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सोमवार, सितंबर 06, 2021
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शिक्षक दिवस पर
मिथिलेश जी के लिए-
तुम्हें आकाश छूना है धरा पर पग जमा तो लो
उमगकर नर्मदा जैसे अमर कलकल सुना तो दो
बहुत सामर्थ्य है तुममें, न खुद को कम तनिक आँको
मिलेगा लक्ष्य कर संकल्प दृढ़ पग तुम बढ़ा तो दो
*
विनीता जी के लिए 
नहीं सीमा मिली आकाश की पग थक गए सारे
विनीता बुद्धि के संकल्प से कंटक सभी हारे
मिली श्री वास्तव में उसे जो नित साधना करता
स्वयं आकर सफलता खड़ी हो जाती विहँस द्वारे
*
अनिल जी के लिए 
बना रसायन रसायन, पाई कीर्ति दिगन्त
अनिल अनल सम प्रकाशित, प्रतिभा मिली अनंत
काव्य रसायन को करो, दिन दिन अधिक समृद्ध 
हिंदी में लिख शोध नव पाओ कीर्ति दिगंत
*
अर्चना जी के लिए 
कोकिलकंठी अर्चना, सुनें शारदा मात
मन ही मन मुस्का रहीं, दे खुशियाँ सौगात 
सप्तसुरी संसार में सतरंगा साफल्य
सदा द्वार पर हो खड़ा जैसे नवल प्रभात
*
मुकुल जी के लिए 
अधरों पर मुस्कान धरे, पिक वाणी ले पाथेय
विविध दिशाओं में ध्वज फहरे, सहज मिले हर ध्येय
सदय रहें हरिकृष्ण हमेशा, कीर्ति सूर्य अजिताभ 
जो चाहो पारंगत उसमें, रहे न कुछ अज्ञेय
*
आलोकरंजन जी के लिए 
भारती की आरती, उतारते रहें न भूल तारती है भक्ति, भाव सलिला नहाइए।
गद्य-पद्य लिखें नया, सत्य-तथ्य भी हो भरा, सत्य शिव सुंदर सृजन कर पाइए।।
रंजन आलोक करे, प्रतिभा के सूर्य का, पले हो पलामू में, ध्वजा फहराइए।
विश्ववाणी भारती हो, ठान लें अगर सभी, हिंदी ध्वज आन-बान-शान से फहराइए।।
*
संतोष जी के लिए 
स्नेह सहित वंदन अभिनंदन, माथे तिलक सुशोभित हो
पढ़ें काव्य कालिंदी हरि हरि भी, राधा उस पर मोहित हो
खुशियों की सौग़ात मिले नित, सौर सोरठा नित जन्मे-
ऊषा-संध्या करे आरती, गह संतोष विमोहित हो
*
शोभित जी के लिए 
इलैक्ट्रानिकी शीश के, बने रहो तुम ताज
हिंदी में तकनीक लिख, पाओ यश हृद-राज
तक्षशिला आचार्य सम, तक्षशिला में बैठ
पढ़ा यांत्रिकी गढ़ सको, शुभ भविष्य तुम आज
*
जयप्रकाश जी के लिए 
गीत गीत में प्रीत भर, जय प्रकाश की बोल
जयप्रकाश जी ने रचा, है साहित्य अमोल
कर अवगाहन धन्य हो, जाग्रत सकल समाज 
नवगीतों में रख दिया, अंतर्मन निज खोल
समय का सत्य कह दिया
गरल को अमिय कर दिया
*
मनोरमा सानिंध्य की भेंट अनूठी देख
चकित सलिल कर रहा है सुधियों का अभिलेख 
शिक्षा पा-दे सकूँ तो हो यह जीवन धन्य 
शिक्षक गरिमा अनूठी इस सी कहीं न अन्य

आसमान को नाप ले, पाखी निज पर तोल
हर उड़ान हो निरुपमा, बनें प्रेरणा बोल
कांता सम हितकारी
शक्तिमय युक्ति हमारी
*
पुनीता जी के लिए 
बच्चे सच्चे बन सकें, तुम सा शिक्षक देख
समय शिला पर लिख रहा  हर दिन यह अभिलेख 
पुनीता सलिला शिक्षा
गये जो माँगे न भिक्षा
*
गुरु दंपत्ति के लिए 
शिक्षक हो यदि गुरु सदृश, खिले मंजरी खूब 
शिष्य चमक अरविंद सम, पढ़े विषय को डूब
सफलता कदम चूमती
विहँस तकदीर झूमती
*
चातक जी के लिए 
गुरु रमेश तो आप हों, विधि शिव भी आ छात्र 
चातक सँग हर पल बने, स्वाति नित ही मात्र
भाग्य निर्माता अपना
हरेक पूरा हो सपना
*
निशि जी के लिए 
निशि वासर दें मुस्कुरा ज्ञान, न माँगे हार
शर्माकर बाधा पलट, आप मान ले हार
सीख ले अलंकार रस
छंद नव सीख; न कर बस
*
किरण जी
शिक्षक हो आशा किरण, पुष्पा सुषमा झूम
कोशिश करती अनवरत, सतत सफलता चूम
सँवारे अपनी किस्मत 
छात्र मत सारे हिम्मत
*
अर्चना जी
भीख न शिक्षक माँगता, रखता साथ रमेश
जोड़े हाथ कुबेर भी, उसके मौन हमेश
वास्तव में श्री पाता
ज्ञान दे बने विधाता
*
साधना जी
कभी न बोलें साध ना, करें साधना मौन
ज्ञान दान दें अनवरत, कभी न पूछें कौन?
