डा श्याम गुप्त का गीत....ए मेरे मन -----
ए मेरे मन ,ऐ मेरे मन ,ए मेरे मन.... ।
कैसे बतलाऊँ तुझे,कैसे समझाऊँ तुझे,
कौन है तेरा यहाँ, कौन है तेरा यहाँ?
ए मेरे मन ,ऐ मेरे मन ,ए मेरे मन ....।
कौन है वो जो तेरी यादों में समाया आकार,
कौन है जिसके तू गीत गुनगुनाता है।
किसके वादों में लिपट कर खुद को खोया,
किसकी बातों में बहक करके गीत गाता है। ...ए मेरे मन....
कौन सी शोख अदाओं में अटक कर भूला,
कौन जुल्फों की घनी छावं में बुलाता है।
किसकी बाहों में सिमटने के सजाए सपने,
किससे मिलाने की धुन सजाता है । ...ए मेरे मन....
कौन किसका है इस ज़माने में,
प्यार सिसका है हर ज़माने में।
प्रीति की रीति पै तू एतबार न कर
मस्त रह ,श्याम ' सुर सजाने में॥
ए मेरे मन ,ऐ मेरे मन ,ए मेरे मन..... ।
कैसे बतलाऊँ तुझे,कैसे समझाऊँ तुझे,
कौन है तेरा यहाँ, कौन है तेरा यहाँ? ....॥
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कैसे बतलाऊँ तुझे,कैसे समझाऊँ तुझे,
कौन है तेरा यहाँ, कौन है तेरा यहाँ?
ए मेरे मन ,ऐ मेरे मन ,ए मेरे मन ....।
कौन है वो जो तेरी यादों में समाया आकार,
कौन है जिसके तू गीत गुनगुनाता है।
किसके वादों में लिपट कर खुद को खोया,
किसकी बातों में बहक करके गीत गाता है। ...ए मेरे मन....
कौन सी शोख अदाओं में अटक कर भूला,
कौन जुल्फों की घनी छावं में बुलाता है।
किसकी बाहों में सिमटने के सजाए सपने,
किससे मिलाने की धुन सजाता है । ...ए मेरे मन....
कौन किसका है इस ज़माने में,
प्यार सिसका है हर ज़माने में।
प्रीति की रीति पै तू एतबार न कर
मस्त रह ,श्याम ' सुर सजाने में॥
ए मेरे मन ,ऐ मेरे मन ,ए मेरे मन..... ।
कैसे बतलाऊँ तुझे,कैसे समझाऊँ तुझे,
कौन है तेरा यहाँ, कौन है तेरा यहाँ? ....॥

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