चुनाव का तमाशा : लोकतंत्र की हताशा !
क्या चुनाव की घोषणा एक अघोषित युद्ध सा मंजर नहीं बना दता है और यह युद्ध उस सीमा के युद्ध से अधिक भयावह होता है. उस युद्ध में तो सारे देश के करोड़ों लोग अपने देश और जवानों की सलामती के लिए दुआ माँगते रहते हैं और वे देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं लेकिन ये युद्ध किस श्रेणी में रखा जाय?
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव एक युद्ध घोषणा ही तो है , गृह युद्ध की तरह चुनाव में सम्बद्ध लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन रहे हैं और हमारी पुलिस मूक दर्शक बनी तमाशा देखती रहती है. लहूलुहान आम आदमी इसमें पिस रहा है. अख़बार की तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि पुलिस आम लोगों पर हो रहे वारों को देख कर भी अपनी लाठी टेके तमाशा देख रही थी. बड़े चुनावों की बात क्यों करें? यह तो सबसे छोटी इकाई का चुनाव है . जब यहाँ काबिज होने के लिए प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है तो फिर बड़े चुनाव के लिए क्या करेंगे? यहाँ तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत ही सही है उसको ही चुन लीजिये जिसके साथ सबसे अधिक चमचे और दबंग हों. बाकी तो सिर उठाने कि हिम्मत ही नहीं करेंगे.
यहाँ चुनाव आयोग की कोई आचार संहिता काम नहीं करती है. बड़े से लेकर छोटे पदों पर खुद ही काबिज होने की हसरत ने आदमी को हैवान बना दिया है और वोट देने वाले लाल लाल तरेरी हुई आँखों और लाठियों के हुजूम से डरे हुए आँख बंद करके वही मत देकर चले आते हैं क्योंकि उन्हें फिर इसी गाँव में ही रहना है. फिर क्या मतलब रह जाता है लोकतंत्र का? यह तो राजतन्त्र से भी गया गुजरा है. यहाँ तो किसी नाम पर सरकार बनती है और शासन दबंग करते हैं चाहे वे हों कुछ भी नहीं. पुलिस उनकी जी हुजूरी में लगी रहती है, पता नहीं कब किसको कहाँ टपका दें? उनके कहने पर पुलिस शरीफ को भी अपराधी साबित कर सकती है, अफीम , गांजा और चरस बरामद भी कर सकती है. फिर ये कैसा लोकतंत्र? कैसी है इसकी आचार संहिता?
अब परिवर्तन की जरूरत है - नामांकन में शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर सिर्फ और सिर्फ प्रत्याशी ही आये. शक्ति प्रदर्शन कि जरूरत नहीं होती है. अगर चुनावी हिंसा में प्रत्याशी की हत्या हो जाती है तो विपक्षी के चुनाव लड़ने पर अंकुश लग जाना चाहिए कि वह फिर कभी चुनाव नहीं लड़ सकता है. वैसे तो वे हत्या के और भी तरीके खोज लेते हैं मसलन किसी से दुर्घटना का रूप देकर मरवा देना लेकिन अगर प्रत्याशी की किसी भी रूप में आकस्मिक मृत्यु होती है तो उसके लिए कड़े कदम उठाये जाने चाहिए.
वोटिंग मशीन में हो रही छेड़छाड़ के लिए कौन जिम्मेदार है? इस कार्य ने चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं. अतः ऑनलाइन मतदान की व्यवस्था होना चाहिए. वैसे इस दिशा में हमारा कोई राज्य पहल कर भी चुका है. इससे मतदान के गिरते हुए प्रतिशत में सुधार होगा और मतदान में वे लोग भी रूचि लेंगे जो कि मतदान केंद्र तक जाने की जहमत नहीं उठा पाते हैं या फिर बहुत व्यस्त हैं या फिर कहीं और तैनात हैं. परिचय पत्र की त्रुटियों में सुधार भी जरूरी हो जाता है और उनका दुरूपयोग भी नहीं हो पायेगा. अभी तो अगर वोटर लिस्ट में कुछ वोट नहीं पड़े हैं तो उनके स्थान पर फर्जी वोट भी डलवा दिए जाते हैं . ऑनलाइन व्यवस्था में इस बात कि सम्भावना कम हो जाती है. आज नहीं तो कल इस व्यवस्था से हम लाभान्वित होंगे जरूर.