प्रेरणा देती रहतीं
नर्मदा जैसे बहतीं
*
आदरणीया इला जी
सतत न शिक्षा मात्र दें, मौन दिखाएँ राह।
जो पा ले आशीष वह, पाए जग में वाह
सृजन हो नेक रीति का
घोष हो सदा कीर्ति का
*
आदरणीय सुरेश दादा
ज्ञान सिंधु सादे सरल, विनम्रता की मूर्ति
छात्रों को जो चाहिए, जब तब करते पूर्ति
खुशकिस्मत हम दरश पा
सिर पर आशिष परस पा
*
कलाकारों के लिए 
थामे जिसके हाथ, हस्तकला की अस्मिता
कला कहे युग सत्य, अनुकृति उसकी अर्जिता
श्वास हर संगीता हो
लक्ष्य हर हँस जीता हो
*
स्मृति शुक्ला
शब्द शब्द में अर्थ समाहित कर जो बोले
अमिय लुटाने ज्ञान कलश का ढक्कन खोले
शुक्ला स्मृतियाँ श्यामा यादों को  प्रकाश दे
सहज सरलता संजीवित कर  षडरस घोले
*
नीना उपाध्याय 
सहज वाग्मिता विषयों का विश्लेषण करती
सृजनधर्मिता आशय नवल प्रकाशित करती
उप अध्याय विशद हो नव अध्याय बनाते
श्रोता सुनते करतल ध्वनि से नभ गुंजाते
*
नीना उपाध्याय 
सहज वाग्मिता विषयों का विश्लेषण करती
सृजनधर्मिता आशय नवल प्रकाशित करती
उप अध्याय विशद हो नव अध्याय बनाते
श्रोता सुनते करतल ध्वनि से नभ गुंजाते
*
डॉक्टर अनामिका तिवारी
रामानुज तनया संगीत नृत्य पारंगत 
पादप विज्ञानी यश कीर्ति कमाई अक्षत
गद्य-पद्य लेखन में निपुण न कोई सानी
कृषि छात्रों को ज्ञान दान दे; हो चिर वंदित
*
प्रो संजय वर्मा
संजय! जय कर पराजय, पाओ विजय सदैव
अथक अनवरत सफलता तुम्हें सदा दें दैव
वर्मा रक्षक धर्म का, कर्म करे दिन-रात
मर्म समय का समझकर, तक को करे प्रभात
*
देवकांत मिश्र 
सत रज तम मिश्रित प्रकृति देव कांति के साथ 
सत शिव सुंदर हम रचें सतत नवाकर माथ
जो पाया वह बाँटकर हों संपन्न प्रसन्न 
सत चित आनंद पा सकें ईश कृपा आसन्न
*
छाया त्रिवेदी
बालारुण शत प्रकाशित, करते हैं आभार 
अँगुली थाम पथ दिखाकर, स्वप्न किया साकार
मन्वन्तर छाया गहे, तुहिना पाकर लाड़
जीवन पथ पर बढ़ करें, नमन करो स्वीकार
*
साधना उपाध्याय 
सरस्वती तनया विनत, प्रखर ज्योति आलोक
काम करे निष्काम रह, कंटक सके न रोक
कृष्णकांत कांता सुदृढ़, पग रख थामे हाथ 
कई पीढ़ियाँ गढ़ सकी, आलोकित कर लोक
हम सब चरणों में प्रणत
दो आशीष रहें प्रगत
*
वीणा तिवारी जी
शारद-रमा-उमा त्रयी, झलक आपमें व्याप्त
वीणा की झंकार सम, वाणी अनहद आप्त
रामचंद्र के दास की, पाई कृपा अशेष
श्याम हुए गुरुबंधु खुद, है संयोग विशेष
गीता अनुरागिनी नमन
किया सुवासित जग चमन
*
निशा तिवारी
ज्ञान गगन शिक्षा धरा, निशा सुदृढ़ है सेतु
तारे कोशिश सफलता चंद्र बना यश हेतु
शिक्षण लेखन प्रकाशन, तीनों साधे खूब
पढ़ बढ़ गढ़ पीढ़ी नई, गईं खुशी में डूब
*
महीयसी महादेवी जी
देवी त्रय साकार हो, बनें एक अवतार 
बंधु निराला शिव सदृश, दे नैकट्य दुलार
छायावादी मनीषा, गाँधीवादी नीत
आदर्शों की स्वामिनी, सत् से पाली प्रीत 
शुभाशीष पा सके हम, सचमुच है सौभाग्य 
कर्मव्रती हम सब बनें, फल से रखें न राग
*
अंबिकाप्रसाद 'दिव्य'
बापू के आदर्श से, जीवन सके सँवार
ऋषियों सम जीवन जिया, नित रच नव आचार
शिक्षा से आजीविका, हस्तकला से दाम
छात्र स्वनिर्भर हो सके, रहे नहीं बेकाम
महानात्मा शत वंदन
समर्पित श्रद्धा चंदन
*

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मंगलवार, अगस्त 24, 2021
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गीत
बेचता हूँ
संजीव
*
ले लो हुजूर मैं देश बेचता हूँ
जो शर्म बची है शेष बेचता हूँ
*
बोली बोलो बढ़-चढ़कर तुम यारों
मत झिझको-हिचको किंचित भी प्यारों
पंडे झंडे डंडे जो चाहो लो
मंदिर मस्जिद गिरिजा अरु गुरुद्वारों
ईमान धर्म अवशेष बेचता हूँ
ले लो हुजूर मैं देश बेचता हूँ
*

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शनिवार, जुलाई 10, 2021
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आँख की महिमा भारी
*
आँख खुली तो जनम हो गओ, आँख मुँदी तो मरन।
आँख मिली झुक उठ लड़ गई तो, आँख लग गई लगन।।
आँख दिखाई बैर पल गओ, आँख लाल की जलन।
आँख नटेरी, आँख फूट गई, कोऊ नें रै गओ स्वजन।।
आँख से करिए यारी
आँख की महिमा भारी
*
आँख बस गओ हाय रे, आँख खों अंजन घाईं।
आँख बचाकर आँख नें, करी आँख पहुनाई।।
आँख आँख बैरन भईं, फूटी आँख नें भाईं।
आँख कलेजो चीरकर, रो-रो आँख गँवाईं।।
आँख कर रई अय्यारी
आँख की महिमा भारी
*
आँख समा गओ आप तो, टँसुआ आँख बहाए।
आँख भई मीरा मगन, सूर स्याम पतियाए।।
आँख दिवानी राधिका, नैना स्याम बसाए।
आँख चार भईं, फेर लईं, आँधर राह दिखाए।।
आँख है तेज कटारी
आँख की महिमा भारी
*
संजीव 
९४२५१८३२४४
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शनिवार, जून 19, 2021
मिल्खा सिंह का निधन- एथलेटिक्स के एक युग का अंत

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            भारत के महान धावक एवं एथलेटिक्स में देश का गौरव बढ़ाने वाले पद्मश्री मिल्खा सिंह जी का गत दिवस (शुक्रवार )को निधन 91 वर्ष कीआयु में निधन हो गया. वे कोरोना संक्रमण से ग्रसित थे.
            मिल्खा सिंह जी का जन्म 20 नवंबर 1929 को अविभाजित भारत के गोविंदपुरा में  एक किसान परिवार में हुआ था. वे अपने माता पिता की  15 संतानों में से एक थे. विभाजन की त्रासदी  के दौरान उनके माता-पिता  एवं आठ भाई-बहन मारे गए. इस  भयावह हादसे  के बाद मिल्खा सिंह पाकिस्तान से ट्रेन की महिला बोगी में छिपकर किसी तरह दिल्ली पहुंचे.
           मिल्खा सिंह जी ने देश के  विभाजन के बाद दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में अपने दुखदायी दिनों को याद करते हुए एक बार कहा था, '"जब पेट खाली हो तो देश के बारे में कोई कैसे सोच सकता है? जब मुझे रोटी मिली तो मैंने देश के बारे में सोचना शुरू किया." इन विषम परिस्थितियों से उत्पन्न आक्रोश ने उन्हें आखिरकार असाधारण लक्ष्य तक  पहुॅंचा दिया. उन्होंने कहा था, 'जब आपके माता-पिता को आपकी आंखों के सामने मार दिया गया हो तो क्या आप कभी भूल पाएंगे... कभी नहीं.'
