और भारतीय ने़त्री को भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही मेहमान को दूर से ही नमस्कार करना चाहिये था लेकिन दोनों ने हाथ मिलाया ।क्यों ?लोग समझते हैं कि इसलाम और भारतीय संस्कृति की कोई बात भी नहीं मिलती । उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिये

20 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें!:

DR. ANWER JAMAL Sunday, March 14, 2010 10:22:00 PM  

लोग समझते हैं कि इसलाम और भारतीय संस्कृति की कोई बात भी नहीं मिलती । उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिये

भारतीय नागरिक - Indian Citizen Sunday, March 14, 2010 10:29:00 PM  

यह सब सुविधाओं के रिश्ते हैं.

VICHAAR SHOONYA Sunday, March 14, 2010 10:30:00 PM  

alwayse think positive. it is not the meeting between a man and a woman but it a meeting of two high dignitaries representing their countries under the internatinal code of conduct which unfortunately is not as per our cultures.

अवधिया चाचा Sunday, March 14, 2010 11:01:00 PM  

अरे बेटा जमाल कहाँ कुछ कर रहे हैं, चित्र के अनुसार तो करने वाले हैं, बेटा इसमें धर्म की नहीं संगत की बात है, जैसी संस्कृति में पलोगे बढोगे वैसे तुम हो जाओगे, अब तुम अपने को ही देख लो कभी अवध गये होते तो अवधिया तहजीब सीखते, अवध वालों जैसी बात करते, खेर तुम यह साबित करने में कामयाब रहे कि दोनों की संस्कृति मिलती जुलती हैं

अवधिया चाचा
जो कभी अवध न गया

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" Monday, March 15, 2010 12:17:00 AM  

भारतीय संस्कृ्ति इतनी संकीर्ण नहीं है कि हाथ मिलाने से नष्ट हो जाए। ओर एक बात कहूँगा कि आपकी इस पोस्ट का शीर्षक बेहद बकवास और बेहूदा लगा..

boletobindas Monday, March 15, 2010 12:53:00 AM  

क्या बकवास है....भारतीय संस्कति हाथ मिलाने से खत्म नही होती....भारत में हाथ मिलाने की परंपरा भले ही नहीं रही. पर हाथ मिलाने से मना कहीं नहीं किया गया है.भारतीय सभ्यता हजारों साल पुरानी है....1500 साल पुरानी नहीं...कुपया ध्यान दें..इसे संकुचित न बनाएं जो किसी औऱत या आदमी को आम जिदगी न जीने दे...इसमें औऱत अगर गले नहीं मिलकर स्वागत नहीं करती तो हाथ मिलाने से कोई समस्या भी नहीं होती..हाथ मिलाना एक अच्छा तरीका है..इसे अपनाने में किसी भारतीय को कोई आपत्ति नहीं है..हां अगर आपको समस्या है तो न मिलाएं पर अपनी संकुचित सोच को भारतीच संस्कुति का नाम न दें...और हां, अरब के शेख को क्या करना चाहिए ये बताने की हमारे देश के किसी नागरिक को कोई हक नहीं है....

रचना Monday, March 15, 2010 10:02:00 AM  

aap ki maansiktaa kitni dushit haen yae is post ki heading sae hi pataa chal gayaa aur

lucknow kaa naam hamesha "Susanskrit soch aur bhasha " kae saath aataa haen lekin afsos haen ki lucknow bloggers association kewal aur kewal muslim - hindu , naari purush mae dubbi haen

lucknow shehar mae kehaa jaataa haen ki muslim ghar aur hindu ghar ki diwaale itni milli haen ki ek ghar ki saansae dusrae ghar tak jaatee haen

aaj tak wahaan jehadi log dono sanskritiyon mae jhadaa nahin karvaa paaye


lucknow bloggers aasociation sae vinarm nivedan ahen is manch ki garima ko banaaye rakahe kyuki maerae lucknow kaa naam aapp ne jodaa haen

aur agaer is prakaar ki post aur heading yahaan daeni haen to please for gods sake lucknow kaa naam to hataa hi dae


MAERI AAPTI DARJ KAREY

अल्पना वर्मा Monday, March 15, 2010 10:31:00 AM  

अमीरात में अभिवादन स्वरुप हाथ मिलाना एक स्वस्थ परम्परा है.
आप की इस पोस्ट का शीर्षक बेहद खराब है और यह पोस्ट भी हटा देनी चाहिये.
कृपया इस तरह ग़लत सन्देश न पहुंचाएं.न ही किसी सम्मानित व्यक्ति की छवि पर प्रश्न लगायें.
दो देशों के बीच जहाँ सम्बन्ध मजबूत करने की बात हो रही है वहाँ आप इस तरह की बातें लिख रहे हैं.क्या अपने ब्लॉग पर हिट बढ़ने के लिए या एक नयी बहस शुरू करने के लिए ?
अगर आप को अमीरात की सभ्यता और संस्कृति के बारे में सही जानकारी चाहिये तो इस देश में आकर देखीये या पढीये.फिर कुछ लिखीये.

रेखा श्रीवास्तव Monday, March 15, 2010 10:33:00 AM  

भारतीय संस्कृति संकीर्ण नहीं है, जब हम बच्चों को विदेश में शिक्षित करने भेज देते हैं तो वहाँ तो हमें उनकी संस्कृति के अनुसार ही आचरण करना पड़ता है और वही शोभनीय है. अगर आप हाथ बढ़ा रहे हों और उसके स्थानपर दूसरे का नमस्कार करना अपमानजनक प्रतीत होता है. भारतीय संस्कृति बहुत विशाल है और सद्गुणों को अपने में समाहित करती आ रही है.

