बासंती दोहा ग़ज़ल --बासंती दोहा ग़ज़ल
- वासंती दोहा गजल - आचार्य संजीव वर्मा ’सलिल’
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे या दहके अंगार..
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार..
महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..
नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
ऋतु बसंत में मन करे, मिल लें गले, खुमार..
ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार.
तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार..
घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार..
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सूरत-सीरत रख 'सलिल', निर्मल-विमल सँवार..
*******
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
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स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे या दहके अंगार..
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार..
महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..
नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
ऋतु बसंत में मन करे, मिल लें गले, खुमार..
ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार.
तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार..
घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार..
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सूरत-सीरत रख 'सलिल', निर्मल-विमल सँवार..
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