             मिल्खा सिंह 'फ्लाइंग सिख' के नाम से जाने जाते थे.  2016 में 'इंडिया टुडे' को दिए इंटरव्यू में उन्होंने इसके पीछे की घटना बतायी ," 1960 में उनको पाकिस्तान की "इंटरनेशनल एथलीट प्रतियोगिता' में भाग लेने का आमंत्रण मिला था. पर देश के विभाजन की त्रासदी के अपने दुःखद अनुभव को  भुला नहीं पा रहे थे, और पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब यह बात पता चली तो उन्होंने मिल्खा सिंह को समझाया.  तब वे पाकिस्तान जाने के लिए राजी हुए.
             पाकिस्तान में उस समय अब्दुल खालिक की तूती बोलती  थी जो वहाँ  के वह सबसे तेज धावक थे. प्रतियोगिता के दौरान लगभग 60000 पाकिस्तानी फैन्स अब्दुल खालिक का जोश बढ़ा रहे थे, लेकिन मिल्खा सिंह की रफ्तार के सामने खालिक टिक नहीं पाए थे.  
              इस जीत के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' का नाम  से संबोधित किया और वे इस नाम से जाने जाने लग."
               मिल्खा सिंह चार बार  एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता रहे. उन्होंने 1958 के  'कामनवैल्थ गेम्स' में भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया था.  1959 में उन्हें खेलों में योगदान के लिये देश के महान सम्मान 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया. उन्होंने 1956, 1960   एवं1964  के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. यद्यपि उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन  1960 के 'रोम ओलंपिक' में था, जिसमें वे 400 मीटर फाइनल में चौथे स्थान पर रहे थे.
            'राष्ट्रमंडलीय  और एशियाई खेलों' के स्वर्ण पदक विजेता मिल्खा सिंह के नाम 400 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड 38 साल तक रहा.
             मिल्खा सिंह जी के महाप्रयाण के साथ एथलीट के एक युग का अवसान हो गया. वे ऐसे व्यक्तित्व थे जिनका देशवासियों जिनका  के ह्रदय में विशेष सम्मान था.  देश के ऐसे महान रत्न को विनम्र श्रद्धांजलि.
                               🙏🙏🙏

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सोमवार, जून 07, 2021
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एक रचना-
*
शिव-राज में
शव-राज की
जयकार कीजिए.
*
मर्ज कर्ज का बढ़ाकर
करें नहीं उपचार.
उत्पादक को भिखारी
बना करें सत्कार.
गोली मारें फिर कहें
अन्यों का है काम.
लोकतंत्र का हो रहा
पल-पल काम तमाम.
दे सर्प-दंश
रोग का
उपचार कीजिए.
शिव-राज में
शव-राज की
जयकार कीजिए.
*
व्यापम हुआ गवाह रहे
हैं नहीं बाकी.
सत्ता-सुरा सुरूर चढ़ा,
गुंडई साकी.
खाकी बनी चेरी कुचलती
आम जन को नित्य.
झूठ को जनप्रतिनिधि ही
कह रहे हैं सत्य.
बाजीगरी ही
आंकड़ों की
आप कीजिए.
शिव-राज में
शव-राज की
जयकार कीजिए.
*
कर-वृद्धि से टूटी कमर
कर न सके कर.
बैंकों की दे उधार,गड़ी
जमीन पे नजर.
पैदा करो, न दाम पा
सूली पे जा चढ़ो.
माला खरीदो, चित्र अपना
आप ही मढ़ो.
टूटे न नींद,
हो न खलल
ज़हर पीजिए.
शिव-राज में
शव-राज की
जयकार कीजिए.
****
७-६-२०१७
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पुस्तक सलिला
'सही के हीरो' साधारण लोगों की असाधारणता की मार्मिक कहानियाँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- सही के हीरो, कहानी संग्रह, ISBN 9789385524400, डॉ. अव्यक्त अग्रवाल, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण पेपर बैंक बहुरंगी, कहानीकार संपर्क- डी ७ जसूजा सिटी, जबलपुर ४८२००३]
*
मनुष्य में अनुभव किये हुए को कहने की अदम्य इच्छा वाक् क्षमता के रूप में विकसित हुई। अस्पष्ट स्फुट ध्वनियाँ क्रमशः सार्थक संवादों के रूप में आईं तो लयबद्ध कहन कविता के रूप में और क्रमबद्ध कथन कहानी के रूप में विकसित हुए। कहानी, कथा, किस्सा, गल्प, गप्प और चुटकुले विषयवस्तु के आकार और कथ्य के अनुरूप प्रकाश में आये। गद्य में निबन्ध, संस्मरण, यात्रावृत्त, व्यंग्य लेख, आत्मकथा, समीक्षा आदि विधाओं का विकास होने के बाद भी कहानी की लोकप्रियता सर्वकालों में सर्वाधिक थी, है और रहेगी। कहानी वह जो कही जाए, अर्थात उसमें कहे जाने और सुने जाने योग्य तत्व हों। वर्तमान पूँजीवादी राजनीति-प्रधान व्यक्तिपरक जीवन शैली में साहित्य संसाधनों और पहुँच के सफे पर हाशिये में रखे जा रहे जीवट और संघर्ष को पुनर्जीवन दे रहा है।
स्वतंत्रता के पश्चात अहिंसा की माला जपते दल विशेष ने सत्ता पर और हिंसा पर भरोसा करनेवाले अन्य दल विशेष ने शिक्षा संस्थानों और साहित्यिक अकादमियों पर कब्ज़ा कर साहित्यिक विधाओं में वैषम्य और विसंगतियों के अतिरेकी चित्रण को सामने लाकर सामाजिक संघर्ष को तेज करनेवाले साहित्य और साहित्यकारों को पुरस्कृत किया। फलतः, आम आदमी के नाम पर स्त्री-पुरुष, संपन्न-विपन्न, नेता-जनता, श्रमिक-उद्योगपति, छात्र-शिक्षक, हिन्दू-मुस्लिम आदि के नाम पर टकराव ने सद्भाव, सहयोग, सहकार, विश्वास, निष्ठा आदि को अप्रासंगिक बनने का काम किया। इस पृष्ठभूमि में अत्यन्त अल्प संसाधनों और पिछड़े क्षेत्र से संघर्ष कर स्वयं को विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में स्थापित कर, अपने मरीजों के इलाज के साथ-साथ उनके जीवन-संघर्ष को पहचान कर मानसिक संबल देनेवाले डॉ. अव्यक्त अग्रवाल ने निर्बल का बल बनने के अपने महाभियान में विवेच्य कहानी संग्रह के माध्यम से पाठकों को भी सहभागी बनने का अवसर दिया है।
