जावेद अख्तर फ़िल्मी दुनिया के एक चिर-परिचित शख्स है. हमारी पीढ़ी जावेद अख्तर के लिखे गीतों, फिल्मों को सुनकर और देखकर जवान हुई है. आज उनका जन्म दिन है. इस अवसर पर उनके ' तरकश ' ( नज़्मों और ग़ज़लों का संकलन ) से मेरे पसंदीदा तीर मुबारक दिवस पर पेश कर रहा हूं. आशा करता हूं कि आपको मेरे पसंदीदा ' तरकश ' के तीर पसंद आएंगे.
(1)
ख़ुशशक्ल१ भी है वो, ये अलग बात है, मगर
हमको ज़हीन२ लोग हमेशा अज़ीज़३ थे.
(2)
हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ दिल की गली में खेले थे.
इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आंसुओं के रेले थे.
थीं सजी हसरतें४दूकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे.
ख़ुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे.
ज़हनों-दिल आज भूखे मरते हैं
उन दिनों हमने फ़ाके झेले थे.
(3)
सूखी टहनी तनहा चिड़िया फीका चांद
आंखों के सहरा५ में एक नमी का चांद.
उस माथे को चूमे कितने दिन बीते
जिस माथे की खातिर था इक टीका चांद.
पहले तू लगती थी कितनी बेगाना
कितनी मुब्हम६होता है पहली का चांद.
कम हो कैसे इन खुशियों से तेरा ग़म
लहरों में कब बहता है नद्दी का चांद.
आओ अब हम इसके भी टुकड़े कर लें
ढाका, रावलपिंडी और दिल्ली का चांद.
(4)
अपनी वजहे-बरबादी सुनिए तो मज़े की
ज़िंदगी से यूं खेले जैसे दूसरे की है.
(5)
ग़म होते हैं जहां ज़हानत होती है
दुनिया में हर शय७ की कीमत होती है.
अक्सर वो कहते हैं वो बस मेरे हैं
अकसर क्यों कहते हैं हैरत होती है.
तब हम दोनों वक्त चुराकर लाते थे
अब मिलते हैं जब फ़ुरसत होती है.
अपनी महबूबा में अपनी मां देखें
बिन मां के लड़कों की फ़ितरत८ होती है.
इक कश्ती में एक क़दम ही रखते हैं
कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है.
(6)
इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं.
(7)
मुझको यकीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चांद में परियां रहती थीं.
एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाखें बोझ हमारा सहती थीं.
एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं
एक वो दिन जब ' आओ खेलें ' सारी गलियां कहती थीं.
एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझिल रहती थीं.
एक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी९ की बातें हैं
एक वो दिन जब दिल में भोली-भाली बातें रहती थीं.
एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आंसू का
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं.
एक ये घर जिस घर में मेरा साज़ो-सामां१० रहता है
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं.
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१. अच्छी सूरतवाले. २. समझदार. ३. प्यारे. ४. इच्छाएं. ५. वीराना. ६. धुंधला. ७. चीज़. ८. प्रकृति. ९. चालाकी. १०. तामझाम.
आज साहित्य की दुनिया के एक अमृत शिक्षाशास्त्री, प्रशासक, चिन्तक-विचारक, साहित्यकार, भाषाविद, सम्पादक आचार्य पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का जन्म दिवस है.साहित्य के इस अमृत पुत्र के बारे में संभवतः सभी लोग जानते होंगे. मिश्रजी के बारे में उनके वरिष्ठ, कनिष्ठ और सहोदर क्या सोचते थे. उन्हीं कुछ लोगों की स्मृतियों को यहाँ प्रस्तुत कर उनके जन्मदिवस पर उनको अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं.
विद्या ने जिसमें किया निवास
वरदपुत्र वह वरदा का था.
पंडित प्रवर विद्यानिवास,
अर्जक विद्वत जन-विश्वास.
वाणी के हे वरद पुत्र तुम!
दिव्य लोक में हुए मगन.
तेरी सेवा में अर्पित,
ये श्रद्धा के मेरे पुनीत सुमन.( कन्हैयालाल पाण्डेय " रमेश ")
पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का जीवन-वृत्त
पूरा नाम- विद्यानिवास मिश्र
माता का नाम- श्रीमती गौरी देवी
पिता का नाम- पंडित प्रसिद्ध नारायण मिश्र
जन्म- १४ जनवरी, १९२६
जन्म स्थान- पकड़डीहा, गोरखपुर ( उ. प्र.)
