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गुरुवार, जनवरी 27, 2011
आप मुझे सवाल दीजिए मैं आपको जवाब दूंगा The purification of human heart

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मेरे अज़ीज़ भाई हरीश जी ! आज हरेक आदमी एक नक़ाब लगाकर समाज में घूम रहा है। उसके अवचेतन में बहुत कुछ दबा हुआ रहता है और उसका चेतन मन उसके मन की भीतरी पर्त से बहुत सी ऐसी चीज़ों को प्रकट होने से रोकता रहता है जिन्हें ज़ाहिर करने से उसे नुक्सान पहुंचने का डर होता है। समाज में दूसरे समुदायों के साथ मुसलमान भी रहते हैं। आप उनसे मिलते हैं, यह आपकी मजबूरी है। इसके बावजूद सच यह है कि आपके अवचेतन मन की गहराईयों में यह बैठा हुआ है कि अधिकतर मुसलमान बुरे हैं। आपने यह बात ‘डंके की चोट पर‘ कही है। यह बात इतनी ज़्यादा ग़लत और असामाजिक है कि आपके ऐसा कहते ही ‘हमारी वाणी‘ ने क़ानूनी डर से तुरंत अपने बोर्ड से आपकी पोस्ट को ही नहीं हटाया बल्कि आपके ब्लाग का पंजीकरण भी रद्द कर दिया। आप कहने को तो कह गए लेकिन जैसे ही आपका क्रोध शांत हुआ और आपका चेतन मन पुनः सक्रिय हुआ तो उसने आपको बताया कि आप ग़लती कर गए हैं। ग़लती का अहसास होते ही आपने तुरंत माफ़ी भी मांग ली, यह आपकी अच्छाई है, इसीलिए मैं आपको एक अच्छा आदमी कहता हूं। आपके मनोविश्लेषण में मैंने पाया है कि आपके अंदर बेसिकली अंध सांप्रदायिकता नहीं है बल्कि बचपन से आप जिस माहौल में पले हैं, उसमें आपने मुसलमानों के बारे में बहुत सी नेगेटिव बातें सुनी हैं, वे आपके अवचेतन मन में बैठी हुई हैं। आपका मिलना-जुलना मुसलमानों से हुआ तो आपकी कुछ धारणाएं तो भ्रांत साबित हो गई हैं लेकिन तमाम भ्रांतियां आपकी अभी दूर नहीं हुई हैं क्योंकि अभी तक आपको या तो कोई एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला जो कि आपकी सारी ग़लफ़हमियां दूर कर देता या फिर आपने ही उनमें से किसी के सामने अपने मन के सवाल इस डर से नहीं रखे कि ये लोग ख़ामख्वाह बुरा मान जाएंगे।

कुरआन पढने का सही तरीक़ा
आप कहते हैं कि आपने हिंदी का कुरआन भी पढ़ा है।
अब मैं आपको बताता हूं कि आपने कुरआन कैसे पढ़ा है ?
आप एक मीडियाकर्मी हैं। आए दिन आपके सामने कुरआन की आलोचना से संबंधित बातें गुज़रती रहती हैं। ख़ास तौर से आपके हाथ वह पर्चा लगा जिसमें इंसानियत के दुश्मनों ने कुरआन के बारे में यह अफ़वाह फैला रखी है कि कुरआन हिंदुओं को काफ़िर घोषित करता है, मुसलमानों को हिंदुओं से दोस्ती से रोकता है और कहता है उन्हें जहां पाओ वहीं क़त्ल कर डालो।
आपको यक़ीन नहीं आया कि कोई भी धर्मग्रंथ ऐसी घिनौनी तालीम कैसे दे सकता है ?
आपने कुरआन हासिल किया।
यह तो आपने अच्छा किया लेकिन आपने उसके साथ सबसे ग़लत यह किया कि आपको उसे सिलसिलेवार पूरी तरह पढ़ना चाहिए था और उसके साथ आपको पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब की जीवनी भी पढ़नी चाहिए थी कि उन्होंने कुरआन के हुक्म का पालन खुद कैसे किया और अपने अनुयायियों से अपने जीवन में कैसे कराया ?
आपने ऐसा नहीं किया बल्कि आपने केवल उन पर्चों में छपे हुए आधे-अधूरे उद्धरणों को कुरआन से मिलाया और कुरआन को उठाकर अलमारी में रख दिया। आपने उसमें जगह-जगह निशान भी लगा दिये। आप समझते हैं कि आपने कुरआन पढ़ लिया लेकिन आप खुद बताईये कि क्या वाक़ई इसे कुरआन पढ़ना कहा जा सकता है ?
यही बेढंगापन आदमी को कुरआन के बारे में बदगुमान करता है।
जो सवाल आज आपके मन की गहराईयों में दफ़्न हैं, उनमें से शायद ही कोई बाक़ी बचेगा अगर आप कुरआन को क्रमबद्ध रूप से थोड़ा-थोड़ा शुरू से आखि़र तक पढ़ें और उसे पैग़म्बर साहब के जीवन की घटनाओं से जोड़कर समझने की कोशिश करें। कुरआन का मात्र अनुवाद ही काफ़ी नहीं है बल्कि आपको कुरआन की आयतों का संदर्भ भी जानना होगा कि कौन सी आयतें किन हालात में अवतरित हुईं और उनका पालन कब और कैसे किया गया ?
मैं अपने साथ भेदभाव की शिकायत करता हूं कि मेरे साथ भेदभाव किया जाता है। आप बताईये कि मेरी पोस्ट एलबीए के अध्यक्ष ने डिलीट कर दी, उन्होंने ऐसा क्यों किया ?
उन्होंने मेरी पोस्ट डिलीट कर दी तो क्या आपने उनकी इस ग़लत हरकत पर कोई ऐतराज़ जताया ?
अध्यक्ष जी ने मेरी ऐसी पोस्ट क्यों डिलीट कर दी जिसमें मैंने किसी भी हिंदू भाई को या उनके किसी महापुरूष को या उनकी किसी भी परंपरा को बुरा नहीं कहा, उनके किसी धर्मग्रंथ को बुरा नहीं कहा ?
जबकि आपकी पोस्ट को उन्होंने डिलीट नहीं किया जिसमें आपने अधिकतर मुसलमानों को बुरा बताया, जिसमें आपने कुरआन पर ऐतराज़ जताया और उसकी भाषा इतनी उत्तेजक है कि उसे हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल ने अपने बोर्ड के डिस्पले से हटा दिया।
आपकी जिस पोस्ट को हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल ने भी आपत्तिजनक पाया जिसमें कि पांच में से चार भाई हिंदू हैं, उसे आपके अध्यक्ष जी ने क्यों नहीं हटाया ?
और
मेरी अनापत्तिजनक पोस्ट को क्यों हटा दिया ?
मैंने उसे दोबारा फिर एलबीए पर डाला, अगर वह आपत्तिजनक थी तो उसे दोबारा क्यों नहीं हटाया गया ?
मेरे साथ भेदभाव होता रहा और आपने एक बार भी अपनी आपत्ति ज़ाहिर नहीं की। यह है आपका भेदभाव। आपने ही नहीं बल्कि कार्यकारिणी के किसी भी हिंदू भाई ने इस जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई, क्यों ?
जबकि श्री पवन कुमार मिश्रा जी ने इस डिक्टेटरशिप के प्रति अपना रोष प्रकट किया। क्योंकि उन्होंने इस मामले को न्याय की दृष्टि से देखा। उनका नाम आज तक मेरे कट्टर विरोधियों में ही लिया जाता है। इसके बावजूद उन्होंने वह बात कही जो आप नहीं कह पाए, क्यों ?
जो अनवर जमाल के साथ किया जा रहा है वह हरीश सिंह के साथ नहीं किया जाता , दोनों में ऐसा क्या फ़र्क़ है ?
सिवाय इसके कि अनवर जमाल एक मुसलमान है और हरीश सिंह एक हिन्दू.
और अगर मैं इस बात को बार बार आपके सामने लाता हूँ तो आप कहते हैं कि मेरे ऐसा करने से  आपका दिल दुखी होता है .
सच सुनने से आपका दिल दुखी क्यों होता है?
आप अपने भेदभाव को त्याग दीजिये फिर मैं आपसे आपकी शिकायत नहीं करूँगा और तब आपका दिल भी दुखी नहीं होगा .
अपने दिल को दुःख से बचाना खुद आपके हाथ में है क्योंकि हमारे ऋषियों ने बताया है कि अपने दुखों के पीछे कारण है खुद उसी मनुष्य के पाप जो कि दुखी है .
आप कहते हैं कि आप दुखी हैं तो आप अपने कर्मों का विश्लेषण कीजिये और पापमार्ग छोड़कर प्रायश्चित कीजिये.
आपका दुःख निर्मूल हो जायेगा , मेरी गारंटी है .
आप व्यस्त थे, मैं मान लेता हूं लेकिन हमारे अध्यक्ष जी तो यहां एलबीए की कई पोस्ट्स पर गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं देते घूमते रहे लेकिन मुझे शुभकामनाएं देने नहीं आए, क्यों ?
उनके इस रवैये को दुराग्रहपूर्ण और पक्षपात वाला क्यों न माना जाए ?
जो आदमी सबको समान नज़र से न देख सके वह अध्यक्ष बनने के लायक़ कैसे हो सकता है ?
दूसरों से अपील कर रहे हैं कि कोई काम ऐसा न किया जाए कि दूसरों की भावनाएं आहत हों और खुद हमारी भावनाएं वे आहत कर रहे हैं, क्यों ?
अध्यक्ष वह होता है जिसके पास न्यायदृष्टि हो, सबके लिए प्रेम हो और जो बात वह दूसरों से कहे उसे खुद करके भी दिखाए। ये तीनों ही बातें मुझे तो श्री रवीन्द्र प्रभात जी में नज़र आई नहीं।
ब्लागिंग एक ऐसा मंच है कि यहां आपको हरेक सवाल का सामना करना होगा। या तो सवालों का संतोषजनक उत्तर देना होगा।
जो सवालों से बचना चाहे, वह ब्लागिंग में न आए।
मैं सवालों से बचना नहीं चाहता बल्कि मैं चाहता हूं कि जो सवाल आज तक आप लोगों के मन में दबे पड़े हैं, उन्हें आप मेरे सामने लाईये। इंशा अल्लाह मैं उनका जवाब दूंगा।
आपके हरेक सवाल को मैं अकेला फ़ेस करूंगा और आप सबको जवाब भी दूंगा लेकिन आप सब मिलकर भी मेरे सवालों को न तो फ़ेस कर सकते हैं और न ही उनके जवाब आप दे पाएंगे।
या तो आप एलबीए पर सवाल जवाब चलने दीजिए या फिर उन्हें बंद करना चाहें तो जो भी नियम बनाएं उसे सब पर लागू कीजिए।
मेरे ब्लाग चर्चाशाली मंच पर आईये, यहां आप पर कोई पाबंदी नहीं है। आईये आपके अवचेतन में दबी पड़ी हरेक ग्रंथी से मैं आपको मुक्ति दूंगा।
आप मुझे सवाल दीजिए मैं आपको जवाब दूंगा।
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बुधवार, जनवरी 26, 2011
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'ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम' सदा गाया है वतन के रखवालों ने
हम पूछते हैं कि इस साझा मंच पे क्यों झूठ और कुफ़्र बका जा रहा है ?
कुफ़्र अर्थात नास्तिकता ।
क्या देश के लिए केवल वही नास्तिक बलिदान कर सकता है जिसकी ज़बान पर ईश्वर-अल्लाह का नाम न हो ?
टीपू सुल्तान से लेकर कर्नल शाहनवाज़ और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तक सभी मुसलमानों की ज़बान पर अल्लाह का नाम था और ऐसे ही मंगल पांडे से लेकर गांधी और रामप्रसाद बिस्मिल तक सभी हिंदू सरफ़रोशों की ज़बान पर ईश्वर का नाम था।
@ डा. श्याम गुप्ता जी ! ईशनिंदा से बाज़ आ जाईये।
देशभक्तों के बारे में भ्रम फैलाने से बाज़ आ जाईये।
आस्था का मख़ौल उड़ाने से बाज़ आ जाईये।
नास्तिकता के प्रचार से तौबा कीजिए और लौट आईये ईमान की ओर जो कि आपको मेरे ज़रिये से मिल सकता है ।

आपकी सेवा हेतु सदा तत्पर
आपका छोटा भाई अनवर
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मंगलवार, जनवरी 25, 2011
अपने आप को क़ायदे क़ानून का पाबन्द बनाईये 26th january

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 26 जनवरी पर एक ख़ास अपील
कुदरत क़ानून की पाबंद है लेकिन इंसान क़ानून की पाबंदी को अपने लिए लाज़िम नहीं मानता। इंसान जिस चीज़ के बारे में अच्छी तरह जानता है कि वे चीज़ें उसे नुक्सान देंगी। वह उन्हें तब भी इस्तेमाल करता है। गुटखा, तंबाकू और शराब जैसी चीज़ों की गिनती ऐसी ही चीज़ों में होती है। दहेज लेने देने और ब्याज लेने देने को भी इंसान नुक्सानदेह मानता है लेकिन इन जैसी घृणित परंपराओं में भी कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि ये रोज़ ब रोज़ बढ़ती ही जा रही हैं। हम अपनी सेहत और अपने समाज के प्रति किसी उसूल को सामूहिक रूप से नहीं अपना पाए हैं। यही ग़ैर ज़िम्मेदारी हमारी क़ानून और प्रशासन व्यवस्था को लेकर है। आये दिन हड़ताल करना, रोड जाम करना, जुलूस निकालना, भड़काऊ भाषण देकर समाज की शांति भंग कर देना और मौक़े पर हालात का जायज़ा लेने गए प्रशासनिक अधिकारियों से दुव्र्यवहार करना ऐसे काम हैं जो मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ भी हैं और इनसे आम आदमी बेहद परेशान हो जाता है और कई बार इनमें बेकसूरों की जान तक चली जाती है।
इस देश में क़ानून को क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारी अफ़सरों की ही नहीं है बल्कि आम आदमी की भी है, हरेक नागरिक की है। 26 जनवरी के मौक़े पर इस बार हमें यही सोचना है और खुद को हरेक ऐसे काम से दूर रखना है जो कि मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ हो। मुल्क के हालात बनाने के लिए दूसरों के सुधरने की उम्मीद करने के बजाय आपको खुद के सुधार पर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगर हरेक आदमी महज़ केवल एक आदमी को ही, यानि कि खुद अपने आप को ही सुधार ले तो हमारे पूरे मुल्क का सुधार हो जाएगा।