इस कहानी संग्रह के अधिकांश पात्र निम्न जीवन स्तर और विपन्नता की मेंड़ पर लगातार चुभ रहे काँटों के बीच पैर रखते हुए आगे बढ़ते हैं। नियति ने भले ही इन्हें मरने के लिए पैदा किया हो पर अपनी जिजीविषा के सहारे ये मौत के अनुकूल परिस्थितियों से जूझकर जीवन का राजमार्ग तलाश पाते हैं। साहित्य के प्रभाव, उपयोगिता और पठनीयता पर प्रश्न उठानेवाले इस संग्रह को पढ़ें तो उनके जीवन की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता का वरण कर सकेगी। परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँसकर लहूलुहान होते हुए भी ऊपर उठने और आगे बढ़ने को प्रेरित करते इस कथा-संग्रह में कथाकार शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता है। कहानी के पात्र पारिस्थितिक वैषम्य और विसंगति के हलाहल को कंठ में धारकर अपने सपने पूरे होते देखने का अमृत पान करते हुए कहीं काल्पनिक प्रतीत नहीं होते। ये कहानियाँ वास्तव में कल से प्राप्त विरासत को आज सँवार-सुधार कर कल को उज्जवल थाती देने का सारस्वत अनुष्ठान हैं।
'सही के हीरो' शीर्षक और मुखपृष्ठ पर अंकित देबाशीष साहा द्वारा निर्मित चित्र ही यह बता देता कि आम आदमियों के बीच में से उभरते हुए चरित नायक अपनी भाषा, भूषा, सोच और संघर्ष के साथ पाठक से रू-ब-रू होंगे। मर्मस्पर्शी कहानियाँ तथा प्रेरक कहानियाँ और संस्मरण दो भागों में क्रमशः १० + १८ कुल २८ हैं। संस्मरणात्मक कहानियाँ, पाठक को देखकर भी अनदेखे किये जाते पलों और व्यक्तियों से आँखें मिलाने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं। पात्रों और परिवेश के अनुकूल शब्द-चयन और वाक्य-संरचना कथानक को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। अंतर्जाल पर सर्वाधिक बिकनेवाले संग्रहों में सम्मिलित इस कृति की प्रथम कहानी 'लाइफगार्ड' के नायक एक बेसहारा बच्चे विक्टर को फ्रांसिस पालता है, युवा विक्टर अन्य बेसहारा बच्चे एडम को अपना लेता है और उसे विमाता से बचाने के लिए अपनी प्रेमिका से विवाह करने से कतराता है। डूबते फ्रांसिस को बचाते हुए मौत के कगार पर पहुँचे विक्टर की चिकित्सा अवधि के मध्य विक्टर की प्राणरक्षा की दुआ माँगते एडम और मारिया
एक दूसरे केइतने निकट आ जाते हैं कि नन्हा एडम विक्टर से मारिया मम्मी की माँग कर उसे नया जीवन देता है।
कहानी 'चने के दाने' एक न हो सके किशोर प्रेमियों के पुनर्मिलन की मर्मस्पर्शी गाथा है। कठोर ह्रदय पाठकों की भी ऑंखें नम कर सकने में समर्थ 'आधी परी' तथाकथित समझदारों द्वारा स्नेह-प्रेम की आड़ में अल्पविकसित का शोषण करने पर आधारित है। तरुणी प्रीति के बहाने जीवनसाथी चुनते समय स्वस्थ्य - समझ का संदेश देती है 'पासवर्ड' कहानी। 'एक अलग प्रेम कहानी' साधनहीन ग्रामीण दंपति के एकांतिक प्रेम के समान्तर चिकित्सक-रोगी के बीच महीन विश्वास तन्तु के टूटने तथा बढ़ते व्यवसायीकरण को इंगित करती व्यथा-कथा है। पारिवारिक रिश्तों के बिखरने पर केंद्रित चलचित्र 'बावर्ची' में नायक घरेलू नौकर बनकर परिवार के सदस्यों के बीच मरते स्नेह बंधन को जीवित करता है। कहानी जादूगर में नायिका के कैशोर्य काल का प्रेमी जो अब मनोचिकित्सक है, नायिका में उसके पति के प्रति घटते प्रेम को पुनर्जीवित करता है। 'बहुरुपिया' में साधनहीन भाई-बहिन का निर्मल प्रेम, 'आइसक्रीम कैंडी' में राजनेताओं के कारण आहत होते आमजन, 'ज़िंदगी एक स्टेशन' में बदलते सामाजिक ढाँचे के कारण स्थापित व्यवसायों के अलाभप्रद होने की समस्या और समाधान तथा 'मेरा चैंपियन' में पिता के सपने को पूरा करते पुत्र की कहानी है।
दूसरे भाग में 'सही का हीरो' एक साधनहीन किन्तु अपने सपने साकार करने के प्रति आत्मविश्वास से भरे बच्चे की कथा है। 'गूगल' किसी घटना को देखने के दो भिन्न दृष्टिकोण, 'मैं ठीक हूँ' मौत के मुख से लौटी नन्हीं बच्ची द्वारा जीवन की हर साँस का आनंद लेने की सीख, 'दुश्वारियाँ एक अवसर' अपंग बच्चे के संकल्प और सफलता, 'सफलता मंत्र' जीवन का आनंद लेने, 'मेरी पचमढ़ी और मैं' संस्मरण, 'आसान है' में सच को स्वीकार कर औरों को ख़ुशी देने, 'उमैया एक तमाशा' विपन्न बच्चों में छिपी प्रतिभा, 'एक और सुबह' बचपन की यादों, 'फाँस' जीवनानंद की खोज, 'लोकप्रियता का रहस्य' अपनी क्षमताओं की पहचान, 'वो अधूरी कहानी' जीवन के उद्देश्य की पहचान, 'सफलता सबसे शक्तिशाली मंत्र ' निज सामर्थ्य से साक्षात्, 'स्वतः प्रेरणा' मन की आवाज़ सुनने, 'हम सब रौशनी पुंज' निराशा में आशा, 'हवा का झौंका समीर' में बेसहारा बच्चों के लालन-पालन तथा 'ज़िन्दगी एक चैस बोर्ड' में अपने उद्देश्य की तलाश को केंद्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना गया है।
'सही का हीरो' कहानी संग्रह की विशेषता इसमें साधारणता का होना है। अधिकांश कहानियाँ जीवन में घटी वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं। यथार्थ को कल्पना का आवरण पहनाते समय यह ध्यान रखा गया है कि मूल घटना और पात्रों की विश्वसनीयता, उपयोगिता और सन्देशवाहकता बनी रहे। अधिकांश घटनाएँ और पात्र पाठक के इर्द-गिर्द से ही उठाये गए हैं किन्तु उन्हें देखने की दृष्टि, उनके मूल्याङ्कन का नज़रिया और उसने सीख लेने का हौसला बिलकुल नया है। इन कहानियों में अभाव-उपेक्षा, टकराव-बिखराव, सपने-नपने, गिराव-उठाव, निराशा-आशा, अवनति-उन्नति, विफलता-सफलता, नासमझी और समझदारी अर्थात जीवन रूपी इंद्रधनुष का हर रंग अपनी चमक और चटख के साथ उपस्थित है। नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय, पाठक को लड़ने, बदलने और जीतने का सन्देश देती है। शिल्प की दृष्टि से ये रचनाएँ कहानी, लघुकथा, संस्मरण, शब्द चित्र आदि विधाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