किरण राजपुरोहित नितिला Monday, March 15, 2010 12:15:00 PM  

tahzeeb kahti hai ki pahle jo abhiwadan kare usi ke anuruup hi jawab dena chahiya .us hisaab se hath milane ki tahzeeb mein hath milane se abhiwadan prua hoga . yadi mhila namaste karti to asbhay hota .
vaise bhi bharat me hathmilane ki parampra hai .
ek dusre ke abhiwadan ka samman har sanskriti ka hissa hai .
yu bhi hath milane se insaan dushit nahi hota .

अज्जु कसाई Monday, March 15, 2010 12:20:00 PM  

@ रचना मेडम से सहमत

सलीम ख़ान Monday, March 15, 2010 2:14:00 PM  

पाठक बन्धुवों और टिपण्णीकर्ताओं!!!

आपने शायेद डॉ साहब की इस पोस्ट का मर्म नहीं समझा; वह दिए गए सन्दर्भ में दो देशों की समानता के बारे में बता रहे थे लेकिन जैसा कि होता आया है कि आओ देखा न ताव हो गए पुरवाग्रही.......

प्लीज़ डोंट बी पूर्वाग्रही जस्ट बी ओनेस्ट !!!

सलीम ख़ान

सलीम ख़ान Monday, March 15, 2010 2:17:00 PM  

और हाँ सामान्यतया मानसिकता यही है कोई शेख ख़ास कर अरब का किसी महिला के साथ क्या करेगा.....वही सोचा आपने.... गलत नहीं आप आपकी मानसिकता ही ऐसी बना दी गयी है

Mired Mirage Monday, March 15, 2010 2:26:00 PM  

आपका लेख और उसका शीर्षक आपत्तिजनक है।
जब स्त्रियाँ खेल कूद में मैच के बाद हाथ मिलाती हैं तब? यदि वे मिक्स्ड डबल्स खेलती हैं तब? क्या आप उनसे हाथ जोड़ने की अपेक्षा करते हैं या चरण स्पर्श की? या कि आप समझ ही नहीं पाते कि स्त्रियाँ खेलना ही क्यों चाहती हैं? जैसे यहाँ शायद आप यही नहीं समझ पा रहे होंगे कि ये स्त्री यहाँ कर क्या रही हैं, घर में क्यों नहीं हैं?
घुघूती बासूती

samatavadi Monday, March 15, 2010 2:47:00 PM  

"अरब शेख क्या कर रहे हैं ? " - यह सवाल पोस्टकर्ता ने पूछा है और सलीम खान ने ! किसी टिप्पणीकर्ता ने इस दृष्टि से चित्र नहीं देखा । लाजमी तौर पर सड़ी मानसिकता की पहचान आसानी से हो जा रही है। टिप्पणीकर्ताओं ने एक प्रधान मन्त्री द्वारा दूसरे प्रधान मन्त्री से अपने काबीना सहयोगियों का तार्रुफ़ कराये जाने को आपत्तिजनक कत्तई नहीं माना है । चिट्ठेकार और सलीम क्यों मानते हैं कि हर शेख फ़ार्रुख़ शेख़- सुप्रिया पाठक,स्मिता पाटिल,नासिर्रुद्दीन शाह वाली ’बाजा्र ’ फिल्म वाले होंगे ?

मिहिरभोज Monday, March 15, 2010 5:00:00 PM  

आपका शीर्षक निहायत ही बेहुदा है......भारतीय संस्कृति किसी के हाथ मिलाने से कहीं भ्रष्ट नहीं होती.....हां अरब संस्कृति के बारें मैं ज्ञान कम हैं.....

मिहिरभोज Monday, March 15, 2010 5:04:00 PM  

और हाँ सामान्यतया मानसिकता यही है कोई शेख ख़ास कर अरब का किसी महिला के साथ क्या करेगा.....वही सोचा आपने.... गलत नहीं आप आपकी मानसिकता ही ऐसी बना दी गयी है ....सलीम खान साहब अरब शेखों के बारें मैं सब को सब मालूम है पर आप को कुछ न हो ये पता नहीं....लखनऊ और हैदराबाद की गलियों मैं ढूंढकर देखें....बहुत सी कहानियां मिलेंगी....छोटी छोटी बच्चियों के साथ अपराधों की असंख्य घिनौनी कहानियां सुनने को मिलेंगी

Tarkeshwar Giri Monday, March 15, 2010 5:18:00 PM  

Dr Anwar Jamal , Kanha fans gaye in paramprao main. Badlo apni soch ko EK HINDUSTANI BANO MERE BHAI.

दीपक 'मशाल' Monday, March 15, 2010 5:43:00 PM  

sabhi log theek kah rahe hain iska sheershak sirf aur sirf logon ko akarshit karne ke liye likha gaya hai.. is chitra ko lekar bhi hai-tauba machane ki koi jarurat nahin.. aisi post Lucknow Blogger's association ki garima ko dhoomil karti hain..
ye behad afsosjanak hai ki abhi tak yah post nahin hatayi gai.
Shayad sharm bhi nahin aa rahi aapko abhi tak.

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