गुस्से को मिटाइये मत बल्कि उस पर क़ाबू पाना सीखिये
समाज में सबके साथ रहना है तो दूसरों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ भी करना पड़ता है और कभी कभी उन्हें ढकना भी पड़ता है। हरेक परिवार अपने सभी सदस्यों को इसी रीति से जोड़ता है। क़स्बे और कॉलोनी के लोग भी इसी उसूल के तहत एक दूसरे से जुड़े रह पाते हैं। ब्लाग जगत भी एक परिवार है और यहां भी इसी उसूल को अपनाया जाना चाहिए।
इस कोशिश के बावजूद कभी कभी मुझे गुस्सा आ जाता है और तब मैं यह सोचता हूं कि आखि़र मुझे गुस्सा आया क्यों ?
हमारे ऋषियों ने जिन पांच महाविकारों को इंसान के लिए सबसे ज़्यादा घातक माना है उनमें से क्रोध भी एक है। हज़रत मुहम्मद साहब स. ने भी उस शख्स को पहलवान बताया है जो कि गुस्से पर क़ाबू पा ले।
इसके बावजूद हम देखते हैं कि कुछ हालात में ऋषियों को भी क्रोध आया है, खुद अंतिम ऋषि हज़रत मुहम्मद साहब स. को भी क्रोधित होते हुए देखा गया है।
हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज में वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है लेकिन हदीसों में जहां पैग़म्बर साहब स. के क्रोधित होने का ज़िक्र आया है तो वे तमाम ऐसी घटनाएं हैं जबकि किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म किया गया और उसका हक़ अदा करने के बारे में मालिक के हुक्म को भुला दिया गया। उन्होंने अपने लिए कभी क्रोध नहीं किया, खुद पर जुल्म करने वाले दुश्मनों को हमेशा माफ़ किया। अपनी प्यारी बेटी की मौत के ज़िम्मेदारों को भी माफ़ कर दिया। अपने प्यारे चाचा हमज़ा के क़ातिल ‘वहशी‘ को भी माफ़ कर दिया और उनका कलेजा चबाने वाली ‘हिन्दा‘ को भी माफ़ कर और मक्का के उन सभी सरदारों को भी माफ़ कर दिया जिन्होंने उन्हें लगभग ढाई साल के लिए पूरे क़बीले के साथ ‘इब्ने अबी तालिब की घाटी‘ में क़ैद कर दिया था और मक्का के सभी व्यापारियों को उन्हें कपड़ा, भोजन और दवा बेचने पर भी पाबंदी लगा दी थी। ऐसे तमाम जुल्म सहकर भी उन्होंने उनके लिए अपने रब से दुआ की और उन्हें माफ़ कर दिया। इसका मक़सद साफ़ है कि अस्ल उद्देश्य अपना और अपने आस-पास के लोगों का सुधार है। अगर यह मक़सद माफ़ी से हासिल हो तो उन्हें माफ़ किया जाए और अगर उनके जुर्म के प्रति अपना गुस्सा ज़ाहिर करके सुधार की उम्मीद हो तो फिर गुस्सा किया जाए।
जो भी किया जाए उसका अंजाम देख लिया जाए, अपनी नीयत देख ली जाए, संभावित परिस्थितियों का आकलन और पूर्वानुमान कर लिया जाए।
वे आदर्श हैं। उनका अमल एक मिसाल है। उनके अमल को सामने रखकर हम अपने अमल को जांच-परख सकते हैं, उसे सुधार सकते हैं।
मुझे गुस्सा कम आता है लेकिन आता है।
आखि़र आदमी को गुस्सा आता क्यों है ?
हार्वर्ड डिसीज़न लैबोरेट्री की जेनिफ़र लर्नर और उनकी टीम ने गुस्से पर रिसर्च की है। उसके मुताबिक़ हमारे भीतर का गुस्सा कहीं हमें भरोसा दिलाता है कि हम अपने हालात बदल सकते हैं। अपने आने वाले कल को तय सकते हैं। जेनिफ़र का यक़ीन है कि अगर हम अपने गुस्से को सही रास्ता दिखा दें तो ज़िंदगी बदल सकते हैं।
हम अपने गुस्से को लेकर परेशान रहते हैं। अक्सर सोचते हैं कि काश हमें गुस्सा नहीं आता। लेकिन गुस्सा है कि क़ाबू में ही नहीं रहता। गुस्सा आना कोई अनहोनी नहीं है। हमें गुस्सा आता ही तब है, जब ज़िंदगी हमारे मुताबिक़ नहीं चल रही होती। कहीं कोई अधूरापन है, जो हमें भीतर से गुस्सैल बनाता है। दरअस्ल, इसी अधूरेपन को ठीक से समझने की ज़रूरत होती है। अगर हम इसे क़ायदे से समझ लें, तो बात बन जाती है।
जब हमें अधूरेपन का एहसास होता है, तो हम उसे भरने की कोशिश करते हैं। और यही भरने की कोशिश हमें कहीं से कहीं ले जाती है। हम पूरे होकर कहीं नहीं पहुंचते। हम अधूरे होते हैं, तभी कहीं पहुंचने की कसमसाहट होती है। यही कसमसाहट हमें भीतर से गुस्से में भर देती है। उस गुस्से में हम कुछ कर गुज़रने को तैयार हो जाते हैं। हम जमकर अपने पर काम करते हैं। उसे होमवर्क भी कह सकते हैं और धीरे धीरे हम अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते चले जाते हैं।
असल में यह गुस्सा एक टॉनिक का काम करता है। हमें भीतर से कुछ करने को झकझोरता है। अगर हमारा गुस्सा हमें कुछ करने को मजबूर करता है, तो वह तो अच्छा है न।
                   (हिन्दुस्तान, 6 जनवरी 2011, पृष्ठ 10)
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सीधी सच्ची बात का विरोध क्यों ?
@ मिथिलेश जी ! मेरी गत पोस्ट में तो किसी भी आदमी को बुरा नहीं कहा गया है तो फिर किसको नीचा देखना पड़ गया है ?
इस पोस्ट में संयोजक जनाब सलीम ख़ान साहब की पोस्ट की वाहवाही मैंने ज़रूर की है, वह तुच्छ वाहवाही कैसे है ?
उनकी तारीफ़ से तो आपको ख़ुश होकर यह कहना चाहिए था कि हां , LBA के सभी सदस्यों को उनकी तरह ऐसे लेख लिखने चाहिएं जो दो और दो चार की तरह क्लियर हों और उनमें किसी धर्म के सिद्धांत और परंपराओं के हवाले न दिए जाएं । जिसे ऐसा करना हो वह अपने निजी ब्लाग पर ऐसा कर ले।
इसमें कौन सी बात किसको नीचा दिखा रही है भाई ?
मेरी पोस्ट में तो ईशनिंदा की परिस्थितियां उत्पन्न होने से रोकने के संबंध में विचार विमर्श किया गया है जैसा स्वयं भाई रवीन्द्र प्रभात जी (President, LBA) भी चाहते हैं।
मेरी सलाह से अच्छा सुझाव अगर किसी और के पास है तो वह बताए ?

आख़िर एक सही बात का भी विरोध आप क्यों कर रहे हैं ?
मैं तो आपके द्वारा कही गई बात को ही तो दोहरा रहा हूं।
आप कहें तो सही और वही बात हम कहें तो ग़लत ?
यह भेदभाव क्यों ?

एक माँ की तरह सबको एक समान प्रेम दीजिए जैसे कि देती है सदा एक प्यारी माँ

किसी ब्लागर को किसी भी विषय पर चर्चा करनी है तो मेरा ब्लाग भी उसके लिए हाजिर है , जिसे चर्चा के उद्देश्य से ही बनाया गया है।
http://charchashalimanch.blogspot.com

अभी इसकी सजावट का काम चल रहा है लेकिन जो भी चाहे और जब चाहे इसका सदस्य बन सकता है । हरेक ब्लागर और ग़ैर-ब्लागर का स्वागत है ।

विशेष नोट : भाई रवीन्द्र प्रभात जी की अपील अच्छी है लेकिन वे अपनी पोस्ट में बता रहे हैं कि वे कर्बला में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब को मौजूद बता रहे हैं जो कि सरासर ग़लत है। वाक़या ए कर्बला इस्लामी इतिहास का सबसे ज़्यादा मशहूर वाक़या है जिसे हिंदुस्तान का हरेक बुद्धिजीवी जानता है लेकिन रविन्द्र जी नहीं जानते । इंटरनेट के युग में भी रविन्द्र जी को इस्लाम की ठीक नहीं है और वह सार्वजनिक रूप से इस्लाम के बारे में ग़लत जानकारी देकर भ्रम फैला रहे हैं । मैं उनसे सादर विनती करूंगा कि वे अविलंब अपनी पोस्ट का निरीक्षण करें और ग़लत जानकारी को तुरंत हटा दें ।
जहां भी और जो भी धर्म के बारे में ग़लत जानकारी देगा वहां अनवर जमाल ज़रूर टोकेगा ।

विचारणीय तथ्य : 1. भाई रविन्द्र जी हमारा शुक्रिया तो क्या अदा करते कि हमने उन्हें ज्ञान दिया बल्कि हमारी पोस्ट ही डिलीट कर दी बिना कोई कारण बताए।
2. क्या हमने अध्यक्ष जी को उनकी ग़लती बताकर कोई जुर्म कर डाला है ?
3. क्या अध्यक्ष जी को ख़ुश करने के लिए हम अपना इतिहास बदल डालें ?
4. क्या इसे अज्ञानता , संकीर्णता और अहंकार के अलावा कुछ और नाम दिया जा सकता है ?
5. क्या इसे वर्चुअल कम्युनलिज़्म का नाम दिया जा सकता है ?
इस पोस्ट पर दूसरे कमेंट्स के अलावा ख़ुद संयोजक सलीम ख़ान साहब का भी कमेंट मौजूद था जिसमें उन्होंने इतिहास के संबंध में रविन्द्र जी की ग़लती स्वीकारते हुए मेरा शुक्रिया भी अदा किया था। मेरी पोस्ट में कुछ भी आपत्तिजनक होता तो इस ब्लाग का संयोजक होने के नाते वह ख़ुद भी मिटा सकते थे लेकिन उन्होंने तो मिटाई नहीं और रविन्द्र जी ने मिटा डाली ।
6. क्या इसे अनवर जमाल के प्रति अन्याय के साथ साथ संयोजक जनाब सलीम ख़ान साहब का अपमान नहीं समझा जाएगा ?
7. क्या संयोजक के कमेंट की कोई वैल्यू ही नहीं है जबकि वह इस ब्लाग का निर्माता भी हो ?
अतः यह पोस्ट पुनः पेश की जाती है ।
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सोमवार, जनवरी 24, 2011
हां तो फिर क्या सोचा एलबीए के पदाधिकारीगणों ने ?

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हां तो फिर क्या सोचा एलबीए के पदाधिकारीगणों ने ?
क्या डा. श्याम गुप्ता जी को ब्रह्मा जी के गुण और कार्यों से संबंधित धार्मिक लेख इस साझा ब्लाग पर छापने से रोका जाएगा कि नहीं ?
अगर उन्हें नहीं रोका जाता है तो फिर उनके लेख पर उठने वाले सवालों को बाद में एलबीए पदाधिकारीगण कैसे रोक पाएंगे ?
क्या विज्ञान भी वैदिक धर्म का ही एक अंग नहीं है ?
क्या वैदिक विज्ञान का प्रचार करना भी वैदिक धर्म के ही एक अंग का प्रचार करना नहीं है ?
डा. श्याम गुप्ता जी ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि उत्पन्न किया जाना मानते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति के इस प्रकरण में सरस्वती और कामदेव का ज़िक्र भी आएगा और उसमें अलग अलग लोगों के अलग अलग मत हैं।
क्या ऐसे विवादित प्रकरण को यहां उठाया जाना उचित है ?
मेरी समझ में तो जो भी नियम हो वह सभी पर लागू होना चाहिए और यहां किसी भी धर्म के ग्रंथ का उद्धरण देना वर्जित होना चाहिए ताकि धर्मग्रंथ के विषय में ऐसी कोई बहस का सिलसिला यहां शुरू न होने पाए जैसी बहसें मेरे ब्लाग पर अक्सर होती हैं, उदाहरणार्थ-
1.Mandir-Masjid मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने - Anwer Jamal
2.The message of Eid-ul- adha विज्ञान के युग में कुर्बानी पर ऐतराज़ क्यों ?, अन्धविश्वासी सवालों के वैज्ञानिक जवाब !
3.मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘ - Anwer Jamal

क्या मेरे इस सुझाव से सहमत होने में किसी को कोई संकोच है ?

http://vedquran.blogspot.com/2010/09/mandir-masjid-anwer-jamal.html


http://islamdharma.blogspot.com/2010/11/message-of-eid-ul-adha-maulana_17.html


http://vedquran.blogspot.com/2010/10/what-was-real-mission-of-christ-anwer.html

इस विषय में पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें -

परिवार के सदस्यों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं LBA के पदाधिकारीगण ?


क्या सभी धर्म एक ही ईश्वर की पूजा करना बताते हैं ? Some phillosophers are wrong doers.

इसी संवाद के दरमियान जनाब सलीम खान साहब की एक पोस्ट आई है .

यह एक बेहतरीन पोस्ट है जो हमारे लिए एक मार्गदर्शक पोस्ट की हैसियत रखती  है. इसमें उन्होंने किसी भी धर्मग्रन्थ का नाम लिए बिना ही देश की कई ज्वलंत समस्याओं का निवारण कर दिया है. आशा है कि एलबीए के सभी सदस्य उनके संकेत और सन्देश को यथावत समझेंगे .
धन्यवाद . 

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रविवार, जनवरी 23, 2011
क्या सभी धर्म एक ही ईश्वर की पूजा करना बताते हैं ? Some phillosophers are wrong doers.

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@ हरीश जी ! इस साझा ब्लाग 'लखनऊ ब्लागर्स एसोसिअशन' पर किसी को भी धर्मग्रंथों को प्रमाण के रूप में पेश करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए वरना जो उसके मत से असहमत है वह सवाल ज़रूर उठाएगा और तब जवाब दिया जाना चाहिए ।
अगर आपके पास तार्किक उत्तर नहीं हैं तो फिर पुराणों को विज्ञान का स्रोत बताकर भ्रम न फैलाया जाए ।
सभी धर्म न तो एक ईश्वर की पूजा करना बताते हैं और न ही वे सब के सब मानव जाति के लिए समान रूप से कल्याणकारी हैं ।
धर्म के नाम से जाने जा रहे कितने ही दर्शन तो ईश्वर का वजूद ही नहीं मानते !
पता नहीं आपने कहाँ पढ़ लिया कि सभी धर्म एक ही ईश्वर की पूजा करना बताते हैं ?
सही बात आपको बताई जाती है तो इसे आप शास्त्रार्थ कहने के बजाय विवाद करना समझकर अल्पबुद्धि का परिचय क्यों देते हैं बार बार ?

@ हरीश जी ! जब पोस्ट लेखक डा. श्याम गुप्ता जी को कोई ऐतराज नहीं है हमारे द्वारा सवाल पूछने पर बल्कि वह चाहते हैं कि उनसे सवाल पूछे जाएँ तो आपको क्या ऐतराज है भाई ?
जो सवाल आपसे पूछा है उसका जवाब आपने अभी तक क्यों नहीं दिया है ?

@ गुप्ता जी ! आपने भी नहीं बताया कि भागवत में महात्मा बुद्ध को विष्णु जी का पापावतार क्यों बताया गया है ?
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इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी के लिए देखें -
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ख़ाक जन्नत है इसके क़दमों की
सोच फिर कितनी क़ीमती है माँ

माँ की नसीहतें भी अनमोल होती हैं । जो बच्चा उन्हें मानता है वह जीते जी भी जन्नत के साये में रहता है और मरने के बाद भी ।
मौत के बाद फिर दोबारा मौत नहीं आती। सच्चे लोग अपने लोगों के साथ रहेंगे हमेशा हमेशा ।
मौत के बाद के जीवन को भी जानने की ज़रूरत है।

नोट : यह एक कमेँट है जो मैंने रंग बिरंगी एकता नाम के ब्लाग की पोस्ट पर अभी अभी दिया है । मैं इस ब्लाग को फ़ॉलो करता हुं।
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शुक्रवार, जनवरी 21, 2011
कौन देगा मेरे सिर्फ़ एक सवाल का जवाब ?