डॉ. अव्यक्त अग्रवाल की भाषा सहज, सरस, सुगम, विषय, पात्र और परिवेश के अनुकूल है। किसी पहाड़ी से नि:सृत निर्झर की तरह अनगढ़पने में देने की आकुलता, नया ग्रहण करने की आतुरता और सबको अपना लेने की उत्सुकता पात्रों को जीवंत और प्रेरणादायी बनाती है। अव्यक्त जी खुद घटना को व्यक्त नहीं करते, वे पात्र या घटना को सामने आने देते हैं। कम से कम में अधिक से अधिक कहने का कौशल सहज नहीं होता किन्तु अव्यक्त जी इसे कुशलतापूर्वक साध सके हैं। वे पात्र के मुँह में शब्द ठूँसने या कहलाने का कोई प्रयास नहीं करते। उनके पात्र न तो भदेसी होने का दिखावा करते हैं, न सुसंस्कृत होने का पाखण्ड। कथ्य संक्षिप्त - गठा हुआ, संवाद सारगर्भित, भाषा शैली सहज - प्रचलित, शब्द चयन सम्यक - उपयुक्त, मुहावरों का यथोचित प्रयोग, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन के अनुसार प्रयोग पाठक को बाँधता है। इस उद्देश्यपूर्ण कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्य में शुमार होना आश्वस्त करता है कि हिंदी तथा साहित्य के प्रेमी पाठकों का अभाव नहीं है। सही के हीरो' ही देश और समाज का गौरव बढ़ाकर मानवता को परिपुष्ट करते हैं। अव्यक्त जी को इस कृति हेतु बधाई। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
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-२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष ९४२५१८३२४४
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मुक्तक
नेह नर्मदा में अवगाहो, तन-मन निर्मल हो जाएगा।
रोम-रोम पुलकित होगा प्रिय!, अपनेपन की जय गाएगा।।
हर अभिलाषा क्षिप्रा होगी, कुंभ लगेगा संकल्पों का,
कोशिश का जनगण तट आकर, फल पा-देकर तर जाएगा।।
७-६-२०१६
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छंद सलिला:
कामरूप छंद
संजीव
*
लक्षण छंद:
कामरूप छंद , दे आनंद , रचकर खुश रहिए
मुँहदेखी नहीं , बात हमेशा , खरी-खरी कहिए
नौ निधि सात सुर , दस दिशाएँ , कीर्ति गाथा कहें
अंत में अंतर , भुला लघु-गुरु , तज- रिक्त कर रहें
संकेत: आदित्य = बारह
उदाहरण:
१. गले लग जाओ , प्रिये! आओ , करो पूरी चाह
गीत मिल गाओ , प्रिये! आओ , मिटे सारी दाह
दूरियाँ कम कर , मुस्कुराओ , छिप भरो मत आह
मन मिले मन से , खिलखिलाओ , करें मिलकर वाह
२. चलें विद्यालय , पढ़ें-लिख-सुन , गुनें रहकर साथ
करें जुटकर श्रम , रखें ऊँचा , हमेशा निज माथ
रोप पौधे कुछ , सींच हर दिन , करें भू को हरा
प्रदूषण हो कम , हँसे जीवन / हर मनुज हो खरा
३. ईमान की हो , फिर प्रतिष्ठा , प्रयासों की जीत
दुश्मनों की हो , पराजय ही / विजय पायें मीत
आतंक हो अब , खत्म नारी , पा सके सम्मान
मुनाफाखोरी , न रिश्वत हो , जी सके इंसान
४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध
७-६-२०१४ 
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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छंद सलिला:
गीता छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद - मात्रा २६ मात्रा, यति १४ - १२, पदांत गुरु लघु.
लक्षण छंद:
चौदह भुवन विख्यात है , कुरु क्षेत्र गीता-ज्ञान
आदित्य बारह मास नित , निष्काम करे विहान
अर्जुन सदृश जो करेगा , हरी पर अटल विश्वास
गुरु-लघु न व्यापे अंत हो , हरि-हस्त का आभास
संकेत: आदित्य = बारह
उदाहरण:
१. जीवन भवन की नीव है , विश्वास- श्रम दीवार
दृढ़ छत लगन की डालिये , रख हौसलों का द्वार
ख्वाबों की रखें खिड़कियाँ , नव कोशिशों का फर्श
सहयोग की हो छपाई , चिर उमंगों का अर्श
२. अपने वतन में हो रहा , परदेश का आभास
अपनी विरासत खो रहे , किंचित नहीं अहसास
होटल अधिक क्यों भा रहा? , घर से हुई क्यों ऊब?
सोचिए! बदलाव करिए , सुहाये घर फिर खूब
३. है क्या नियति के गर्भ में , यह कौन सकता बोल?
काल पृष्ठों पर लिखा क्या , कब कौन सकता तौल?
भाग्य में किसके बदा क्या , पढ़ कौन पाया खोल?
कर नियति की अवमानना , चुप झेल अब भूडोल।
४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध
७-६-२०१४
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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 अंतरजाल पर पहली बार :

त्रिपदिक नवगीत :
नेह नर्मदा तीर पर
- संजीव 'सलिल' *
नेह नर्मदा तीर पर,
अवगाहन कर धीर धर,
पल-पल उठ-गिरती लहर...
*
कौन उदासी-विरागी,
विकल किनारे पर खड़ा?
किसका पथ चुप जोहता?
निष्क्रिय, मौन, हताश है.
या दिलजला निराश है?
जलती आग पलाश है.
जब पीड़ा बनती भँवर,
खींचे तुझको केंद्र पर,

रुक मत घेरा पार कर...*

नेह नर्मदा तीर पर,
अवगाहन का धीर धर,
पल-पल उठ-गिरती लहर...
*
सुन पंछी का मशविरा,
मेघदूत जाता फिरा-
'सलिल'-धार बनकर गिरा.
शांति दग्ध उर को मिली.
मुरझाई कलिका खिली.
शिला दूरियों की हिली.
मन्दिर में गूँजा गजर,
निष्ठां के सम्मिलित स्वर,
'हे माँ! सब पर दया कर...

*

*

पग आये पौधे लिये,
ज्यों नव आशा के दिये.
नर्तित थे हुलसित हिये.
सिकता कण लख नाचते.