प्राथमिक शिक्षा- बिसुनपूरा प्राथमिक विद्यालय, गोरखपुर
माध्यमिक शिक्षा- गोरखपुर
उच्च शिक्षा- इलाहाबाद, वाराणसी
सेवा की शुरुआत
१. १९४६ से १९४८ तक- साहित्य सम्मलेन प्रयाग और आकाशवाणी इलाहाबाद.
२. १९४८ से १९५० तक- महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साथ हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश के लिए कार्य.
३. १९५१ से १९५२ तक- सूचना अधिकारी, विन्ध्य प्रदेश.
४.१९५४ से १९५६ तक- उत्तर प्रदेश सरकार में सूचना निदेशक.
५. १९५७ से १९६७ तक- संस्कृत विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर एवं रीडर.
६. १९६० से १९६१ एवं १९६७ से १९६८ तक- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अथिति प्रोफ़ेसर.
७. १९६८ से १९७६ तक- सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक भाषा एवं भाषा विभाग में प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष.
८. १९७७ से १९८५ तक- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी संस्थान, आगरा में निदेशक.
९. १९८५ से १९८६ तक- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अतिथि प्रवक्ता.
१०. १९८६ से १९८९ तक- काशी विद्यापीठ के कुलपति.
११. १९९० से १९९२ तक- संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति.
१२. १९९२ से १९९४ तक- प्रधान सम्पादक, ' नव भारत टाइम्स '
१३. अगस्त १९९५ से फरवरी २००५ तक- प्रधान सम्पादक, ' साहित्य अमृत '.
१४. १९९९ से २००३ तक- प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य.
१५. २००१ से २००४ तक- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के न्यासी.
१६. २८ अगस्त २००३- भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत.
१७. आजन्म न्यासी- भारतीय ज्ञानपीठ एवं वत्सल निधि.
१८. कुलाधिपति- हिन्दी विद्यापीठ, देवघर ( झारखण्ड ).
अलंकरण-सम्मान-पुरस्कार
१. १९८७- मूर्ति देवी पुरस्कार.
२. १९८८- पदम् श्री.
३. १९९६- विश्व भारती सम्मान.
४. १९९६- साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता.
५. १९९७- शंकर सम्मान.
६. १९९७-भारत भारती.
७. १९९८- पद्म भूषण.
८. २००१- मंगला प्रसाद पारितोषिक.
प्रयाण- १४ फरवरी, २००५.
यादों के झरोखों से
" प्रत्येक मार्ग के किनारों पर वृक्ष हैं और हर मार्ग में पथिक उनका आश्रय लेते हैं, किन्तु ऐसा वृक्ष बिरला ही होता है जिसका स्मरण घर पहुंचकर भी पथिक कृतज्ञता से करता है. मेरे मित्र और गुरु भाई विद्यानिवास मिश्र ऐसे ही लाखों में एक वृक्ष थे जिनको साहित्य का संसार और समुदाय कई पीढ़ियों तक स्मरण करेगा. ' छान्दोग्योपनिषद ' में एक सार्थक मन्त्र-वाक्य है- ' स्मरोववकाशाद्ध भूयः '. अर्थात स्मरण आकाश से भी उत्कृष्ट है. ' साहित्य अमृत ' के प्रत्येक अंक और पृष्ठ पर उनकी स्मृति अंकित रहेगी."...लक्ष्मीमल्ल सिंघवी.
"बहुत कम लोगों का नाम इतना सार्थक होता है जितना सार्थक पं. विद्यानिवास मिश्र का था. विद्या सचमुच उनमें निवास करती थी. आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता था उनके ज्ञान को देखकर. वह जितना विस्तृत था उतना ही गहरा भी था. वेदों से प्रारंभ कर आधुनिक कविता तक, पाणिनीय व्याकरण से लेकर पश्चिमी भाषा विज्ञान तक, लोकजीवन की मार्मिक अंतर्दृष्टि-सम्पन्नता से लेकर गहन शास्त्र-विचारणा तक उनकी सहज गति थी. जिस त्वरित गति से उनकी लेखनी चलती थी, उसी वेग से उनकी वाणी भी अमृत बरसाती थी."...विष्णुकांत शास्त्री.