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हरीश भाई ! आपकी ही तरह स्वामी श्री लक्ष्मीशंकराचार्य जी को भी उस साहित्य ने गुमराह कर दिया था जो कि इंसानियत के दुश्मन हमारे देश में लंबे अर्से से फैलाते आ रहे हैं। आप उनकी लिखी किताब ‘इस्लाम : आतंक ? या आदर्श‘ पढ़िये, इस्लाम और कुरआन के बारे में आप जो ग़लतफ़हमियां जबरन पाले बैठे हैं, सब दूर हो जाएंगी। गीता पूरी तरह से एक युद्ध का उपदेश है। उसके बारे में तो आपको कभी ऐतराज़ नहीं हुआ बल्कि आप तो उसे पढ़ने की सलाह भी देते हैं। मैंने आपकी बात पर कोई ऐतराज़ भी नहीं किया कि इसमें तो राज्य के लालच में अपने रिश्तेदारों और गुरूजनों को मारने की प्रेरणा उन भाईयों को दी जा रही है, जो सब के सब एक पत्नी के तो थे लेकिन एक बाप के न थे।
आपने एक और लेख लिख डाला और 15-20 सवाल और कर डाले। आपके हरेक सवाल का जवाब दिया जाएगा ताकि आपके दिल के हरेक कोने से तमाम ग़लतफ़हमियों के जाले निकल जाएं और आपका मन निर्मल हो जाए लेकिन उससे पहले आपको मेरे केवल एक सवाल का जवाब देना होगा जो कि मैंने आपसे पूछा है कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः‘ आपके किस ग्रंथ में है ?
अगर यह किसी हिंदू धर्म ग्रंथ में है ही नहीं तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि यह हमारे धर्म की मान्यता है ?
जो सिद्धांत किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथ में नहीं है वह हिंदू धर्म की मान्यता हो कैसे गया ?
अनवर जमाल कभी हिन्दू धर्म का या हिन्दू भाईयों का विरोध नहीं करता बल्कि वह अफ़वाह फैलाने का विरोध करता है जैसे कि हिन्दू धर्म और इस्लाम के बारे में आप अफ़वाह फैला रहे हैं।
जिस सूचना या बात का कोई आधार और स्रोत ज्ञात न हो और वह बात भी बेबुनियाद हो, उसे अफ़वाह कहा जाता है।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः‘ आपसे ठीक से लिखा तक नहीं गया है। यह आपका ज्ञान है। चलिए अब आप ब्लाग जगत के सारे विद्वानों को बुला लीजिए अपनी मदद के लिए और बाहरी दुनिया कि ज्ञानियों से भी जाकर पूछ आईये और मेरे सिर्फ़ एक सवाल का जवाब दीजिए।
इस संवाद से आपको पता चल जाएगा कि आपको दूसरों के ही बारे में नहीं बल्कि खुद अपने बारे में भी कितनी बड़ी ग़लतफ़हमियां हैं ?
धर्म में इसी तरह लोगों ने पहले भी हिंदू धर्म में अपनी तरफ़ से बातें मिलाई हैं और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर चला आ रहा है। इसी मिलावट के कारण के हिंदू धर्म का स्वरूप विकृत हो चुका है। जब उस स्वरूप विकृत हो गया तो आप जैसे लोगों ने अपना भेष-भाषा और संस्कार सभी कुछ बदल डाले यहां तक कि धर्म का नाम भी आपके पास शेष न बचा। धर्म के लिए हिंदू शब्द किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथ में नहीं आया है। आपसे न तो इसकी परंपराएं सुरक्षित रखी गईं और न ही आप इसके संस्कारों का ही पालन आज कर रहे हैं। तब भी आप अपना अहंकार और हठ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, ऐसा क्यों ?
आपका दावा है कि अधिकतर मुसलमान बुरे होते हैं जबकि हिन्दू अच्छे होते हैं।
मैं भी यही मानता हूं कि
मुसलमानों का चरम परम पतन हो चुका है
और
इस विषय में आप नीचे दिए गए दो लिंक्स पर जाकर मेरे विचार देख सकते हैं। मैं कभी पक्षपात नहीं करता। जो हालात मैं देखता हूं उसके आधार पर जो निष्कर्ष निकलता है, मैं वही कहता हूं। हरेक ब्लागर वही कहता है।
हिन्दू भाईयों के बारे में इतने अच्छे विचार रखने के बाद भी मुझे आप जैसे लोगों ने कभी थैंक्स नहीं कहा, ऐसा क्यों ?
अभी भाई खुशदीप जी ने अपनी पोस्ट में यह जानकारी दी है-

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका (किस्त-1) 

चुनाव आयोग का कहना है कि देश में 1200 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैंण्ण्ण्इनमें से सिर्फ 16 फ़ीसदी ही यानि 200 पार्टियां ही राजनीतिक गतिविधियों में लगी हैंण्ण्ण्बाकी ज्यादातर पार्टियां राजनीतिक चंदे के नाम पर काली कमाई को धो कर व्हाईट करने में लगी हैं...

..अब आप बताईये कि ये 1200 राजनीतिक पार्टियां और इसके समर्थक मुसलमान हैं या हिंदू ?
देश की बर्बादी का सारा इल्ज़ाम आप मुसलमानों पर डाल रहे हैं तो आप इन्हें क्या कहेंगे और कब कहेंगे ?
इसकी मैं इंतज़ार नहीं करूंगा क्योंकि पहले मुझे उस सवाल का जवाब चाहिए जो मैंने आप से ऊपर पूछा है।
आपको मैं अब भी कोई इल्ज़ाम नहीं दूंगा और आपको भी मैं अच्छा आदमी ही मानता हूं। ग़लतफ़हमियां अच्छे-अच्छों को भ्रम में डाल देती हैं। मेरी कोशिश होगी कि आपकी ग़लतफ़हमियां दूर कर दी जाएं।
आपने सवाल करके मेरी ज़िम्मेदारी को और भी बढ़ा दिया है।
Please see
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/organised-crime-against-india.html

समाज का सबसे बड़ा विनाशक कट्टरता

http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/blog-post_20.html?showComment=1295618043842#comment-c8896393922460845647
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गुरुवार, जनवरी 20, 2011
क्या प्राकृत और संस्कृत से पहले से पंजाबी भाषा मौजूद थी ? Isn't Sanskrit the oldest one ?

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बाबा फरीद अपने मुरीदों के दरमियान
पंजाबी भाषी लोगों में सिख मुश्किल से 25 फीसद ही होंगे, जबकि 75 फीसद जुबान बोलने वाले हिंदू और मुसलमान हैं। विश्व के 13 करोड़ लोग यह भाषा बोलते हैं। इसमें सिखों की संख्या ज्यादा से ज्यादा तीन करोड़ होगी। इसके साथ ही नई खोजों से यह भी साबित हुआ है कि पंजाबी बोलने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इनसे यह भी पता चला है कि आम धारणा के विपरीत पंजाबी संस्कृत भाषा की उपज नहीं, बल्कि पहले से ही विकसित थी। इसका द्रविण भाषा के साथ भी गहरा संबंध है। भाषा के बारे में नई खोजों से यह भी साफ हो गया है कि मातृ भाषा के जानकार लोग ही दूसरी भाषा में माहिर हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें व्याकरण की जानकारी होती है। ऐसी धारणा गलत साबित हो गई है कि मातृभाषा सीखने वाला बच्चा अंग्रेजी में कमजोर हो जाएगा।
भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष डाक्टर सतिंदर सिंह नूर ने इस मौके पर अकादमी की ओर से 24 भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है। पंजाबी का इससे अहम स्थान है। यह भारतीय भाषाओं की रीढ़ है। विश्व के 160 देशों में पंजाबी भाषा बोली जाती है। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में 13 करोड़ लोगों की भाषा पंजाबी है। सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा चीनी (150 करोड़), अंग्रेजी बोलने वाले 53 करोड़ हैं। तीसरे स्थान पर हिंदी बोलने वालों की संख्या 48 करोड़ है।
उन्होंने कहा कि पंजाबी हिंदुस्तान की सबसे पुरानी भाषाओं में शामिल है। विश्व की पांच प्रमुख सांस्कृतिक केद्रों में पंजाब शामिल रहा है। ताजा अनुसंधान से पता चला है कि प्राकृत और संस्कृत से पहले से पंजाबी भाषा मौजूद थी, हालांकि तब उसका नाम कुछ और हो सकता है। इसका पता इससे चलता है कि सबसे प्राचीन द्रविण भाषाओं से पंजाबी का गहरा संबंध है। तामिल में ही पंजाबी के एक हजार से ज्यादा शब्दों का पता चला है। हड़प्पा-मोहेनजोदड़ो सभ्यता के नष्ट होने से पहले ही पंजाबी भाषा मौजूद थी। सभ्यता नष्ट होने पर यहां के लोग विस्थापित होकर पूर्वी प्रदेश में फैले। संथाल भी पुराने पंजाबी हैं। उनका लोकगीत पंजाबी से भरा हुआ है। यहां से लोग तक्षशिला, श्रीनगर, नालंदा विश्वविद्यालय के रास्ते येरूशलम तक गए। इसलिए चीन, कंबोडिया तक सभी भाषाओं में पंजाबी शामिल है। इस बारे में अध्य्यन जारी है। मुल्तान से दूसरा रास्ता हड़प्पा-मोहेनजोदड़ों से होकर दिल्ली, अजमेर, गुजरात, आंध्र प्रदेश , चेन्नई तक गया, इसलिए पंजाबी दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी रीढ़ बनी। ऋगवेद, गीता, बाल्मिकी रामायण, ज्यादातर उपनिषद की रचना का केंद्र भी पंजाब ही रहा है। पंजाबी बोलने वालों में नानक पंथी, उदासी साधु, सन्यासी, सिकलीगर (बंजारे) शामिल हैं। खासकर महाराष्ट्र में ही तीन करोड़ सिकलीगर हैं।
उन्होंने कहा कि पंजाबी पंजाबियों की पहली भाषा है और अंग्रेजी उनकी दूसरी भाषा है। हिंदी संवाद की भाषा है। 1950 में पंजाबी में तीन लाख शब्द थे, जबकि अब बढ़कर 13 लाख हो गए हैं। दूसरी ओर अंग्रेजी में महज 16 लाख शब्द हैं।
इस बारे में ज़्यादा पढने के लिए क्लिक करें-
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/isnt-sanskrit-oldest-one.html
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ब्लागीय कोर्ट मार्शल : कारण और निवारण What should I write ? You decide .

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'शांति के लिए वेद कुरआन' पे मैंने एक लेख लिखा तो मुझे उस लेख पर एक मूर्धन्य ब्लागर भाई ज़ीशान की टिप्पणी मिली।
उन्होंने ताज्जुब ज़ाहिर किया कि शांति के लेख पर इतनी कम टिप्पणियाँ ?
मैंने उन्हें जवाब दिया कि-

@ ज़ीशान भाई !
शुक्रिया ,
आपका यह एक कमेन्ट हिंदी ब्लागर्स की बौद्धिकता को बेनक़ाब करने के लिए काफी है ।
जब अनवर जमाल इन्हें दौड़ा लेता है तो ये कहते हैं कि अनवर जमाल शांति की बात नहीं करता और जब वह शांति का पैग़ाम देता है तो ये दो लफ़्ज़ लिखना पसंद नहीं करते ।
अभी मैं इनमें से किसी का ब्लागीय कोर्ट मार्शल कर दूं तो आएंगे भागे भागे और 80 कमेन्ट कर देंगे।
यह प्रवृत्ति ग़लत है।
अगर लोग चाहते हैं कि अनवर जमाल उन्हें दौड़ाना बंद कर दे तो कम से कम उसके अविवादित लेखों को तो पढ़ो और सराहो ताकि वह उसी तरह के लेखन में आगे बढ़ सके।
उसे हतोत्साहित करने या डराने की कोशिश ख़ुद षडयंत्रकारियों के लिए ही घातक सिद्ध होगी।
अनवर के लेखन की शैली को बदलना ख़ुद बहुसंख्यक ब्लागर्स के हाथ में है ।
उन्हें सोचना चाहिए कि वे अनवर जमाल को किस तरह के लेख लिखते देखना चाहते हैं ?
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मंगलवार, जनवरी 18, 2011
शांति के लिए वेद कुरआन The absolute peace

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    कहीं दूर एक हरे-भरे टीले पर उगते हुए सूरज की किरणें पड़ रही हैं और हरियाली के बीच बैठा हुआ एक छोटा सा बच्चा गाय़त्री मंत्र पढ़ रहा है-
‘ओउम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो  यो नः प्रचोदयात्।‘
    सफ़ेद धोती कुरते में एक आचार्य उसके सामने ऊंचाई पर ज्ञानमुद्रा में ध्यानमग्न स्थिति में बैठा हुआ है। वह गायत्री की स्वरलहरियों में गहरा ग़ोता लगाये हुए है।
    बच्चा अपनी सुरीली आवाज़ में गायत्री का भावार्थ भी दोहरा रहा है-‘उस प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का वरण करते हैं और उस देव की महिमा का ध्यान करते हैं जो हमारे पापों को नष्ट करके हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग की प्रेरणा देता है।
    वाटिका के मनोहारी माहौल में देवताओं की सी मोहिनी आवाज़ में गायत्री मंत्र का उच्चारण और श्रवण दोनों ही धरती पर स्वर्ग का साक्षात्कार करा रहे हैं।
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सोमवार, जनवरी 17, 2011
देश-विदेश में अक्सर मुहब्बत की जो यादगारें पाई जाती हैं वे आशिक़ों ने अपनी महबूबाओं और बीवियों के लिए तो बनाई हैं लेकिन ‘प्यारी मां के लिए‘ कहीं कोई ताजमहल नज़र नहीं आता , ऐसा क्यों हुआ ? Taj for a mother

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आज रिश्तों की अज़्मत रोज़ कम से कमतर होती जा रही है। रिश्तों की अज़्मत और उसकी पाकीज़गी को बरक़रार रखने के लिए उनका ज़िक्र निहायत ज़रूरी है। मां का रिश्ता एक सबसे पाक रिश्ता है। शायद ही कोई लेखक ऐसा हुआ हो जिसने मां के बारे में कुछ न लिखा हो। शायद ही कोई आदमी ऐसा हुआ हो जिसने अपनी मां के लिए कुछ अच्छा न कहा हो। तब भी देश-विदेश में अक्सर मुहब्बत की जो यादगारें पाई जाती हैं वे आशिक़ों ने अपनी महबूबाओं और बीवियों के लिए तो बनाई हैं लेकिन ‘प्यारी मां के लिए‘ कहीं कोई ताजमहल नज़र नहीं आता।
ऐसा क्यों हुआ ?
इस तरह के हरेक सवाल पर आज विचार करना होगा।
‘प्यारी मां‘ के नाम से ब्लाग शुरू करने का मक़सद यही है।
इस प्यारे से ब्लाग को एक टिनी-मिनी एग्रीगेटर की शक्ल भी दी गई है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा मांओं और बहनों के ब्लाग्स को ब्लाग रीडर्स के लिए उपलब्ध कराया जा सके। जो मां-बहनें इस ब्लाग से एक लेखिका के तौर पर जुड़ने की ख्वाहिशमंद हों वे अपनी ईमेल आईडी भेजने की कृपा करें और जो अपना ब्लाग इसमें देखना चाहती हों, वे अपने ब्लाग का पता इसी ब्लाग की टिप्पणी में या फिर ईमेल से भेज दें।
मेरा ईमेल पता है- eshvani@gmail.com
http://pyarimaan.blogspot.com/2011/01/blog-post_12.html
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रविवार, जनवरी 16, 2011
हिंदू और मुस्लिम मतों में बुनियादी अंतर क्या है ? The main difference between Hinduism and Islam