कलकल ध्वनि सुन झूमते.
पर्ण कथा नव बाँचते.
बम्बुलिया के स्वर मधुर,
पग मादल की थाप पर,
लिखें कथा नव थिरक कर...
७-६-२०१०
*
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गीत छंद क्या है? गीत जयकार कीजिए गीत दोहा गीत प्रीत की बात गीत राम कहानी गीत सलिला गीत सुग्गा बोलो गीत सूरज उगाएँ गीत हिमालय गीत ज़ुल्फ़ गीत-नवगीत संग्रह सूची २०२० गीत. मोगरा गीत: तुमने बुलाया गीता अध्याय ४ गीता छंद गीति रचना गीतिका छंद गुफ़्तगू गुब्बारे गुमाँ गुमां गूढ़ प्रश्न गेट माहिया गोरस गोष्ठी गौ गौ-रक्षा गौधूली ग्रह ग्लोबलाइजेशन ग्वाल | घण्टा-घर चतुष्पदी चला जारहा कौन चाँद-चकोरी चाहत चिंतन चिकित्सा चित्रगुप्त वंदना चिद-बीज चुनाव और मतदान चूल्हे चौके की खटपट चोंच में आकाश चौपइया छंद छंद विजाति छंद - बहर दोउ एक हैं छंद : कथ्य लय भाव रस छंद अनुकूला छंद अमरकंटक छंद उल्लाला छंद कामरूप छंद काव्य छंद कृष्णमोहन छंद गीत छंद गीता छंद गीतिका छंद चौपइया छंद दोही छंद पीयूषवर्ष छंद बह्र दोउ एक है छंद मानव जातीय छंद विधाता छंद शंकर छंद शाला छंद शाला १ छंद सप्तमात्रिक छंद सलिला १ छंद सवैया गंगोदक छत छत्तीसगढ़ी छाया जग जगदीश व्योम जनतंत्र जनरल जनवरी कब क्या जन्म जन्माष्टमी जप जय हिन्द का सच जल जल -युद्ध ज़ाकिर अली 'रजनीश' जाति धर्म जिंदगी जीवन-घृत जोक्स joks जौहर ज्योति झन्डा रोहण झर-झर टुकड़े टेक्ट टॉप ब्लॉगर टोपी डंके की चोट पर डर डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में हाथियों की मौत के बाद सरकार को आया होश elephant डॉ. अव्यक्त अग्रवाल डॉ. रविशंकर शर्मा अभिनन्दन डॉ. संतोष शुक्ला तनहाई तन्मात्राएँ तांका सलिला तार्किक तुम तुम कहीं भी हो तुलसी चौरा तूलिका तृप्ति तेरा स्वर नर्तन तेरेी तेवरी त्रिआयामी पदार्थ सृष्टि त्रिपदिक गीत त्रिपदिक छंद त्रिपदिक नवगीत त्रिपदियाँ दक्ष दम दयानंद सरस्वती दरी दर्शन दलाल और खरीददार दलित समाज दहेज़ दायित्व दावानल से गड़बड़ाया दुधवा का पारिस्थितिकीय तंत्र दिया दिया कविता दिल टुकड़े दिल दास्ताँ दिवाली नवगीत दिवाली माहिया दिवाली हाइकु दीप-पर्व दीपक दीपावली दीपित दीया दीवाली दीवाली और दीवाला दुनिया दुबे -कविता दुर्योधन दृष्टा देवता देवी भक्त देश एकता देशद्रोहियों और आतंकवादियों देशफरोश देह व्यापार दोषों को त्याग दोहा ममता दोहा नया साल दोहा भवन दोहा गंगा दोहा गाथा सनातन १ दोहा गीत दोहा दुनिया दोहा भवन दोहा मुक्तिका दोहा सलिला गणतंत्र दोहा सावरकर दोहा स्वास्थ्य दोहा ग़ज़ल दोहांजलि दोही छंद दोहे गणतंत्र दौलत के पुजारी द्रष्टा -दृष्टि द्रोपदी द्रौपदी द्वंद्व द्विपदियाँ द्विविधा धंधा धन धनार्जन धरती धर्म निरपेक्षिता धर्म मानव-धर्म धर्म या अधर्म ?' धर्म राज धर्मराज धांसू धूप -छाँव नए शब्द नक्षत्र नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे नया साल गीत नया साल दोहा नरसंहार नर्मदा नर्मदाष्टक मणिप्रवाल नव अन्न नव गीत आभा सक्सेना नव गीत: सांताक्लाज नव वर्ष काव्य गोष्ठी २०२१ नव-स्रिजन... नवंबर २०२० नवगीत दिन घूरे के नवगीत ना मिटहै अंधेरा नवगीत - गुरु विपरीत नवगीत अपना अपना सच नवगीत अभी नहीं सच हारा नवगीत उठो पाखी! नवगीत और देश नवगीत करना ... सही नवगीत काल है संक्रांति का नवगीत कुछ तो कीजिए नवगीत कौन है जो नवगीत क्यों? नवगीत गोल क्यों? नवगीत घोंसले में नवगीत छोडो हाहाकार मियाँ! नवगीत जगो सूर्य आता है नवगीत त्रिपदिक नवगीत दर्पण का दिल नवगीत दिवाली नवगीत नव वर्ष नवगीत नागफनी उग आयी नवगीत निर्माणों के गीत नवगीत पहले गुना नवगीत भटक न जाए नवगीत भीड़ में नवगीत मिली दिहाडी नवगीत में नए रुझान नवगीत राम बचाए नवगीत रार ठानते नवगीत लोकतंत्र का पंछी नवगीत वह खासों में खास है नवगीत शिव नवगीत संक्रांति काल है नवगीत संग्रह नवगीत सत्याग्रह के नाम पर नवगीत समय वृक्ष नवगीत समीक्षा नवगीत सड़क पर नवगीत सड़क पर... नवगीत: उगना नित नवगीत: उड़ चल हंसा नवगीत: दीन प्रदर्शन नवगीत: नाम बड़े हैं नवगीत: भाग्य कुंडली नवगीत: लोकतंत्र का पंछी बेबस नवगीत: कुण्डी खटकी नवगीत: छोडो हाहाकार मियाँ! नवगीत: बजा बाँसुरी नवगीत: भारत आ रै नवगीत: रब की मर्ज़ी नवभारत टाईम्स नशा नाक की सर्जरी नाग नाभिक ऊर्जा नारि नारी मुक्ति नारी-भाव नाश प्रकृति का निर्निमेष निर्विकार निष्काम कर्म निष्ठुरता नीति व्यवहार नीति-नियम नीति-व्यवहार नीलकंठ नेकियां नेह नर्मदा तीर पर नेह-नाता नैतिकता नैन-डोर नैना नौ कन्या न्यू-ईयर गिफ्ट