" एक दिन बातों-ही-बैटन में भारती जी को याद करके मैं काफी बिलबिला कर रो पड़ी. पहले तो प्यार से समझाते रहे पर रोना रुक नहीं पा रहा था तो ज़रा कड़े स्वर में डांटते हुए बोले, " अब बस एकदम चुप हो जाओ और सुनो, तुम्हें एक कथा सुनाते हैं, ध्यान से सुनो. और उन्होंने बताया कि एक बार राधा के मन में आया कि मथुरा जाकर कान्हा को देख आएं. संदेशा भेज दिया. अब महाराज कृष्ण की तो सिट्टी-पिट्टी गुम! कहीं कुछ ऐसा ना हो जाए कि राधा किसी बात से आहत हो जाएं, यहां कृष्ण उन्हें मना भी तो नहीं सकेंगे, बहुत सोच-समझकर उन्होंने स्वयं रुक्मिणी को पूरा जिम्मा दे दिया और कहा, आप स्वयं अपनी देखरेख में राधा के सम्मान और सुविधा का ख्याल रखिएगा, कहीं कोई कोर-कसर न रहने पाए. राधा आईं. रुक्मिणी ने सोचा, ग्वालन हैं, दूध-दही से ही उनका स्वागत होना चाहिए, सो उन्होंने स्वयं अपनी देखरेख में दूध को खूब औखवाया और लाल-लाल सोंधा-सोंधा खूब मलाईदार गरम-गरम दूध स्वयं उनको देने गईं. राधा ने भी उनका मान रखा और एकदम तत्ता गरम दूध एक सांस में पी गईं. सारे दिन खूब गहमागहमी रही. रात को राधा लौट गईं तब थके-मांदे कृष्ण अपने शयन कक्ष में गए. हमेशा की तरह रुक्मिणी उनके पाँव दबाने लगीं. पाँव दबाते जब वह तलवों के पास आईं तो कृष्ण ने अपने पाँव खींच लिए. रुक्मिणी ने सोचा, आखिर ऐसा मैंने क्या कर दिया ये यों नाराजगी दिखा रहे हैं. पूछने पर पता चला कि नाराजगी की बात नहीं है, बात यह है कि कृष्ण के पैरों में तलवों में चाले पड़े हैं, दबाने पर दर्द होगा. चाले कैसे पद गए ? पूछने पर पता चला कि राधा के हृदय में इन पैरों का अहर्निश निवास रहता है, दूध इतना गरम था कि एक सांस में पीने पर राधा की छाती जलने लगी और उन तलवों पर चाले पद गए.......कथा सुनाकर पंडित जी बोले "हम क्या जानते नहीं हैं कि कितनी प्राणप्रिया रही हो तुम भारती की. तुम रोओगी तो तुम्हारे इन आंसुओं में डूबकर उसकी आत्मा कितनी छटपटाएगी, इसका कुछ अंदाज़ है तुम्हें! खबरदार यों रो-रोकर भारती को कष्ट पहुंचाने का कोई हक़ नहीं है तुम्हें! " फिर बड़े दुलार से सर पर हाथ फेरकर बोले, " पगली! जनता हूं कि गीली लकड़ी की तरह धुंधुआती हुई नहीं जल रही हो. तुम तो दीए की बत्ती की तरह जल रही हो, जिसकी उजास में भारती की कीर्ति और उजली होकर चमक रही है. भारती की स्मृति संवर्धन के जिस काम में तुमने खुद को खपा दिया है, रोना-धोना छोड़कर उसी काम में लगी रहो. काम में ही अवसाद और विषाद, दोनों बिसरते हैं."...पुष्पा भारती.
" जब " साहित्य अमृत " पत्रिका निकलनी शुरू हुई तो विद्यानिवास जी रचना के लिए स्वयं फोन करते थे. उनकी बात को न मानना मेरे लिए मुश्किल था. इसलिए हमेशा मेरी रचनाएं विशेषांक में मौजूद होतीं. उनके स्वर्गवासी हो जाने का जहां मलाल था वहीं यह अहसास भी कि अब कोई फोन पर नहीं कहेगा-' नासिरा अपनी कहानी भेजो...अंक रुका हुआ है. "...नासिरा शर्मा.
"भोजपुरी संस्कार गीतों में बेटी की विदाई के कुछ गीत जितने मर्मस्पर्शी हैं उतने ही अर्थवान भी. उन्हें ठीक से परखा और संजोया जाए तो वे विश्व-साहित्य की अनमोल निधि बनने का सामर्थ्य रखते है.
पंडित जी का अत्यंत प्रिय विदाई गीत था-----
बाबा, निमिया के डाल जनि काटहू
बाबा, निमिया चिरइया बसेर
डाल जनि काटहू...!