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हाथ कंगन तो आरसी क्या ?
आज विश्व में कुल 153 करोड़ मुसलमान हैं और लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। दुनिया का हर चैथा आदमी आज मुसलमान है। दुनिया की हर नस्ल और हरेक कल्चर का आदमी इसलामी समाज का अंग है।
इनमें से आप किसी से भी और कितनों से भी पूछ लीजिए कि वह कुरआन को क्या मानता है ?
उनमें से हरेक एक ही जवाब देगा कि ‘वह कुरआन को ईश्वर की ओर से अवततिरत ज्ञान मानता है ?‘
अब आप यही बात ज़्यादा नहीं बल्कि मात्र दस-पांच हिंदू भाईयों से पूछ लीजिए। उनमें से हरेक का जवाब एक-दूसरे से अलग होगा, विपरीत होगा।
सच एक होता है और झूठ कभी एक नहीं होता लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदू धर्म की बुनियाद कभी सत्य पर नहीं रही। नहीं बल्कि ईश्वर की ओर से इस पवित्र भूमि पर ‘ज्ञान‘ उतरा है और उसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। वे अवशेष भी अपने आप में इतने समर्थ कि पूरे सत्य को आज भी प्रकट कर सकते हैं, अगर कोई वास्तव में सत्य को उपलब्ध होना चाहे तो।
नेकी को इल्ज़ाम न दीजिए
इस्लाम में न कट्टरता कल थी और न ही आज है
एक नेक औरत अपने एक ही पति के सामने समर्पण करती है, हरेक के सामने नहीं और अगर कोई दूसरा पुरूष उस पर सवार होने की कोशिश करता है तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जाती है। वह जिसे मारती है दुनिया उस मरने वाले पर लानत करती है और उस औरत की नेकी और बहादुरी के गुण गाती है। इसे उस औरत की कट्टरता नहीं कहा जाता बल्कि उसे अपने एक पति के प्रति वफ़ादार माना जाता है। दूसरी तरफ़ हमारे समाज में ऐसी भी औरतें पाई जाती हैं कि वे ज़रा से लालच में बहुतों के साथ नाजायज़ संबंध बनाये रखती हैं। उन औरतों को हमारा समाज, बेवफ़ा और वेश्या कहता है। वे किसी को भी अपने शरीर से आनंद लेने देती हैं, उनके इस अमल को हमारे समाज में कोई भी ‘उदारता‘ का नाम नहीं देता और न ही उसे कोई महानता का खि़ताब देता है।

अपने सच्चे स्वामी को पहचानिए
ठीक ऐसे ही इस सारी सृष्टि का और हरेक नर-नारी का सच्चा स्वामी केवल एक प्रभु पालनहार है, उसी का आदेश माननीय है, केवल वही एक पूजनीय है। जो कोई उसके आदेश के विपरीत आदेश दे तो वह आदेश ठोकर मारने के लायक़ है। उस सच्चे स्वामी के प्रति वफ़ादारी और प्रतिबद्धता का तक़ाज़ा यही है। अब चाहे इसमें कोई बखेड़ा ही क्यों न खड़ा हो जाय।

बग़ावत एक भयानक जुर्म है
जो लोग ज़रा से लालच में आकर उस सच्चे मालिक के हुक्म को भुला देते हैं, वे बग़ावत और जुर्म के रास्ते पर निकल जाते हैं, दौलत समेटकर, ब्याज लेकर ऐश करते हैं, अपनी सुविधा की ख़ातिर कन्या भ्रूण को पेट में ही मार डालते हैं। वे सभी अपने मालिक के बाग़ी हैं, वेश्या से भी बदतर हैं।
पहले कभी औरतें अपने अंग की झलक भी न देती थीं लेकिन आज ज़माना वह आ गया है कि जब बेटियां सबके सामने चुम्बन दे रही हैं और बाप उनकी ‘कला‘ की तारीफ़ कर रहा है। आज लोगों की समझ उलट गई है। ज़्यादा लोग ईश्वर के प्रति अपनी वफ़ादारी खो चुके हैं।

खुश्बू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से 
अपनी आत्मा पर से आत्मग्लानि का बोझ हटाने के लिए उन्होंने खुद को सुधारने के बजाय खुद को उदार और वफ़ादारों को कट्टर कहना शुरू कर दिया है। लेकिन वफ़ादार कभी इल्ज़ामों से नहीं डरा करते। उनकी आत्मा सच्ची होती है। नेक औरतें अल्प संख्या में हों और वेश्याएं बहुत बड़ी तादाद में, तब भी नैतिकता का पैमाना नहीं बदल सकता। नैतिकता के पैमाने को संख्या बल से नहीं बदला जा सकता।
दुनिया भर की मीडिया उन देशों के हाथ में है जहां वेश्या को ‘सेक्स वर्कर‘ कहकर सम्मानित किया जाता है, जहां समलैंगिक संबंध आम हैं, जहां नंगों के बाक़ायदा क्लब हैं। सही-ग़लत की तमीज़ खो चुके ये लोग दो-दो विश्वयुद्धों में करोड़ों मासूम लोगों को मार चुके हैं और आज भी तेल आदि प्राकृतिक संपदा के लालच में जहां चाहे वहां बम बरसाते हुए घूम रहे हैं। वास्तव में यही आतंकवादी हैं। जो यह सच्चाई नहीं जानता, वह कुछ भी नहीं जानता।

वफ़ादारी
आप मीडिया को बुनियाद बनाकर मुसलमानों पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं। यही पश्चिमी मीडिया भारत के नंगे-भूखों की और सपेरों की तस्वीरें छापकर विश्व को आज तक यही दिखाता आया है कि भारत नंगे-भूखों और सपेरों का देश है, लेकिन क्या वास्तव में यह सच है ?
मीडिया अपने आक़ाओं के स्वार्थों के लिए काम करती आई है और आज नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया का आक़ा मुसलमान नहीं है। जो उसके आक़ा हैं, उन्हें मुसलमान खटकते हैं, इसीलिए वे उसकी छवि विकृत कर देना चाहते हैं। आपको इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
ग़लतियां मुसलमानों की भी हैं। वे सब के सब सही नहीं हैं लेकिन दुनिया में या इस देश के सारे फ़सादों के पीछे केवल मुसलमान ही नहीं हैं। विदेशों में खरबों डालर जिन ग़द्दार भारतीयों का है, उनमें मुश्किल से ही कोई मुसलमान होगा। वे सभी आज भी देश में सम्मान और शान से जी रहे हैं। उनके खि़लाफ़ न आज तक कुछ हुआ है और न ही आगे होगा। उनके नाम आज तक किसी मीडिया में नहीं छपे और न ही छपेंगे क्योंकि मीडिया आज उन्हीं का तो गुलाम है।

सच की क़ीमत है झूठ का त्याग
सच को पहचानिए ताकि आप उसे अपना सकें और अपना उद्धार कर सकें।
तंगनज़री से आप इल्ज़ाम तो लगा सकते हैं और मुसलमानों को थोड़ा-बहुत बदनाम करके, उसे अपने से नीच और तुच्छ समझकर आप अपने अहं को भी संतुष्ट कर सकते हैं लेकिन तब आप सत्य को उपलब्ध न हो सकेंगे।
अगर आपको झूठ चाहिए तो आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अगर आपको जीवन का मक़सद और उसे पाने का विधि-विधान चाहिए, ऐसा विधान जो कि वास्तव में ही सनातन है, जिसे आप अज्ञात पूर्व में खो बैठे हैं तब आपको निष्पक्ष होकर न्यायपूर्वक सोचना होगा कि वफ़ादार नेक नर-नारियों को कट्टरता का इल्ज़ाम देना ठीक नहीं है बल्कि उनसे वफ़ादारी का तौर-तरीक़ा सीखना लाज़िमी है।
धन्यवाद! 
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शनिवार, जनवरी 15, 2011
क्या ईश्वर भी कभी अनीश्वरवादी हो सकता है ? c

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पूस के माह में संभोग जायज़ या नाजायज़ ?
@ जनाब डा. श्याम गुप्ता जी ! कृप्या ‘चैरिटी‘ शब्द की स्पैलिंग चेक कर लीजिएगा आपको पता चल जाएगा कि इस कहावत को आपने कहां ग़लत लिखा है। आपको तो मात्र इशारे से ही समझ जाना चाहिए था लेकिन आप तो साफ़ बताने के बाद भी नहीं जान पाए। दूसरी बात यह है कि इस कहावत में ‘मस्ट‘ नहीं है बल्कि ‘चैरिटी बिगिन्स फ़्रॉम होम‘ है। मस्ट की तो फिर भी चल जाएगी लेकिन स्पेलिंग मिस्टेक तो आपको दुरूस्त करनी ही पड़ेगी।
2. हिंदुओं में जितनी परंपराएं प्रचलित हैं उनमें जितनी लिखी हुई हैं इससे ज़्यादा वे हैं जो अलिखित हैं। फिर अलग अलग जातियों के ही नहीं बल्कि अलग अलग गांवों तक के रिवाज अलग हैं। आप किसी यदुवंशी से पूछिए कि ‘पूस के मास में नवविवाहित यदुवंशियों को संभोग से क्यों रोका गया है ?‘
भगवान के साथ भेदभाव क्यों ?
3. आप अलिखित हिंदू रस्मों को तो क्या जानेंगे  ?
आपको यह भी पता नहीं है कि श्रीमद्भागवत महापुराण में महात्मा बुद्ध को विष्णु जी का अवतार बताया गया है। आप कह रहे हैं कि हम तो महात्मा बुद्ध को केवल एक विद्वान मानकर उन्हें आदर देते हैं ?
आपको श्री रामचंद्र जी का अवतार होना तो पता है लेकिन महात्मा बुद्ध का अवतार होना पता नहीं है। यह अज्ञान नहीं है तो और क्या है ?
4. यदि वास्तव में ही महात्मा बुद्ध विष्णु जी के अवतार थे तो आपके मंदिरों में श्रीरामचंद्र जी और उनके वानर तक के तो चित्र मिलते हैं लेकिन उन्हीं के एक और अवतार महात्मा बुद्ध के चित्र या मूर्ति आदि क्यों नहीं मिलते ?
5. क्या इससे यह पता नहीं चलता कि आप लोग केवल इंसानों में ही भेदभाव नहीं करते बल्कि अगर भगवान भी आप लोगों के बीच जन्म ले ले तो आप उसके साथ भी भेदभाव करते हैं। उसके एक रूप की पूजा करेंगे और दूसरे रूप का एक चित्र तक किसी मंदिर में नहीं रखेंगे ?
क्या ईश्वर भी कभी अनीश्वरवादी हो सकता है ?
6. क्या ईश्वर भी कभी अनीश्वरवादी हो सकता है ?
जब श्रीमद्भागवत महापुराण महात्मा बुद्ध को ईश्वर घोषित कर रहा है तो फिर क्या महात्मा बुद्ध यह भूल गए थे कि वे स्वयं ईश्वर हैं और उन्हें अनीश्वरवादी और यज्ञ का विरोधी नहीं होना चाहिए ?
7. महात्मा बुद्ध ने यज्ञ में अन्न-फल जलाने का विरोध क्यों किया ?
8. अगर उन्होंने विरोध कर भी दिया तो तत्कालीन वेदाचार्यों ने बौद्धों के विरोधस्वरूप यज्ञ को कलिवज्र्य क्यों घोषित कर दिया ?
अगर यज्ञ धर्म था तो उसे किसी अनीश्वरवादी विद्वान के कहने से बंद नहीं करना चाहिए था। जैसे कि हम अज्ञानियों के विरोध के बावजूद कुरबानी बंद नहीं करते।
हिंदू धर्म के सिद्धांतों को लगातार बदला जाता रहा है
9. आपने धर्म को खेल समझ रखा है कि जब चाहो और जितना चाहो उसे बदल दो।
10. जितना बदलने की इजाज़त होती है वह या तो अनुकूलन में आता है या फिर आपद्-धर्म होता है। उसमें धर्म के मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखा जाता है। ऐसा नहीं होता कि समय बदले तो धर्म के मूल सिद्धांत ही बदल कर रख दिए जाएं। जब सिद्धांत बदल दिए जाते हैं तो फिर धर्म भी बदल जाता है। इसे धर्म परिवर्तन कहा जाता है, न कि नवीनीकरण।
पद सोपान क्रम में जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का आधार है। चाहे वह जन्मना हो या फिर गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर। इन चारों जातियों के अधिकार बराबर नहीं हैं। यह वर्ण-व्यवस्था का स्पष्ट सिद्धांत है लेकिन आज भारत में हरेक वर्ण को, हरेक श्रेणी के कर्मचारी को बराबर अधिकार है। ब्राह्मण किसी पर भी श्रेष्ठता नहीं है।
ऐसे ही हिंदू जीवन पद्धति का आधार चार आश्रम हैं। आप 50 साल से ऊपर के हो चुके हैं लेकिन आज भी यहीं घूम रहे हैं मुसलमानों की तरह। आप जंगल जाने के लिए तैयार ही नहीं हैं एक वानप्रस्थी की तरह। जब आपको हिंदू जीवन पद्धति की महानता पर यक़ीन है तो आप इस्लाम पर अमल क्यों कर रहे हैं ?
अपने धर्म से पतित होना और क्या होता है ?
चारों आश्रमों का त्याग क्यों ?
11. आज हिंदू अपने बच्चों को गुरूकुलों में भेजने के बजाय कान्वेंट में भेज रहे हैं और बच्चे भी ‘ब्रह्मचर्य‘ का पालन नहीं कर रहे हैं। आप चारों आश्रमों में से किसी एक भी आश्रम का पालन नहीं करते तो फिर आप अपने धर्म के नास्तिक हुए कि नहीं ?
12. आप विवाह करते हैं लेकिन गृहस्थ के लिए हिंदू धर्म में जो विधान है कि अगर गर्भ ठहर जाए तो पति अपनी पत्नी से संभोग न करे । आप इसके भी पाबंद नहीं हैं। यहां भी आप इस्लाम पर ही अमल कर रहे हैं । अपने आश्रम के अनुसार आप आचरण क्यों नहीं करते ?
13. अगर वे अव्यवहारिक हैं तो आप मानते क्यों नहीं ?
हिंदू विवाह : संस्कार या समझौता ?
14. हिंदू धर्म में विवाह एक संस्कार है। पति के मरने के बाद भी औरत उसी की पत्नी रहती है। इस्लाम में पति की मौत के साथ ही रिश्ता टूट जाता है और तलाक़ से भी टूट जाता है तथा औरत दूसरा विवाह कर सकती है। आपने भी अपने संस्कार को मुसलमानों की तरह ‘समझौते‘ में ही बदल कर रख दिया है। जब हमने उसे आपकी तरह संस्कार नहीं माना तो आपने उसे हमारी तरह समझौता क्यों मान लिया ?
क्या इस्लाम हिंदू धर्म की नक़ल है ?
15. अगर इस्लाम आपके नज़रिये वाले हिंदू धर्म की नक़ल होता तो इसमें हिंदू धर्म के मौलिक सिद्धांत ज़रूर होते जैसे कि अवतारवाद, अंशवाद, बहुदेववाद, सती, नियोग, ऊंचनीच, छूतछात, जुआ, ब्याज, संगीत की अनुमति, देवदासी, मूर्तिपूजा, यज्ञ, सोलह संस्कार, चार आश्रम, आवागमन, गोपूजा, गाय का पेशाब पीना, हिंदुस्तान का कोई तीर्थ या सन्यास लेना आदि। इनमें से कोई भी चीज़ इस्लाम में सिरे से ही नहीं है। अलबत्ता आप खुद इन चीज़ों से अपना पीछा छुड़ाते जा रहे हैं और अपने धर्म को इस्लाम जैसा बनाते जा रहे हैं।
हिंदू धर्म के कुछ मतों के मानने वालों की शक्ल तक मुसलमानों से इतनी मिलती जुलती हो गई है कि अमेरिका में उन्हें मुसलमान समझकर मारने की घटना भी पेश आ चुकी है।
16. धर्म के सिद्धांतों को ही बदलकर रख दिया गया है और आप कह रहे हैं कि यही तो वैज्ञानिकता है। यह वैज्ञानिकता नहीं है बल्कि मूर्खता है और जनता को सदा मूर्ख बनाए रखने के लिए साज़िश का एक फंदा है। भारत में पहले बौद्ध धर्म का और जैन धर्म का सिक्का जम गया तो हिंदू धर्म को उनके सिद्धांतों के अनुसार ढाल दिया गया और जब मुसलमान आ गए तो उनकी तरह बन गए और अब यूरोपियन्स की तूती बोल रही है तो अपना रहन-सहन उनकी तरह कर डाला। धर्म से आपको कभी मतलब रहा ही नहीं। आप तो वक्त के हाकिम के रिवाज के मुताबिक अपनी मान्यताएं और परंपराएं बदलते चले आ रहे हैं। इसी उलट पलट में आपसे आपका धर्म खोया गया। आप भूल गए लेकिन मुझे याद है क्योंकि मेरे पास ‘वह‘ है जो आपके पास नहीं है।
17. कृप्या अपनी हालत पर ग़ौर करें और ऐसी हालत में भी अपनी महानता के झूठे दंभ को आप त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, सिवाय अफ़सोस के और क्या किया जा सकता है ?
धर्म एक प्रचारक अनेक
18. आप कहते हैं कि इस्लाम मात्र 1500-1600 साल पुराना है। मैं आपको बता चुका हूं कि इस्लाम सनातन है। एक ही सिद्धांत का प्रचार करने वाले लगभग एक लाख चैबीस संदेष्टा हुए हैं जो कि सब के सब हज़रत मुहम्मद साहब स. के आने से पहले ही हुए हैं। पैग़म्बर साहब स. की पैदाईश को भी 1500-1600 साल नहीं हुए हैं। इससे पता चलता है कि आपने इस्लाम के बारे में महज़ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर एक कल्पना गढ़ ली है। आप इस्लाम को जानने के लिए उसके मूल स्रोत से ज्ञान लेने के प्रति गंभीर नहीं हैं।
19. इस्लाम के प्रति तो आप क्या गंभीरता दिखाएंगे जबकि आप जिस धर्म को धर्म मानते हैं उसी का पालन करते हुए जंगल जाने के लिए तैयार नहीं हैं। धोती, चोटी और जनेऊ ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हैं।
20. आप हवन करने को पर्यावरण शुद्धि के ज़रूरी मानते हैं और दिन में 3 बार ऐसा किया जाना हिंदू शास्त्र आवश्यक मानते हैं। लेकिन आप जिस चीज़ को लाभकारी और धर्म मानते हैं उसे दिन में एक बार भी करने के लिए तैयार नहीं हैं।
21. आप इस्लाम की सत्यता पर विश्वास नहीं रखते लेकिन आपके कितने ही कर्म इस्लाम के अनुसार संपादित हो रहे हैं और जिस हिंदू जीवन पद्धति के कल्याणकारी होने का विश्वास आपके दिलो-दिमाग़ में रचा-बसा है, उसके अनुसार आप अमल करने के लिए तैयार नहीं हैं।
ऐसा विरोधाभास आपके जीवन में क्यों है ?
ज़रा इन बिंदुओं पर ग़ौर कीजिएगा। यह जीवन कोई तमाशा नहीं है और न ही धर्म कोई कपड़े हैं कि अपनी मर्ज़ी से जब चाहे इसका ड़िज़ायन चेंज कर लिया।
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शुक्रवार, जनवरी 14, 2011
मेरा संदेश साधु-संत और मुजरिम भी पढ़ते हैं The message