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उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव एक युद्ध घोषणा ही तो है , गृह युद्ध की तरह चुनाव में सम्बद्ध लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन रहे हैं और हमारी पुलिस मूक दर्शक बनी तमाशा देखती रहती है. लहूलुहान आम आदमी इसमें पिस रहा है. अख़बार की तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि पुलिस आम लोगों पर हो रहे वारों को देख कर भी अपनी लाठी टेके तमाशा देख रही थी. बड़े चुनावों की बात क्यों करें? यह तो सबसे छोटी इकाई का चुनाव है . जब यहाँ काबिज होने के लिए प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है तो फिर बड़े चुनाव के लिए क्या करेंगे? यहाँ तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत ही सही है उसको ही चुन लीजिये जिसके साथ सबसे अधिक चमचे और दबंग हों. बाकी तो सिर उठाने कि हिम्मत ही नहीं करेंगे.
यहाँ चुनाव आयोग की कोई आचार संहिता काम नहीं करती है. बड़े से लेकर छोटे पदों पर खुद ही काबिज होने की हसरत ने आदमी को हैवान बना दिया है और वोट देने वाले लाल लाल तरेरी हुई आँखों और लाठियों के हुजूम से डरे हुए आँख बंद करके वही मत देकर चले आते हैं क्योंकि उन्हें फिर इसी गाँव में ही रहना है. फिर क्या मतलब रह जाता है लोकतंत्र का? यह तो राजतन्त्र से भी गया गुजरा है. यहाँ तो किसी नाम पर सरकार बनती है और शासन दबंग करते हैं चाहे वे हों कुछ भी नहीं. पुलिस उनकी जी हुजूरी में लगी रहती है, पता नहीं कब किसको कहाँ टपका दें? उनके कहने पर पुलिस शरीफ को भी अपराधी साबित कर सकती है, अफीम , गांजा और चरस बरामद भी कर सकती है. फिर ये कैसा लोकतंत्र? कैसी है इसकी आचार संहिता?
अब परिवर्तन की जरूरत है - नामांकन में शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर सिर्फ और सिर्फ प्रत्याशी ही आये. शक्ति प्रदर्शन कि जरूरत नहीं होती है. अगर चुनावी हिंसा में प्रत्याशी की हत्या हो जाती है तो विपक्षी के चुनाव लड़ने पर अंकुश लग जाना चाहिए कि वह फिर कभी चुनाव नहीं लड़ सकता है. वैसे तो वे हत्या के और भी तरीके खोज लेते हैं मसलन किसी से दुर्घटना का रूप देकर मरवा देना लेकिन अगर प्रत्याशी की किसी भी रूप में आकस्मिक मृत्यु होती है तो उसके लिए कड़े कदम उठाये जाने चाहिए.
वोटिंग मशीन में हो रही छेड़छाड़ के लिए कौन जिम्मेदार है? इस कार्य ने चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं. अतः ऑनलाइन मतदान की व्यवस्था होना चाहिए. वैसे इस दिशा में हमारा कोई राज्य पहल कर भी चुका है. इससे मतदान के गिरते हुए प्रतिशत में सुधार होगा और मतदान में वे लोग भी रूचि लेंगे जो कि मतदान केंद्र तक जाने की जहमत नहीं उठा पाते हैं या फिर बहुत व्यस्त हैं या फिर कहीं और तैनात हैं. परिचय पत्र की त्रुटियों में सुधार भी जरूरी हो जाता है और उनका दुरूपयोग भी नहीं हो पायेगा. अभी तो अगर वोटर लिस्ट में कुछ वोट नहीं पड़े हैं तो उनके स्थान पर फर्जी वोट भी डलवा दिए जाते हैं . ऑनलाइन व्यवस्था में इस बात कि सम्भावना कम हो जाती है. आज नहीं तो कल इस व्यवस्था से हम लाभान्वित होंगे जरूर.

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