नज़र नज़ारा पंचौदन अजः पद चिन्ह पद-चिन्ह पद्मिनी परब्रह्म परम-पिता परमाणु परमानंद परमार्थ परलोक परहित पराग पराया-धन पल- छिन पशु पहलू पाँच पर्व पायल पिचकारी पीयूषवर्ष छंद पीर पुरुषार्थ पुरोवाक : यह बगुला मन पुरोवाक ओस की बूँद पुरोवाक केरल एक झाँकी पुरोवाक बुधिया लेता टोह पुरोवाक् पुलिस पूजा पूर्ण-ब्रह्म पूर्णकाम पृथ्वी पैरोडी पोखर ठोके दावा प्यार प्रकृति प्रकृति दोहन प्रकृति बादल प्रजापति प्रणम्य शहीद प्रणय प्रणय -दीप प्रणय के पल प्रतिकण प्रतियोगिता प्रत्रकार प्रदूषण प्रभाव प्रभु प्रभु ज्ञान प्रश्न मन के प्राण शर्मा प्रातस्मरण स्तोत्र प्रिय प्रवास प्रीति के रंग प्रीति-चलन प्रेम के छःलक्षण प्रेम प्याला प्रेम ममता फरवरी कब क्या? फागुन बंगलोर . कर्णाटक बंगालूरू बंधन व मुक्ति नारी बगीचा बच्चे बजरंग बली बद्दुआ बन्गलूरू बबिता चौबे बयान बरसाना बरसानौ बलि बसंत पंचमी बसंत मुक्तक बसंतोत्सव/मदनोत्सव बहादुरी बहु बहुरंगी संस्कृति बांगला बाढ़ ने बिगाड़ा पशुपालन कारोबार बात बापू बाबा अम्बेडकर साहब बाबा संस्कृति बारह-सोलह वर्णिक छंद बाल कविता बाल कविता : तुहिना-दादी बाल कविता अंशू-मिंशू और भालू बाल कविता कौआ स्नान बाल गीत : ज़िंदगी के मानी बाल गीत पाई शाल बाल नवगीत सूरज बबुआ! बासंती दोहा ग़ज़ल बिग-बेंग बिगबेंग बिरसा मुंडा बुंदेली नवगीत बूढ़ा बरगद कथा-गीत बेटियाँ बेदिल बेनज़ाइटन ब्रह्म ब्रह्मजीत गौतम ब्रह्मा ब्रह्माण्ड ब्रिषभानु ब्लागिंग ब्लॉगरों का सम्मान ब्लोग नगरी ब्लोगोत्सव- २०१० भगवती प्रसाद देवपुरा भगवा रंग भवन निर्माण भविष्य भारत आरती भारत की रमणियाँ भारत जय हिन्द भारत भूमि भारत माता भारत रत्न भारतीय मुद्रा पर गाँधी भाव सप्रेषण भाषा भाषा सेतु भाषाविज्ञान भूख भेदाभेद परे भ्रष्टाचार मंजिल मंदिर मस्जिद मटुकी मतदाता मत्तगयंद सवैया मथानी मथुरा मदरसे मधु कल्पना मधुपुरी मधुर मधुर निनाद मन का निर्मलेी मन विहग मन-मीत मनाना मनुहार मनोरंजन मनोरजंन मन्त्र पल मर्दों में यौन कुंठा मर्यादा मलेशिया मस्ज़िद-मन्दिर महक महात्मा गाँधी पर मार्टिन लूथर किंग महादेवी महान देश महिला सेवा समिति महेश महफ़िल माखन माघ माता मात्रा गणना माधुरी गुप्ता मानव -कृत्य मानव के विस्तार मानव जातीय छंद मानो या न मानो माहिया किसान माहिया गीत माहिया दिवाली माहेश्वरी-प्रजा मिट गये मिथिलेश मिथिलेश दुबे मिथिलेश दुब मिथिलेश दुबे लेख महिंला मिलन मिस्र में विद्रोह मीरा मुकतक मुक्तक कार्यशाला मुक्तक छंद सलिला मुक्तक बसंत मुक्तक भूगोलीय मुक्तक में गणित मुक्तक हाइकु मुक्तिका मन से डरिए मुक्तिका हे माधव ! मुक्तिका किस्सा नहीं हूँ मुक्तिका बसंत मुक्तिका मन मुक्तिका यमक मुक्तिका राजस्थानी मुक्तिका रात मुक्तिका व्यंग्य मुक्तिका: न होता मुजाहिद मुन्ना भाई मुरारीलाल खरे मुलाक़ात मुस्कराहट मुहब्बत ए इलाही मुहब्बतनामा मूल मूलभूत सुविधाएं मूल्यांकन मेघ मेरा देश मेरे भैया मेरे मन मेले मैं -तू मैं करता तब मैथुनी-भाव मॉल संस्कृति मोक्ष मोमिन मोर मुकुट मोहन शशि मौसम मौसम अंगार है यकीं यक्ष प्रश्न यक्ष प्रश्न २ यक्ष प्रश्न ३ - जात और जाति यक्ष-प्रश्न यम-यमी यमकमयी मुक्तिका यश मालवीय यशवंत याद में तेरी जाग-जाग के युवा दिवस युवा प्रतिभा सम्मान युवावर्ग यूपीखबर 'DR. ANWER JAMAL' योग भ्रष्ट रंग रस रचना-प्रतिरचना रत्न रपट रमज़ान रवींद्र प्रभात रवींद्रनाथ ठाकुर रवीन्द्र प्रभात रस दोहा रस-राज रागिनी राघवयादवीयम् राजस्थानी मुक्तिका राजेंद्र प्रसाद राणा प्रताप राधा-कान्हा राम राम भक्त राम सेंगर राष्ट्र गान राष्ट्र-प्रेम राष्ट्र-भाषा रिपोर्ट रूह रेलगाड़ी का इतिहास रोजगार रोला रोशन सिंह लक्ष्मी लखनऊ के ब्लॉगर लखनऊ ब्लोगर एसोसिएशन पर विवादित पोस्टों का वहिष्कार होगा--------मिथिलेश लघु नाटिका लघु व्यंग्य विकास लघुकथा लघुकथा एकलव्य लघुकथा लक्ष्यवेध लघुकथा खाँसी लघुकथा समानाधिकार लघुकथा - कब्रस्तान लघुकथा : खिलौने लघुकथा करनी-भरनी लघुकथा खिलौने लघुकथा गुरु जी लघुकथा छाया लघुकथा निर्दोष लघुकथा मुस्कुराहट लघुकथा: निपूती भली थी लज्जा ललिता लहर लाइब्रेरी लाल किला दिल्ली लालू लावणी लास लीला लेख विश्वास का संकट लेख : भाषा और लिपि लेख इलाहाबाद और छायावाद लेख दोहा लेख फागें लेख भाषा लोकसभा वतन वन नीति में बदलाव की जरूरत वन्दे मातरं वन्दे मातरम वरदान वर्णिक छंद बारह-सोलह वर्तमान वह कल वाक्-आउट वादाये वफ़ा वायु वार्तालाप वासव जातीय छंद वासवी-निषंग वास्तव जातीय छंद वास्तु