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एक तोहफा बहन शालिनी के लिए http://shalinikaushik2.blogspot.com/

1- आप कैसे हर लम्हा धीरे-धीरे इस्लाम की ओर बढ़ रहे हैं?
@ भाई डा. श्याम गुप्ता जी ! आपसे मैं जितना संवाद कर रहा हूं उतना ही ज़्यादा यह साफ़ होता जा रहा है कि आप डाक्टर कहलाते ज़रूर हैं लेकिन आपका अक्षर ज्ञान तक कमज़ोर है। आपने ‘चैरिटी मस्ट बिगिन फ़्राम होम‘ एक अंग्रेज़ी कहावत लिखी और ग़लत लिखी। एक डाक्टर कहलाने वाले व्यक्ति के लिए ऐसी ग़लतियां करना शोभा नहीं देता। लोग देखेंगे तो आपका इम्प्रेशन उन पर ग़लत पड़ेगा।
आपने बताया नहीं है कि इस्लाम के अनुसार कैसे ग़लत है किसी विद्वान को उद्धृत करके नेकी और भलाई की बात बताना ?
कृप्या बताएं ताकि मैं उससे बचूं ?
मैं नहीं चाहता कि मैं कोई काम खि़लाफ़े इस्लाम करूं।
मेरा संदेश आपकी ही तरह सभी हिंदी जानने वाले पढ़ते हैं। साधु-संत और वेश्याओं से लेकर मुजरिम भी पढ़ते हैं। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि मैं मुजरिमों को नेकी की बात नहीं बताता।
इस्लामी सिद्धांतों का प्रचार मैं ही नहीं करता बल्कि आप भी करते हैं। कुछ समय पहले तक भारत में चार वर्णों की व्यवस्था थी, ऊंचनीच और छूतछात थी, विधवा का दोबारा विवाह नहीं हुआ करता था बल्कि उसे सती किया जाता था, औरत को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता था, उसे पढ़ने की मनाही थी वग़ैरह, वग़ैरह। इन सब ज़ुल्मों को आप हिंदू धर्म का नाम दिया करते थे लेकिन आज ये सब ज़ुल्म बंद हो चुके हैं। ख़ुद आप लोगों ने ही इन सब रीति-रिवाजों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और इन्हें छोड़ दिया। आज आप इंसानों को बराबर मानते हैं और औरतों को वे सब अधिकार देते हैं जो कि आदि शंकराचार्य जी ने भी नहीं दिए आज तक। आपको बराबरी और भाईचारे का उसूल कहां से मिला ?
ज़रा सोच कर बताईयेगा।
हो सकता है कि आप अपने तास्सुब और अहंकार के कारण न मानें, तब मैं आपको हिंदू सुधारकों के उद्धृण दूंगा जिनमें वे स्वीकार करते हैं कि ये उसूल हमने इस्लाम से लिए हैं। आप भी इस्लाम के उसूलों को अपनाकर ही काम चला रहे हैं वर्ना आप जी ही नहीं सकते। बस आप इस्लाम का नाम नहीं लेते और मैं नाम लेता हूं और बताता हूं कि हां यह उसूल इस्लाम का है।
काफ़ी सारे इस्लामी उसूल आपकी ज़िंदगी में आ चुके हैं। आपकी धोती, चोटी और जनेऊ आपसे रूख़्सत हो चुके हैं। सबका मालिक एक है, यह भी आप मानने लगे हैं। पहले आप मूर्ति में शक्ति माना करते थे और अब उसे मात्र ध्यान जमाने का एक माध्यम भर मानने लगे हैं। देश में इस्लामी बैंकिंग आने ही वाली है यानि कि आर्थिक व्यवस्था भी इस्लाम के प्रभाव में आने वाली है। ग़र्ज़ यह कि बहुत से चेंज आ चुके हैं लेकिन जिनके पास सोचने समझने की ताक़त नहीं है या फिर उनमें मानने का हौसला नहीं है वे कैसे इस बात को मान सकते हैं कि वे हर लम्हा धीरे-धीरे इस्लाम की ओर बढ़ रहे हैं?
2- इस्लाम एक प्राकृतिक व्यवस्था है
@ बहन शालिनी कौशिक जी ! धर्म का उद्देश्य कल्याण है। यज्ञ में अन्न-धन जलाना एक आडंबर है। इसके विरोध में महात्मा बुद्ध आदि विचारक आवाज़ भी उठा चुके हैं और उनके तर्क बल के सामने परास्त होकर वेदवादियों द्वारा कलियुग में यज्ञ आदि न करने की व्यवस्था भी निर्धारित की जा चुकी है। राजनीति हो या व्यापार, जब आप आदमी को जीवन का सही मक़सद और जीवन गुज़ारने की सही रीत नहीं बता पाएंगे तो वह ग़लत ही तो करेगा। आज ग़लतियों का अंबार है और उन ग़लतियों को आज परंपरा का नाम दिया जा चुका है जैसे कि पूस के महीने में नवविवाहित हिंदू दंपत्ति न अपने किसी रिश्तेदार के जा सकते हैं और न ही आप में शारीरिक आनंद ले-दे सकते हैं। आखि़र क्या औचित्य है ऐसे आडंबर का ?
मेरा एक परिचित युवक है सुदामा यादव। बेचारे की अभी ताज़ी शादी हुई है और दोनों तरफ़ है आग बराबर लगी हुई और तब भी बेचारे आपस में मिल नहीं सकते जबकि इस्लाम में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। सारे सुधारों का मूल इस्लाम है। चाहे आप सीधे मान लें या फिर हल्के-हल्के करके। ये परंपराएं अब और चलने वाली नहीं हैं। आप भी एक नारी हैं। ‘ख़ास दिनों‘ में हिंदू धर्म की जो व्यवस्था है उसे आज आप नहीं मानती हैं और वैसे रहती हैं जैसे कि ‘उन दिनों‘ में इस्लाम बताता है। चाहे आपको पता भी न हो। इसी को कहते हैं प्राकृतिक व्यवस्था। इस्लाम एक प्राकृतिक व्यवस्था है।
इस संवाद कि पृष्ठभूमि  जानने के लिए देखें -

https://www.blogger.com/comment.g?blogID=554106341036687061&postID=253021086093887940&isPopup=त्रुए
और
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/hungers-cry.html
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गुरुवार, जनवरी 13, 2011
ज्ञान पाने की रीत The way to wisdom

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याद रखिएगा कि दर्शन आप छः नहीं छः हज़ार बना लीजिए। ये सारे मिलकर भी एक वेद के बराबर न हो पाएंगे। वेद ही ज्ञान है। दर्शन ज्ञान नहीं है बल्कि ज्ञान तक पहुंचने का एक माध्यम है। वेद सत्य है और दर्शन कल्पना है। सत्य आधार है और कल्पना मजबूरी। सत्य से मुक्ति है और कल्पना से बंधन। कल्पना सत्य भी हो सकती है और मिथ्या भी लेकिन सत्य कभी मिथ्या नहीं हो सकता। ईश्वर सत्य है और उस तक केवल सत्य के माध्यम से ही पहुंचना संभव है।
सही-ग़लत का ज्ञान कभी षटचक्रों के जागरण और समाधि से नहीं मिला करता। इसे पाने की रीत कुछ और ही है। वह सरल है इसीलिए मनुष्य उसे मूल्यहीन समझता है और आत्मघात के रास्ते पर चलने वालों को श्रेष्ठ समझता है। दुनिया का दस्तूर उल्टा है । मालिक की कृपा हवा पानी और रौशनी के रूप में सब पर बरस रही है और उसके ज्ञान की भी लेकिन आदमी हवा पानी और रौशनी की तरह उसके ज्ञान से लाभ नहीं उठा रहा है मात्र अपने तास्सुब के कारण।
कोई किसी का क्या बिगाड़ रहा है ?
अपना ही बिगाड़ रहा है । 
Place, where you can see the context of this post .
https://www.blogger.com/comment.g?blogID=554106341036687061&postID=1840318453488599693&isPopup=त्रुए 


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बुधवार, जनवरी 12, 2011
हमें  पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए - स्वामी विवेकानंद Hunger's cry

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लोग कहते हैं कि 
अनवर जमाल ! आप हिंदुओं के धर्म पर , उनकी परंपराओं पर क्यों लिखते हैं ?
भाई आपके साधु-सन्यासी से लेकर आम हिंदुओं तक हरेक ईश्वर की न्याय व्यवस्था और उसकी महिमा के खि़लाफ़ सवाल खड़े क्यों करता है ?
आप सवाल खड़े करना बंद कर दीजिए, अनवर जमाल उनके जवाब देना ख़ुद ब ख़ुद बंद कर देगा। अनवर जमाल ईश्वर और अल्लाह में भेद नहीं करता और न ही उसके बंदों में भेद करता है। अनवर जमाल ईश्वर का भक्त है क्योंकि वह अल्लाह का बंदा है और ईश्वर अल्लाह एक ही पालनहार प्रभु के दो अलग भाषाओं में दो नाम हैं लेकिन जिसके ये नाम हैं वह ख़ुद एक है। वही सबको हवा, पानी और भोजन देता है। आज हवा तो सबको मिल रही है लेकिन साफ़ पानी सबको मयस्सर नहीं है। सबको रोटी मयस्सर नहीं है। लोग परेशान हैं। जीवन काटना उन्हें भारी लग रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है ?
लोग भारत में जिन देवताओं को ईश्वर मानकर उनकी पूजा करते हैं, वे जब दुनिया में इंसान को रोटी नहीं दे सकते तो फिर वे स्वर्ग में अनंत सुख कैसे दे सकते हैं ?
यह सवाल कौन कर रहा है ?
क्या अनवर जमाल कर रहा है ?
नहीं यह सवाल कर रहे हैं स्वामी विवेकानंद जी।
...और वे कह रहे हैं कि
1- भारत को ऊपर उठाया जाना हैं ! गरीबों की भूख मिटाई जानी हैं ! शिक्षा का प्रसार किया जाना है ! पंडे पुरोहितो और धर्म के ठेकेदारों को हटाया जाना है ! हमने पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए ! हमें सामाजिक आतंक नहीं चाहिए !
2- जनता के आध्यात्मिक उत्थान की एक ही शर्त हैए आर्थिक और राजनीतिक पुनर्निर्माण !
3- ‘किसी के कह देने मात्र से अंधों की तरह करोड़ों देवी-देवताओं पर विश्वास न करो।‘
आप इस पूरे लेख को ‘मेरा देश मेरा धर्म‘ पर देख सकते हैं।
क्या स्वामी जी की बात ग़लत है ?
नहीं, अनवर जमाल उनसे सहमत है। स्वामी जी ने साफ़ कर दिया है कि जिन देवताओं को लोग ईश्वर मानकर पूज रहे हैं ये स्वर्ग तो क्या देंगे, वे एक समय की रोटी भी नहीं दे सकते। ये देवी-देवता किसी की समस्या हल नहीं करते बल्कि इनके नाम पर पंडे-पुरोहित सामाजिक आतंक फैलाते हैं। भारत को उपर उठाने के लिए इन्हें हटाया जाना ज़रूरी है। स्वामी जी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार आंज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं। आज भी जब लोग देव-स्थलों पर जाते हैं तो लौटकर यही कहते हैं कि
‘यह स्थल निस्संदेह देव रहित हैं' -सतीश सक्सेना
भाई साहब ! जब आपको यह पता चल गया है कि यह स्थल देव रहित है तो आप यहां खड़े क्यों हैं ?
चलिए उस स्थल की ओर जहां देव भी है और देववाणी भी। जहां उसकी पूजा तो होती है लेकिन चढ़ावा कोई नहीं चढ़ाया जाता। आर्थिक और राजनैतिक पुनर्निमाण की पूरी योजना आपको वहीं मिलेगी। जब आप वहां पहुंचेगे तो आप देखेंगे कि हर रंग और नस्ल का आदमी चाहे वह अमीर हो या ग़रीब अपने दाता के सामने एक साथ खड़े हैं और एक साथ ही झुक रहे हैं। जो वाणी वे सुन रहे हैं, उसमें एक दूसरे पर ज़ुल्म करना हराम बताया जा रहा है। एक दूसरे की मदद करना फ़ज़ बताया जा रहा है और ब्याज लेना एक घातक मज़र््ा बताकर उससे मुक्ति दिलाई जा रही है। कहा जा रहा है कि तुम पर हराम है अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा सो रहा है और तुम पेट भरकर खा रहे हो।
हरेक बुराई को पाप ही नहीं बल्कि उसे सामाजिक जुर्म भी बताया जा रहा है और उस पर नर्क की यातना से पहले दुनिया में भी दंड दिया जा रहा है और जब ऐसा हो जाता है तो हरेक आदमी को रोटी मिलना निश्चित हो जाता है। तब आदमी कहता है कि वाक़ई यह ईश्वर जो मुझे रोटी दे रहा है वह मुझे स्वर्ग का अनंत सुख भी दे सकता है।
आदमी ईश्वर को अपने अंदर-बाहर हर जगह महसूस करेगा। तब आनंद के लिए किसी समाधि की ज़रूरत नहीं रह जाएगी। वह स्वयमेव आपको उपलब्ध हो जाएगा।
आज आदमी दुखी है तो उसके पीछे ख़ुद उसका नज़रिया ज़िम्मेदार है। जो वास्तव में ईश्वर है उसे पहचानता नहीं, उसकी योजना को मानता नहीं तो अंजाम तबाही के सिवा क्या होगा ?
तब यही होगा कि उन चीज़ों को ईश्वर माना जाएगा जो कि वास्तव में ईश्वर नहीं हैं। उसके नाम पर सामाजिक आतंक फैलाने वाले पंडे-पुरोहित ऐसी परंपराओं में लोगों का अन्न-धन और आबरू तक स्वाहा कर देंगे जो कि वास्तव में धर्म ही नहीं है बल्कि उनका बनाया हुआ दर्शन मात्र है।
अनवर जमाल का कुसूर यह है कि वह सच को सामने क्यों लाता है ?
वह क्यों बताता है कि ग़रीबी और भूख से तड़प-तड़प कर मरती हुई देश की जनता को कैसे बचाया जा सकता है ?
वह क्यों सबके हित की बात करता है ?
आखि़र कैसे इस धरती पर ही स्वर्ग का आभास किया जा सकता है ?
लोक-परलोक का सुख हरेक को अभीष्ट है। दुनिया में जितने भी धर्म-दर्शन हैं, जितने भी वैज्ञानिक अविष्कार हुए हैं, उन सबके पीछे यही भावना है कि सारे इंसानों को सुख प्राप्त हो जाए।
अनवर जमाल पर ऐतराज़ करने वाले बताएं कि स्वामी जी ने अपने दर्शन का प्रचार विदेशियों में क्यों किया ?
तब वे बताएं कि आखि़र अनवर जमाल अपने ही देशवासियों में ‘अटल सत्य‘ का प्रचार क्यों नहीं कर सकता ?
सबने सोचा कि दुनिया का दुख कैसे दूर किया जाए ?
और जो उन्होंने समझा कि यह हल सही है, उसे सबके सामने पेश किया।
खुद स्वामी जी ने भी यही किया। इस्लाम और मुसलमानों पर उनके विचार उनके साहित्य में संग्रहीत हैं। मुसलमानों को उनके द्वारा लिखे गए पत्र भी सुरक्षित हैं और ऐसा करने वाले वे अकेले विद्वान नहीं हैं।
बहरहाल हम तो यह कह रहे हैं कि देश में करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा बंद होनी चाहिए। अगर आप हमारे कहने से ऐसा नहीं करते तो स्वामी जी के कहने से ही ऐसा कर लो।
आज स्वामी विवेकानंद जी जन्म दिवस है। इस अवसर पर गहनता से इस बात पर विचार किया जाए कि उन्हें ढेर सारी इज़्ज़्त और मान्यता देने के बावजूद हिंदू समाज ने उनकी बात पर आज तक अमल क्यों नहीं किया ?
जो हिंदू स्वामी विवेकानंद जी को ज्ञानी मानते हैं वे भी उनके सिद्धांतों का पालन नहीं करते, आख़िर क्यों ?
इसी लेख को मैंने एक और तरह से भी लिखा है। और वास्तव में शुरू में वही लिखा था लेकिन बीच में सिस्टम ठप्प हो गया और जब दोबारा लिखना शुरू किया तो फिर गूगल टाइप में नहीं लिखा। इस तरह आपके विचार व्यक्त करने के तरीक़े और उसकी क्रमबद्धता को यह बात भी प्रभावित करती है कि आप किस टूल का उपयोग कर रहे हैं ?
उस लेख को भी मैं आपके सामने लाऊंगा एक थोड़े से ब्रेक के बाद।
तब तब आप इस लेख का आनंद उठाईये और उस लेख में जो लिंक मैंने दिए हैं। तब तक आप एक नज़र उन पर भी डाल लीजिए।
ये रहे लिंक्स आपके लिए एक ज्ञान भेंट के रूप में। कृप्या स्वीकार करें और इन पर विचार भी करें।
1- http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/standard-scale-for-moral-values.html?showComment=1294670416731#c4645121125829265744

2- Hunger free India क्या भूखों की समस्या और उपासना पद्धतियों में कोई संबंध है ?- Anwer Jamal

3- 'जो ईश्वर मुझे यहाँ रोटी नहीं दे सकता, वो मुझे स्वर्ग में अनंत सुख कैसे दे सकेगा ?' 

4- पछुआ पवन (pachhua pawan)

5- 'क्‍या सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है  ?'
  
6-  http://satish-saxena.blogspot.com/2010/12/blog-post_04.html

7- कहाँ है मानवता ?

8- महंगाई मार गई...!!
अब आप अपने आप से सवाल कीजिए कि-
देश के अन्न में आग लगाना कौन सी समझदारी है ?
एक तो देश में घी का उत्पादन पहले ही कम है और जो है उसे भी देश के फ़ौजियों और बालकों को देने के बजाए आग में डाल दिया जाए। आपकी इन्हीं परंपराओं के कारण पहले भी हमारे देश की फ़ौजे कमज़ोर रहीं और थोड़े से विदेशी फ़ौजियों से हारीं हैं। कम से कम इतिहास की ग़लतियां अब तो न दोहराओ। इन ज्ञान की बातों को समझने की कोशिश ज़रूर करना।
 

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रविवार, जनवरी 09, 2011
जन्नत के बारे में ग़ालिब के ख़याल की हक़ीक़त Standard scale for moral values

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ग़ालिब का शेर
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन 
दिल के बहलाने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है
दिल्ली में आपका भाई अनवर जमाल
ग़ालिब के बुत के पास आपका भाई अनवर जमाल
ग़ालिब का यह शेर बहुत मशहूर हुआ और आज भी जब तब लोग इसे दोहराते रहते हैं। इस शेर को अमूमन आज जन्नत के इंकार के लिए वे लोग पेश करते हैं जो कि जन्नत को वहम मानते हैं और जन्नत के वुजूद में यक़ीन रखने वालों को एक ऐसा आदमी मानते हैं जिनका कि बौद्धिक विकास रूका हुआ है। हरेक आदमी को पूरी आज़ादी है कि वह संविधान के दायरे में रहते हुए जो भी मानना चाहे मान सकता है और अपने नज़रिये का प्रचार भी कर सकता है।

एक आम ग़लती
भाई अमरेंद्र कुमार त्रिपाठी जी ने भी एक बार फिर इस शेर को जब इन्हीं अर्थों में कहा तो मुझे लगा कि कुछ बात ग़ालिब की शायरी और उसके भाव कहना वक्त की ज़रूरत है।
भाई अमरेंद्र जी ! आप आस्ति-नास्तिक, संशयवादी या कुछ और जो भी आप होना चाहें, बेशक हो सकते हैं और अगर आप अपने नज़रिये को अपने शब्दों में कहेंगे तो फिर उसकी ज़िम्मेदारी भी केवल आपकी अपनी ही होगी। आप एक साहित्यकार हैं और आप जानते हैं कि किसी भी साहित्यकार के शब्दों से उसी के भाव को ग्रहण करना चाहिए। उसके शब्दों में अपने भाव को अध्यारोपित करना उस साहित्यकार के साथ ज़ुल्म होता है। आपने ऐसा ही कुछ उर्दू शायर ग़ालिब के साथ किया है। आप हिंदी के साहित्यकार हैं। अफ़सोस कि मैं अभी तक आपको पढ़ नहीं पाया हूं लेकिन आपकी पृष्ठभूमि बता रही है, आपके बारे में लोगों की गवाही बता रही है कि आप एक अच्छे साहित्यकार हैं। इसके बावजूद यह भी सच है कि आप उर्दू नहीं जानते। आप यह भी जानते हैं कि किसी साहित्यकार के साहित्य को ठीक से समझने के लिए मात्र भाषा का ज्ञान ही काफ़ी नहीं हुआ करता बल्कि उसके साथ दूसरी कई और भी चीज़ें दरकार होती हैं। जिनमें से एक यह भी है कि साहित्यकार की मनोदशा और उसके व्यक्तित्व को भी जाना समझा जाए, उसके जीवन के पहलुओं को भी सामने रखा जाए।

ग़ालिब की ज़िंदगी के कुछ पहलू
ग़ालिब का पूरा नाम असदुल्लाह था और उनका तख़ल्लुस पहले ‘असद‘ था बाद में ‘ग़ालिब‘ रखा। असदुल्लाह का अर्थ है अल्लाह का शेर और असद का अर्थ होता है शेर। उनका नाम उनके वालिदैन ने रखा था जिससे पता चलता है कि वे ईश्वर के वुजूद पर यक़ीन भी रखते थे और चाहते थे कि उनका बच्चा भी नेकी के रास्ते पर चले। मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा अपना तख़ल्लुस ‘असद‘ रखना भी यही बताता है कि वे भी ऐसा ही चाहते थे। बाद में किन्हीं कारणों से उन्होंने अपना तख़ल्लुस रखा ‘ग़ालिब‘। अरबी में ग़ालिब प्रभु परमेश्वर का ही एक सगुण नाम है। ‘ग़ालिब‘ का अर्थ है ‘प्रभुत्वशाली, सामर्थ्यवान‘।
पवित्र कुरआन में परमेश्वर की सामर्थ्य का परिचय देने के लिए यह शब्द बार-बार प्रयुक्त हुआ है।
ग़ालिब के वालिदैन इस्लामी मान्यताओं पर विश्वास रखने वाले दीनदार मुसलमान थे और ख़ुद उनकी बीवी भी एक निहायत शरीफ़ और दीनदार औरत थीं लेकिन ख़ुद ग़ालिब एक पक्के पियक्कड़ थे। इसके अलावा वे शतरंज, चैपड़ और जुआ भी खेलते थे। मिर्ज़ा जी का एक सितम पेशा डोमनी से इश्क़ भी उनके जीवन की एक ऐसी ही मशहूर घटना है जैसे कि आपके जीवन में दिव्या जी का आना और फिर चला जाना।

मिर्ज़ा ग़ालिब का नज़रिया अपने बारे में
मिर्ज़ा ग़ालिब इस इश्क़ से पहले काम के आदमी हुआ करते थे लेकिन इस कमबख्त इश्क़ ने उन्हें निकम्मा कर दिया था।
‘इश्क़ ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब
वर्ना आदमी हम भी थे काम के‘
कहकर उन्होंने ख़ुद बताया है कि इश्क़ ने उनके जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। ये सभी काम जन्नत में जाने से रूकावट हैं। इस बात को वे जानते थे कि जन्नत में दाख़िल होने के लिए अपने पैदा करने वाले रब का हुक्म मानना और गुनाह से बचना लाज़िमी है, महज़ जन्नत की ख्वाहिश करना या एक मुसलमान के घर पैदा हो जाना या दाढ़ी रखकर कुर्ता-पाजामा और टोपी पहनना या ख़तनाशुदा होना ही काफ़ी नहीं है। उनकी नज़र अपने आमाल पर थी जो कि ख़िलाफ़े इसलाम थे। अपने बुरे आमाल की वजह से वे ख़ुद को कमीना कहते थे।
मस्जिद के ज़ेरे साया इक घर बना लिया है
ये बन्दा ए कमीना हमसाया ए ख़ुदा है

इसलाम के प्रति ग़ालिब का विश्वास अटल था
इस शेर से यह भी पता चलता है कि उन्हें ख़ुदा के वुजूद पर भी यक़ीन था और उसकी पवित्रता और उसकी महानता का भी। इसीलिए वे हज के लिए काबा जाना तो चाहते थे लेकिन ख़ुदा से अपने आमाल पर शर्मिंदगी का अहसास उनके अंदर बहुत गहरा था। उनके एक शेर से यह देखा जा सकता है।
काबे किस मुंह से जाओगे ‘ग़ालिब‘
शर्म तुमको मगर नहीं आती
इसी तरह उनके बहुत से शेर हैं जिनसे ख़ुदा और इसलाम के प्रति उनके अटल विश्वास को जाना जा सकता है। उन सबके साथ ही ग़ालिब के इस बहुचर्चित शेर को जब रखकर देखा जाता है तभी उनकी हक़ीक़ी मुराद को समझा जा सकता है।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन 
दिल के बहलाने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है
इस शेर में ग़ालिब जन्नत के प्रति अपना शक प्रकट नहीं कर रहे हैं बल्कि वे ख़ुद को अयोग्य ठहरा रहे हैं और अपने जैसे लोगों को नसीहत भी दे रहे हैं कि ऐसे आमाल करने वाले लोगों की जन्नत में दाखि़ले  की चाहत महज़ एक ख़याल दिल बहलाने के लिए। ग़ालिब के समय में मुस्लिम समाज कई तरह के पतन का शिकार हो चुका था। ग़ालिब अपने जैसे शायर तो बेशक अकेले थे लेकिन अपनी आदतों और शौक़ में वे अकेले नहीं थे। शराब और शबाब का शौक़ उस समय रईसों और साहित्यकारों का आम चोंचला था जैसा कि आज भी है और जैसा कि उनसे पहले भी था। मूल्य और चरित्र को तबाह कर चुका आदमी और समाज न तो जीते जी कभी शांति पा सकता है और न ही मरने के बाद। हमारा समाज ग़ालिब के समय में भी बर्बाद था और आज भी बर्बाद है।

एक साहित्यकार का फ़र्ज़ क्या होता है ?
ग़ालिब ने अपने समाज को बर्बादी से निकालने और उसे सही रास्ते पर लाने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि अपने आप को भी वे सही रास्ते पर नहीं ला पाए जबकि वे जानते थे कि सही क्या है ?
न सिर्फ़ यह बल्कि वे एक ऐसा साहित्य छोड़कर गए जो आज भी लोगों को उनके जीवन के असली मक़सद से हटाकर शराब और शबाब की ओर आकर्षित कर रहा है।
आपने लिखा है कि ‘साहित्य की सामाजिक उपादेयता को समझकर ही साहित्योन्मुख हूं। स्मरण रहे  साहित्य समाज का दर्पण है और ‘हृदयहीनता की ओर बढ़ रहे कुटुंब का हृदय भी है। धर्म पर आपका अति विश्वास हो सकता है पर मैं ग़ालिब की बात ज़्यादा मुफ़ीद मानता हूं :
‘मुझको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है‘
आपने जो शेर लिखा है, वह दोषपूर्ण है, सही वह है जो मैंने ऊपर लिखा है। इस शेर से आपने भी दूसरों की तरह ग़लत अर्थ ले लिया है। सही भाव वह है जो मैं ऊपर लिख चुका हूं।
यह सही है कि साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन इसकी उपादेयता मात्र यही नहीं है। समाज के मार्गदर्शन में साहित्य की एक अहम भूमिका होती है। साहित्य समाज का दर्पण भी होता है और उसे दिशा भी देता है। ऐसा आप भी मानते होंगे।

विचार वस्तु मात्र हैं
साहित्य में विचार होते हैं। विचार भी एक वस्तु है। दूसरी चीज़ों की तरह विचार भी वही सार्थक होता है जो कि उपयोगी हो। कुछ विचार अनुपयोगी भी होते हैं और कुछ विचार घातक होते हैं। अनुपयोगी विचार आदमी की समय और ऊर्जा को नष्ट करते हैं अतः वे भी नुक्सान ही देते हैं। इस तरह उपयोग की दृष्टि से हम विचार को तीन प्रकार में बांट सकते हैं-
1. लाभकारी
2. व्यर्थ
3. घातक
हमारे साहित्य में ये तीनों ही तरह के विचार आपस में मिश्रित हैं और किसी हिंदी साहित्यकार के पास आज तक कोई पैमाना ऐसा न हुआ जिसके ज़रिये यह जानना मुमकिन होता कि कौन सा विचार लाभकारी है और कौन सा घातक ?