सूत्र विकास विकृति विखंडन-संयोजन विचार सलिला विचित्र किन्तु सत्य विजाति छंद वितान विद्वान् विधाता छंद विधिना विधु बदनी विमर्श नवगीत में पंक्ति विभाजन विमर्श हिंदी- समस्या और समाधान विमर्श - कविता क्या विमर्श : जौहर विमर्श : शब्द और अर्थ विमर्श गाँधी विमर्श- श्रवण कुमार विरज़ विरासत विलोम काव्य विलोम पद विवेकानंद विश्लेषण विष्णु विष्णु का चक्र विहान वीर वीर जवान वीर-प्रसू वीराना वीरों के गीत वेंकटाध्वरि वैदिक ज्ञान व्यंग्य कविता व्यंग्य मुक्तिका व्यक्त वफ़ादारी शंकर शंकर छंद शक्ति शब्द चित्र शब्द सलिला शराबी ब्लॉगर्स शशि शशि पुरवार शास्त्र शिकायत शिक्षक दिवस शिक्षक-दिवस. शिक्षक-स्नातक निर्वाचन शिक्षा शिरीष शिव दोहावली शिव नवगीत शिव हाइकु शिवम् मिश्रा शिशु गीत शील शुद्धतावादी शुभकामना सन्देश शूरवीर शेयर शेर शेष-ब्रह्म शौर्य के स्वर श्याम श्याम लाल उपाध्याय श्याम सवैया श्यामली सखी श्यामा श्यामान्गिनी श्रध्दांजलि श्री कान्त श्रीकृष्ण और जीवन मूल्य श्रुति कुशवाहा श्रुति-सम्मत श्रृंगार श्रृद्धा श्रेय-प्रेय श्रेष्ठता षटपदी षड्यंत्र संकट हरण संक्रांति संक्षिप्तता संत साहित्य संतान संतोष भारतीय संदेह संध्या सिंह संरक्षण संस्कार संस्मरण सखि सखी सत्कर्म सद-नासद सदस्य बनिए सदा सदाधार सद्दाम का इराक सन्त कंवर राम सन्त साहित्य परम्परा सन्देश सपना सप्त मात्रिक छंद सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट सबरीमाला समता समलैंगिकता समस्या समाचारपत्र कतरन समाधिया समानार्थी शब्द समीक्षा 'गज़ल रदीफ़ समीक्षा - कशमकश समीक्षा अंजुरी भर धूप समीक्षा अप्प दीपो भव कुमार रवीन्द्र समीक्षा एक बहर पर एक ग़ज़ल समीक्षा कहानी समीक्षा चुप्पियों को तोड़ते हैं समीक्षा डॉ. रमेश खरे समीक्षा राजस्थानी साहित्य में रामभक्ति-काव्य समीक्षा ग़ज़ल व्याकरण सम्मान प्राप्त सर सरस्वती चन्दौसी सरस्वती जैन पंथ सर्दी सर्वत एम० सर्वश्री रविन्द्र प्रभात सलिल सलिल की रचनाएँ सलीम अख्तर सिद्दीकी सलीम अख्तर सिद्दीक़ी सलीम भाई सलीम भाई और अनव भाई सवैया गंगोदक सवैया सुमुखी सहारनपुर सांझ सांवरी सांस्कृतिक समारोह साक्षात्कार : सलिल - मनोरमा जैन पाखी सागर साड़ी साध्वी सामयिक कविता मचा महाभारत भारत में सामुदायिक ब्लॉग साया सार सार्थकता सावरकर दोहा साहित्य साहित्यकार दिवस साहित्यिक कविताएँ सिंगापुर सिद्धि सिद्धि-प्रसिद्धि सिनेमा सीता सुख सुख-दुःख सुख-शान्ति सुखन सुगति छंद सुधार सुनीता सिंह सुभाष चन्द्र बोस सुभाषचंद्र बोस सुमित्र दोहा संकलन सुमुखी सवैया सुरेश कुमार पंडा सुरेश तन्मय सुहाने रितु सूरज तसलीस सेवा समितियां सेवानिवृत्ति सौर-ऊर्जा स्तवन शरणागत हम स्थित-प्रज्ञ स्थिति-प्रग्य स्नेह और सहयोग स्पर्श स्पेसिंग स्फुरणा स्मरण स्वतंत्रता दिवस पर लेख प्रतियोगिता स्वतन्त्रता प्रश्न स्वामी स्वार्थ सड़क हरबिंदर सिंह गिल हरसिंगार हरियाणवी हाइकु हरियाली हरीश सिंह हस्तिनापुर की बिथा कथा हस्तिनापुर की बिथा-कथा हाइकु गीत हिंदी हाइकु दिवाली हाइकु मुक्तक हाइकु शिव हाइकु सलिला:संजीव हाइकु हरियाणवी हाइगा हाइड्रोजन हारि हास्य कविता हास्य कविताएँ हास्य मुक्तिका हास्य रचना मेला हिंदी हिंदी : चुनौतियाँ और संभावनाएँ हिंदी दोहा हिंदी वंदना हिंदी वैभव हिंदी हाइकु गीत हिंदी ग़ज़ल हिंदुस्तान हिंदुस्तान की आवाज़ हिन्दी गुलामी का शिकार हिन्दी सेवा समितियां हिन्दू-मुस्लिम एकता हिन्‍दुस्‍तान हिमवान हिमालय हिरण सुगंधों के हिरण्यगर्भ हीलियम हुमायूँ का मकबरा हुश्ने मतला हे माधव हेमा अंजुली हेमांड होठों की छुअन होली का आमंत्रण LBA परिवार को. होस्टल ग़ज़ल दोहा ज़िंदगी ज़िन्दाकौम फ़ितरत ​​लघुकथा- कतार ‘बिहारी‘ ‘ब्लॉग की ख़बरें‘

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ब्लॉगर्स बन्धुवों !
आप सभी को हर्ष और बधाई के साथ यह सूचना देना चाहता हूँ कि LBA अपनी सफलता के उस मुक़ाम तक आ चुका है कि इसकी सदस्यता संख्या अपने चरण तक पहुँच चुकी है और जो ब्लॉगर्स बन्धु इससे जुड़ने की इच्छा रख रहे हैं और जिनके मेल मुझे मिल रहे हैं उसको मद्देनज़र रखते हुए नयी सदस्यता के इच्छुक ब्लॉगर्स को एक और भी शक्तिशाली और नया मंच का गठन आज किया जा रहा है जिसका नाम है 'ऑल इंडिया ब्लॉगर्स असोसिएशन' अर्थात AIBA ! इस मंच का हिस्सा सभी भारतीय बन सकते है, फ़िर चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहें हों !!!
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