साहित्य का प्रभाव समाज पर
कोई भी साहित्य मात्र इस कारण तो लाभकारी नहीं माना जा सकता कि वह साहित्य है, बल्कि साहित्य का आकलन समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव से किया जाता है। लोगों के मन और चरित्र पर वह क्या प्रभाव छोड़ता है ?, उन्हें क्या करने की प्रेरणा देता है ?, उसके प्रभाव में आकर लोग क्या करते हैं ?
इन बातों की बुनियाद पर साहित्य को अच्छा या बुरा कहा जाता है। यदि कोई साहित्य शिल्प की दृष्टि से  परफ़ैक्ट है लेकिन उसके प्रभाव में आकर लोग नशे की लत अपना रहे हैं तो उसे अच्छा साहित्य नहीं कहा जा सकता। ग़ालिब के साहित्य पर भी यही बात लागू होती है और आपकी रचनायें मैंने पढ़ी नहीं हैं लेकिन आपकी बात से लगता है कि आप ईश्वर और धर्म को नैतिकता का स्रोत नहीं मानते और न ही इंसान के लिए उनमें विश्वास करना आप इंसान की प्राथमिक आवश्यकता ही मानते हैं।

भूलो मत मूल को
अगर आप अच्छे और बुरे का फ़र्क़ बताने वाले परमेश्वर को ही नज़रअंदाज़ कर देंगे तो फिर आप अपने साहित्य में भी नैतिकता और अच्छाई को क़ायम नहीं रख पाएंगे। ऐसा साहित्य समाज का दर्पण तो अवश्य हो सकता है लेकिन समाज के हितकर हरगिज़ नहीं हो सकता। ऐसे साहित्य का सृजन न केवल आपके जीवन और समय को नष्ट करेगा बल्कि आपके बाद वह हर उस आदमी का समय और चरित्र नष्ट करता रहेगा जो कि उसे पढ़ेगा।

कौन जानता है किसी चीज़ के आख़िरी अंजाम को  ?
आप हरगिज़ ऐसा काम नहीं करना चाहेंगे कि जिसकी अंतिम परिणति आपके लिए और समाज के लिए घातक हो। लेकिन आप कैसे जान सकते हैं कि किस विचार और कर्म की अंतिम परिणति क्या होगी ?
क्योंकि चीज़ें मात्र अपने सामयिक प्रभाव के ऐतबार से ही नहीं देखी जातीं बल्कि वे अपने आख़िरी अंजाम के ऐतबार से भी देखी जाती हैं। कई बार एक बुरा आदमी शुरू में अच्छा लगता है लेकिन बाद में सारी इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाकर रख देता है जैसा कि आपके साथ हुआ। कई बार ऐसा होता है कि आदमी शुरूआती नज़रिये के ऐतबार से किसी को ग़लत समझता है लेकिन बाद में उससे नफ़ा पहुंचता है जैसा कि आपको मुझसे पहुंचा। यह तो समझाने के लिए सामने की मिसाल के तौर पर है वर्ना इससे अच्छी मिसालें मौजूद हैं। यानि कुल मिलाकर इंसान का इल्म इतना कम और कमज़ोर है कि वह नहीं जानता कि जो चीज़ अपने पहले परिचय में भली लग रही है उसका अंजाम क्या होगा ?

हरेक मनभावन चीज़ हितकर नहीं होती
किसी भी चीज़ का मन को भा जाना हरगिज़ यह साबित नहीं करता कि वह लाभकारी भी है और न ही किसी चीज़ से विरक्ति का भाव मन में पाया जाना उसे निरर्थक साबित करने के लिए पर्याप्त है। मन और भावनाएं किसी विचार और वस्तु के नफ़े-नुक्सान को परखने के लिए सिरे से ही कोई कसौटी नहीं हैं, जिन पर कि एक साहित्यकार का सारा दारोमदार होता है।
तब नफ़े-नुक्सान को तय करने का असली पैमाना क्या है ?
जब आप उस पैमाने को दरयाफ़्त कर लेंगे तभी आप लाभकारी साहित्य सृजित करने की क्षमता से लैस हो पाएंगे।
क्या आप बता सकते हैं कि व्यक्ति और समाज के लिए सही-ग़लत और नफ़े-नुक्सान को निर्धारित करने का वास्तिक आधार क्या है ?
और उस तक एक साहित्यकार की हैसियत से आप कैसे पहुंचेगे ?
या आप सिरे से ऐसी कोई कोशिश ही ज़रूरी नहीं समझते ?

संवाद से सत्य की प्राप्ति अभीष्ट है
आप सार्थक साहित्य का सृजन कर सकें इसी कामना से यह संवाद आपके लिए क्रिएट किया गया है।
जो ग़लती ग़ालिब कर चुके हैं उसे दोहराना नहीं है बल्कि उसे सुधारना है। अपने और मानव जाति के बेहतर भविष्य के लिए सही-ग़लत के सही पैमाने का निर्धारण बहुत ज़रूरी है।
पहले भारत में लोग हाथ से या लाठी से नापते थे लेकिन आज नापने का स्टैंडर्ड पैमाना मीटर स्वीकार कर लिया गया है और कोई भी राष्ट्रवादी इस पर आपत्ति नहीं करता कि मीटर तो अंग्रेजों की देन है। जब अंग्रेज़ चले गए तो उनका दिया हुआ मीटर यहां क्या कर रहा है ? ,निकालो उनका मीटर देश से बाहर।

सही-ग़लत का मीटर हमसे लो या फिर हमें दो
अंग्रेज़ों का मीटर, थर्मामीटर और बैरोमीटर ग़र्ज़ यह कि उनके सारे मीटर देशवासी आज भी लिए घूम रहे हैं। जो मीटर उनके पास था वह उन्होंने दे दिया और आपने ले भी लिया लेकिन सही-ग़लत का मीटर उनके भी पास नहीं था और न ही आपके पास है। इसीलिए हिंदू भाई सही-ग़लत तो क्या बताएंगे बल्कि सारे मिलकर भी सही-ग़लत की परिभाषा तक नहीं बता सकते।
ऐसा मैं उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं कह रहा हूं बल्कि एक हक़ीक़त का इज़्हार कर रहा हूं।
जिसे मेरी बात पर ऐतराज़ हो वह मेरे सवाल का सवाल का जवाब देकर दिखाए।
अगर अंग्रेजों के भौतिक मीटर आप ले सकते हैं तो फिर मुसलमानों आप सही-ग़लत नापने का मीटर क्यों नहीं ले सकते ?
अगर आपके पास पहले से ही मौजूद है तो फिर उसे सामने लाईये और हमें भी दीजिए।
आपका मीटर अच्छा हुआ तो हम भी उससे काम लेंगे।

‘वसुधैव कुटुंबकम्‘
: परिवार एक है तो उसका मीटर भी एक हो
अब सारी दुनिया में चीज़ों को नापने और जांचने के मीटर एक हो चुके हैं और विचार भी वस्तु होते हैं लिहाज़ा विचारों को नापने और जांचने के लिए भी कम से कम एक मीटर तो होना ही चाहिए और अगर समाज में बहुत से मीटर प्रचलित हों तो उनमें से जो बेहतर हो उसे सारे विश्व समाज के लिए स्टैंडर्ड मान लिया जाना चाहिए।
भौतिक क्षेत्र में ऐसा हो चुका है। अब सूक्ष्म भाव जगत में भी इस प्रयोग को आज़माने का वक्त आ चुका है। मेरा मिशन यही है। मानव जाति का एकत्व ही मेरा लक्ष्य है। कोई भी बंटवारा मुझे हरगिज़ मंज़ूर नहीं है, आपको भी नहीं होना चाहिए।
 नोट - भाई अमरेंद्र से इस संवाद की पूरी पृष्ठभूमि जानने के लिए देखें उनकी टिप्पणी डा. दिव्या जी के संबंध में।
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शनिवार, जनवरी 08, 2011
फ़ितरत  The nature

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अल्लामा इक़बाल ने  कहा है कि

अमल से बनती है जन्नत भी जहन्नम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
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गुरुवार, जनवरी 06, 2011
अलंकारों को उसी रूप में न समझा जाए जो कि वक्ता का अभिप्राय है , तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

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दिव्या कथन विश्लेषण 2011
गतांक से आगे ...
आदरणीया बहन दिव्या जी (डा. दिव्या जी) ,
आपको ऐतराज़ है कि मैंने आपकी तुलना देशभक्तों से क्यों नहीं की ?

आपकी तुलना देशभक्तों से करने का क्या तुक है ?
देश के लिए जान देने आप कहां गईं हैं बताइये ?
आपने देश के शिक्षण तंत्र का लाभ उठाकर पहले तो योग्यता अर्जित की और जब सेवाएं देने का नंबर आया तो आप विदेश जा बैठीं। ख़र्च किया देश ने और सेवाएं दे रही हैं आप विदेश में ?
क्या इसी का नाम है देशभक्ति ?
जो नारी अपनी सेवाएं तक देश के लोगों को न दे सके और विदेश जा पहुंचे तो उसे तो कृतघ्न न माना जाए इतना ही पर्याप्त है। आपको देशभक्तों की श्रेणी में रखेंगे वे लोग जो कि खुद देशभक्त नहीं हैं और आपके चापलूस हैं।
मैं न आपका चापलूस हूं और न ही आपका विरोधी। जो गुण आपमें है ही नहीं, उसे मैं आपके लिए नहीं स्वीकारता और जो गुण आपमें है, उसे मैं ऐलानिया मानता हूं।
आपने कहा है कि ‘जिसकी आंख में कीचड़ नहीं होता उसे हरेक औरत मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी ही दिखाई देती है।‘
आपने सच कहा है। मैं आपसे सहमत हूं। मुझे हरेक औरत मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी ही दिखाई देती है इसीलिए मैंने आपको ऐसा समझा और कहा भी। मेरा कहना साबित करता है कि मेरी आंख में कीचड़ नहीं है लेकिन आपके दिमाग़ में जरूर कुछ है कि जिस बात से आप मेरी पाक दिली का अहसास करतीं, उसे आप बचकानापन बता रहीं हैं।
अगर आपको ‘मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी‘ बताना ग़लत है तो फिर आप खुद क्यों ब्लाग जगत से पूछती हैं कि क्या उनके पास श्री कृष्ण जैसा मित्र है ?
जहां आपने यह सवाल पूछा था वहीं मैंने आपको ‘गार्गी की तरह विदुषी बताते हुए कहा था कि हां मेरे पास श्री कृष्ण जैसा सारथि और सखा है।
तब तो आपने ख़ुद को ‘गार्गी‘ बताए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की थी तो फिर आज क्यों ?
आप खुद कह रही हैं कि आपको मेनका कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन
आपका मानना है कि आप मेनका जितनी सुंदर नहीं है।
मैं मान लेता हूं लेकिन क्या आप सुंदर नहीं हैं ?
 अगर आप सुंदर हैं तो उपमा हमेशा उस चीज़ से दी जाती है जो कि उससे बड़ी हुआ करती है।
मां-बाप और गुरू की उपमा तो ईश्वर से दी जाती है हिंदू साहित्य में। क्या मां-बाप और गुरू वास्तव में ही ईश्वर होते हैं ?
अलंकारों को उसी रूप में न समझा जाए जो कि वक्ता का अभिप्राय है , तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लिहाज़ा आप अपनी सोच को दुरूस्त करें। मेरा कहा हुआ ठीक है।
मैं वही कहता हूं जो कि मैं मानता हूं। आप कहती हैं कि आप ‘गार्गी की तरह विदुषी‘ नहीं हैं। आप झूठ बोलती हैं।
गार्गी में ऐसा क्या ख़ास था जो कि आपमें नहीं है ?
आदि शंकराचार्य एक सन्यासी थे। उन्होंने गार्गी के पति को शास्त्रार्थ में हरा दिया, तब गार्गी ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया और उसने शंकराचार्य को घेर कर उस क्षेत्र में ले गई जिसका कोई अनुभव शंकराचार्य जी को न था। ‘काम अर्थात सैक्स‘ के बारे में एक ब्रह्मचारी को कोई अनुभव नहीं होता लिहाज़ा शंकराचार्य को उसके सामने चुप होना पड़ा। बस यही ख़ास था गार्गी में, बाक़ी विद्वान पति के संग रहने से दर्शन साहित्य की समझ उसमें थी और यह आज भी ऐसे पतियों की पत्नियों आ जाती है।

गार्गी एक गृहस्थ महिला थी, इसलिए काम विद्या में निपुण थी। आप भी एक विवाहित महिला हैं। ऐसी कौन सी बात है जो कि सैक्स के संबंध में गार्गी को तो पता थी लेकिन आप उससे अन्जान हैं ?
मैंने आपको गार्गी की तरह विदुषी कहा है तो ठीक ही कहा है।
अब मैं कहता हूं कि गार्गी का ज्ञान आपके सामने कम था।
सैक्स के बारे में गार्गी का ज्ञान केवल उसके व्यवहारिक पक्ष तक सीमित था जबकि आप उसके बायोलोजिकल पक्ष को भी जानती हैं और इतना अच्छा जानती हैं कि गार्गी के समय में कोई वैद्य भी इतना न जानता था जितना कि एक डाक्टर होने के कारण आप जानती हैं। तब भला बेचारी गार्गी तो क्या जानती ?
 http://ahsaskiparten.blogspot.com/2010/12/patriot.html?showComment=1294240880477
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नवगीत गोल क्यों? नवगीत घोंसले में नवगीत छोडो हाहाकार मियाँ! नवगीत जगो सूर्य आता है नवगीत त्रिपदिक नवगीत दर्पण का दिल नवगीत दिवाली नवगीत नव वर्ष नवगीत नागफनी उग आयी नवगीत निर्माणों के गीत नवगीत पहले गुना नवगीत भटक न जाए नवगीत भीड़ में नवगीत मिली दिहाडी नवगीत में नए रुझान नवगीत राम बचाए नवगीत रार ठानते नवगीत लोकतंत्र का पंछी नवगीत वह खासों में खास है नवगीत शिव नवगीत संक्रांति काल है नवगीत संग्रह नवगीत सत्याग्रह के नाम पर नवगीत समय वृक्ष नवगीत समीक्षा नवगीत सड़क पर नवगीत सड़क पर... नवगीत: उगना नित नवगीत: उड़ चल हंसा नवगीत: दीन प्रदर्शन नवगीत: नाम बड़े हैं नवगीत: भाग्य कुंडली नवगीत: लोकतंत्र का पंछी बेबस नवगीत: कुण्डी खटकी नवगीत: छोडो हाहाकार मियाँ! नवगीत: बजा बाँसुरी नवगीत: भारत आ रै नवगीत: रब की मर्ज़ी नवभारत टाईम्स नशा नाक की सर्जरी नाग नाभिक ऊर्जा नारि नारी मुक्ति नारी-भाव नाश प्रकृति का निर्निमेष निर्विकार निष्काम कर्म निष्ठुरता नीति व्यवहार नीति-नियम नीति-व्यवहार नीलकंठ नेकियां नेह नर्मदा तीर पर नेह-नाता नैतिकता नैन-डोर नैना नौ कन्या न्यू-ईयर गिफ्ट नज़र नज़ारा पंचौदन अजः पद चिन्ह पद-चिन्ह पद्मिनी परब्रह्म परम-पिता परमाणु परमानंद परमार्थ परलोक परहित पराग पराया-धन पल- छिन पशु पहलू पाँच पर्व पायल पिचकारी पीयूषवर्ष छंद पीर पुरुषार्थ पुरोवाक : यह बगुला मन पुरोवाक ओस की बूँद पुरोवाक केरल एक झाँकी पुरोवाक बुधिया लेता टोह पुरोवाक् पुलिस पूजा पूर्ण-ब्रह्म पूर्णकाम पृथ्वी पैरोडी पोखर ठोके दावा प्यार प्रकृति प्रकृति दोहन प्रकृति बादल प्रजापति प्रणम्य शहीद प्रणय प्रणय -दीप प्रणय के पल प्रतिकण प्रतियोगिता प्रत्रकार प्रदूषण प्रभाव प्रभु प्रभु ज्ञान प्रश्न मन के प्राण शर्मा प्रातस्मरण स्तोत्र प्रिय प्रवास प्रीति के रंग प्रीति-चलन प्रेम के छःलक्षण प्रेम प्याला प्रेम ममता फरवरी कब क्या? फागुन बंगलोर . कर्णाटक बंगालूरू बंधन व मुक्ति नारी बगीचा बच्चे बजरंग बली बद्दुआ बन्गलूरू बबिता चौबे बयान बरसाना बरसानौ बलि बसंत पंचमी बसंत मुक्तक बसंतोत्सव/मदनोत्सव बहादुरी बहु बहुरंगी संस्कृति बांगला बाढ़ ने बिगाड़ा पशुपालन कारोबार बात बापू बाबा अम्बेडकर साहब बाबा संस्कृति बारह-सोलह वर्णिक छंद बाल कविता बाल कविता : तुहिना-दादी बाल कविता अंशू-मिंशू और भालू बाल कविता कौआ स्नान बाल गीत : ज़िंदगी के मानी बाल गीत पाई शाल बाल नवगीत सूरज बबुआ! बासंती दोहा ग़ज़ल बिग-बेंग बिगबेंग बिरसा मुंडा बुंदेली नवगीत बूढ़ा बरगद कथा-गीत बेटियाँ बेदिल बेनज़ाइटन ब्रह्म ब्रह्मजीत गौतम ब्रह्मा ब्रह्माण्ड ब्रिषभानु ब्लागिंग ब्लॉगरों का सम्मान ब्लोग नगरी ब्लोगोत्सव- २०१० भगवती प्रसाद देवपुरा भगवा रंग भवन निर्माण भविष्य भारत आरती भारत की रमणियाँ भारत जय हिन्द भारत भूमि भारत माता भारत रत्न भारतीय मुद्रा पर गाँधी भाव सप्रेषण भाषा भाषा सेतु भाषाविज्ञान भूख भेदाभेद परे भ्रष्टाचार मंजिल मंदिर मस्जिद मटुकी मतदाता मत्तगयंद सवैया मथानी मथुरा मदरसे मधु कल्पना मधुपुरी मधुर मधुर निनाद मन का निर्मलेी मन विहग मन-मीत मनाना मनुहार मनोरंजन मनोरजंन मन्त्र पल मर्दों में यौन कुंठा मर्यादा मलेशिया मस्ज़िद-मन्दिर महक महात्मा गाँधी पर मार्टिन लूथर किंग महादेवी महान देश महिला सेवा समिति महेश महफ़िल माखन माघ माता मात्रा गणना माधुरी गुप्ता मानव -कृत्य मानव के विस्तार मानव जातीय छंद मानो या न मानो माहिया किसान माहिया गीत माहिया दिवाली माहेश्वरी-प्रजा मिट गये मिथिलेश मिथिलेश दुबे मिथिलेश दुब मिथिलेश दुबे लेख महिंला मिलन मिस्र में विद्रोह मीरा मुकतक मुक्तक कार्यशाला मुक्तक छंद सलिला मुक्तक बसंत मुक्तक भूगोलीय मुक्तक में गणित मुक्तक हाइकु मुक्तिका मन से डरिए मुक्तिका हे माधव ! मुक्तिका किस्सा नहीं हूँ मुक्तिका बसंत मुक्तिका मन मुक्तिका यमक मुक्तिका राजस्थानी मुक्तिका रात मुक्तिका व्यंग्य मुक्तिका: न होता मुजाहिद मुन्ना भाई मुरारीलाल खरे मुलाक़ात मुस्कराहट मुहब्बत ए इलाही मुहब्बतनामा मूल मूलभूत सुविधाएं मूल्यांकन मेघ मेरा देश मेरे भैया मेरे मन मेले मैं -तू मैं करता तब मैथुनी-भाव मॉल संस्कृति मोक्ष मोमिन मोर मुकुट मोहन शशि मौसम मौसम अंगार है यकीं यक्ष प्रश्न यक्ष प्रश्न २ यक्ष प्रश्न ३ - जात और जाति यक्ष-प्रश्न यम-यमी यमकमयी मुक्तिका यश मालवीय यशवंत याद में तेरी जाग-जाग के युवा दिवस युवा प्रतिभा सम्मान युवावर्ग यूपीखबर 'DR. ANWER JAMAL' योग भ्रष्ट रंग रस रचना-प्रतिरचना रत्न रपट रमज़ान रवींद्र प्रभात रवींद्रनाथ ठाकुर रवीन्द्र प्रभात रस दोहा रस-राज रागिनी राघवयादवीयम् राजस्थानी मुक्तिका राजेंद्र प्रसाद राणा प्रताप राधा-कान्हा राम राम भक्त राम सेंगर राष्ट्र गान राष्ट्र-प्रेम राष्ट्र-भाषा रिपोर्ट रूह रेलगाड़ी का इतिहास रोजगार रोला रोशन सिंह लक्ष्मी लखनऊ के ब्लॉगर लखनऊ ब्लोगर एसोसिएशन पर विवादित पोस्टों का वहिष्कार होगा--------मिथिलेश लघु नाटिका लघु व्यंग्य विकास लघुकथा लघुकथा एकलव्य लघुकथा लक्ष्यवेध लघुकथा खाँसी लघुकथा समानाधिकार लघुकथा - कब्रस्तान लघुकथा : खिलौने लघुकथा करनी-भरनी लघुकथा खिलौने लघुकथा गुरु जी लघुकथा छाया लघुकथा निर्दोष लघुकथा मुस्कुराहट लघुकथा: निपूती भली थी लज्जा ललिता लहर लाइब्रेरी लाल किला दिल्ली लालू लावणी लास लीला लेख विश्वास का संकट लेख : भाषा और लिपि लेख इलाहाबाद और छायावाद लेख दोहा लेख फागें लेख भाषा लोकसभा वतन वन नीति में बदलाव की जरूरत वन्दे मातरं वन्दे मातरम वरदान वर्णिक छंद बारह-सोलह वर्तमान वह कल वाक्-आउट वादाये वफ़ा वायु वार्तालाप वासव जातीय छंद वासवी-निषंग वास्तव जातीय छंद वास्तु सूत्र विकास विकृति विखंडन-संयोजन विचार सलिला विचित्र किन्तु सत्य विजाति छंद वितान विद्वान् विधाता छंद विधिना विधु बदनी विमर्श नवगीत में पंक्ति विभाजन विमर्श हिंदी- समस्या और समाधान विमर्श - कविता क्या विमर्श : जौहर विमर्श : शब्द और अर्थ विमर्श गाँधी विमर्श- श्रवण कुमार विरज़ विरासत विलोम काव्य विलोम पद विवेकानंद विश्लेषण विष्णु विष्णु का चक्र विहान वीर वीर जवान वीर-प्रसू वीराना वीरों के गीत वेंकटाध्वरि वैदिक ज्ञान व्यंग्य कविता व्यंग्य मुक्तिका व्यक्त वफ़ादारी शंकर शंकर छंद शक्ति शब्द चित्र शब्द सलिला शराबी ब्लॉगर्स शशि शशि पुरवार शास्त्र शिकायत शिक्षक दिवस शिक्षक-दिवस. शिक्षक-स्नातक निर्वाचन शिक्षा शिरीष शिव दोहावली शिव नवगीत शिव हाइकु शिवम् मिश्रा शिशु गीत शील शुद्धतावादी शुभकामना सन्देश शूरवीर शेयर शेर शेष-ब्रह्म शौर्य के स्वर श्याम श्याम लाल उपाध्याय श्याम सवैया श्यामली सखी श्यामा श्यामान्गिनी श्रध्दांजलि श्री कान्त श्रीकृष्ण और जीवन मूल्य श्रुति कुशवाहा श्रुति-सम्मत श्रृंगार श्रृद्धा श्रेय-प्रेय श्रेष्ठता षटपदी षड्यंत्र संकट हरण संक्रांति संक्षिप्तता संत साहित्य संतान संतोष भारतीय संदेह संध्या सिंह संरक्षण संस्कार संस्मरण सखि सखी सत्कर्म सद-नासद सदस्य बनिए सदा सदाधार सद्दाम का इराक सन्त कंवर राम सन्त साहित्य परम्परा सन्देश सपना सप्त मात्रिक छंद सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट सबरीमाला समता समलैंगिकता समस्या समाचारपत्र कतरन समाधिया समानार्थी शब्द समीक्षा 'गज़ल रदीफ़ समीक्षा - कशमकश समीक्षा अंजुरी भर धूप समीक्षा अप्प दीपो भव कुमार रवीन्द्र समीक्षा एक बहर पर एक ग़ज़ल समीक्षा कहानी समीक्षा चुप्पियों को तोड़ते हैं समीक्षा डॉ. रमेश खरे समीक्षा राजस्थानी साहित्य में रामभक्ति-काव्य समीक्षा ग़ज़ल व्याकरण सम्मान प्राप्त सर सरस्वती चन्दौसी सरस्वती जैन पंथ सर्दी सर्वत एम० सर्वश्री रविन्द्र प्रभात सलिल सलिल की रचनाएँ सलिल २० जून सलीम अख्तर सिद्दीकी सलीम अख्तर सिद्दीक़ी सलीम भाई सलीम भाई और अनव भाई सवैया गंगोदक सवैया सुमुखी सहारनपुर सांझ सांवरी सांस्कृतिक समारोह साक्षात्कार : सलिल - मनोरमा जैन पाखी सागर साड़ी साध्वी सामयिक कविता मचा महाभारत भारत में सामुदायिक ब्लॉग साया सार सार्थकता सावरकर दोहा साहित्य साहित्यकार दिवस साहित्यिक कविताएँ सिंगापुर सिद्धि सिद्धि-प्रसिद्धि सिनेमा सीता सुख सुख-दुःख सुख-शान्ति सुखन सुगति छंद सुधार सुनीता सिंह सुभाष चन्द्र बोस सुभाषचंद्र बोस सुमित्र दोहा संकलन सुमुखी सवैया सुरेश कुमार पंडा सुरेश तन्मय सुहाने रितु सूरज तसलीस सेवा समितियां सेवानिवृत्ति सौर-ऊर्जा स्तवन शरणागत हम स्थित-प्रज्ञ स्थिति-प्रग्य स्नेह और सहयोग स्पर्श स्पेसिंग स्फुरणा स्मरण स्वतंत्रता दिवस पर लेख प्रतियोगिता स्वतन्त्रता प्रश्न स्वामी स्वार्थ सड़क हरबिंदर सिंह गिल हरसिंगार हरियाणवी हाइकु हरियाली हरीश सिंह हस्तिनापुर की बिथा कथा हस्तिनापुर की बिथा-कथा हाइकु गीत हिंदी हाइकु दिवाली हाइकु मुक्तक हाइकु शिव हाइकु सलिला:संजीव हाइकु हरियाणवी हाइगा हाइड्रोजन हारि हास्य कविता हास्य कविताएँ हास्य मुक्तिका हास्य रचना मेला हिंदी हिंदी : चुनौतियाँ और संभावनाएँ हिंदी दोहा हिंदी वंदना हिंदी वैभव हिंदी हाइकु गीत हिंदी ग़ज़ल हिंदुस्तान हिंदुस्तान की आवाज़ हिन्दी गुलामी का शिकार हिन्दी सेवा समितियां हिन्दू-मुस्लिम एकता हिन्‍दुस्‍तान हिमवान हिमालय हिरण सुगंधों के हिरण्यगर्भ हीलियम हुमायूँ का मकबरा हुश्ने मतला हे माधव हेमा अंजुली हेमांड होठों की छुअन होली का आमंत्रण LBA परिवार को. होस्टल ग़ज़ल दोहा ज़िंदगी ज़िन्दाकौम फ़ितरत ​​लघुकथा- कतार ‘बिहारी‘ ‘ब्लॉग की ख़बरें‘

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ब्लॉगर्स बन्धुवों !
आप सभी को हर्ष और बधाई के साथ यह सूचना देना चाहता हूँ कि LBA अपनी सफलता के उस मुक़ाम तक आ चुका है कि इसकी सदस्यता संख्या अपने चरण तक पहुँच चुकी है और जो ब्लॉगर्स बन्धु इससे जुड़ने की इच्छा रख रहे हैं और जिनके मेल मुझे मिल रहे हैं उसको मद्देनज़र रखते हुए नयी सदस्यता के इच्छुक ब्लॉगर्स को एक और भी शक्तिशाली और नया मंच का गठन आज किया जा रहा है जिसका नाम है 'ऑल इंडिया ब्लॉगर्स असोसिएशन' अर्थात AIBA ! इस मंच का हिस्सा सभी भारतीय बन सकते है, फ़िर चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहें हों !!!
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