आगे की पंक्तियाँ उन्हें बिसर गईं थीं, पास बैठी अम्मा ने उस गीत को पूरा किया था-----
बाबा, सबेरे चिरइया उड़ी जइहैं,
रहि जइहैं निमिया अकेलि
डाल जनि काटहू
बाबा, बिटिया दुःख जनि देहू
बाबा, सबेरे बिटिया जइहैं सासुर
रहि जइहैं माई अकेलि
बिटिया दुःख जनि देहू.
मेरे बाबा, नीम की डाल मत काटना. उस पर चिड़ियों का बसेरा है. डाल कटेगी, चिड़िया उड़ जाएंगी, नीम अकेली रह जाएगी.
मेरे बाबा, बिटिया को कभी दुःख मत देना. बेटी ससुराल जायेगी, माई अकेली रह जाएगी.
पंडित जी का वह रूप मेरी आत्मा में भोजपुरिया पिता के नेह-छोह की अमिट निशानी बनकर सुरक्षित है."...रीता शुक्ल
मानिक मोर हेरइलें
" भोजपुरी में लिखे के मन बहुते बनवलीं त एकाध कविता लिखलीं, एसे अधिक ना लिखी पवलीं. कारन सोचीलें त लागेला जे का लिखीं, लिखले में कुछ रखलो बा! आ फेरो कइसे लिखीं ? मन से न लिखल जाला ! आ मन-मानिक होखो चाहे ना होखो- हेरइले रहेला, बेमन से लिखले में कवनों रस नइखे. घरउवां चइता के बोल: " जमुना के मटिया; मानिक मोर हेरइलें हो रामा...! हमार घूंघुची अइसन मन बेमन से पहिरावल फूलन के माला में हेरात रहेला. जवन ना चाहि लें तवन करे के परेला लोगन के मन राखे खातिर. जवन कइल चाहि लें तवना खातिर एक्को पल केहू छोड़े देबे के तइयार नाहीं. लोक के चिंता जीव मारत रहेला. मनई जेतने लोक क होखल चाहेला, लोक ओतने ओके लिलले जाला. चल चारा पवलीं नाहीं; बड़ा नरम चारा बा. एह लोक के कोसे चलीलें त एक मन बादा ताना मारेला--ए बाबू ! तुहीं त एके सहकवल, अब काहें झंखत हव ! बतिया ओहू सही बा--सहकावल त हमरे ह, लोक-लोक हमहीं अनसाइल कईलीं. देखीलें लोक केहू क होला नाहीं, जेतना ले ला ओकर टुकड़ो नाहीं देला. निराला जी के गीत बा ' व देती थी. सबके दांव बंधु', हाम्रो जिनगी सबके दानवे दिहले में सेरा अ गइलि, हमार दांव केहू देई, ई एह जनम में त होखे वाला नाहीं बा !"...( 'गिर रहा है आज पानी' से )
( साभार: स्मृति अंक, साहित्य अमृत, मार्च-अप्रैल,२००५ )
कानपुर,( मेआसु ). लाला लाजपत राय अस्पताल में कार्यरत डाक्टर नीना मोहन रायजादा ने छह दिसम्बर को महिला थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि पति डाक्टर मनीष मोहन, सास, ससुर मदन मोहन सक्सेना और ननद डाक्टर ज्योत्सना मोहन व रश्मि सक्सेना ( दोनों बहनें शादी शुदा हैं और बच्चों के साथ मायके में ही रह रही हैं ) ने उसे बुरी तरह से पीटकर भ्रूण को नष्ट करने का प्रयास किया. भादंवि की धारा ४९८ ए, ३२३ और ३१६/५११ के तहत रिपोर्ट लिखी गई. इस रिपोर्ट में पीड़िता ने कहा कि उनके गर्भ में करीब सात हफ़्ते का भ्रूण है जो टेस्ट ट्यूब बेबी है. इस बेबी के लिए उन्होंने छह लाख रुपए खर्च किए हैं जिसमें पति ने एक रुपए नहीं दिए. दहेज़ की मांग पूरी नहीं होने पर सास ससुर, पति व ननदों ने बीते नौ नवम्बर और फिर पंद्रह नवम्बर को उसे बुरी तरह पीटा जिससे रक्तस्राव होने लगा और भ्रूण नष्ट होते-होते बचा. इससे पहले भी ससुरालवालों ने उन्हें पीटकर तीन माह के गर्भस्थ शिशु की जान ले ली थी. दो साल पहले उन्होंने तलाक का मुकदमा भी दाखिल किया था जो अदालत ने खारिज कर दिया था. उनकी शादी चार साल पहले हुई थी. उसी के बाद ससुरालवालों के जुल्म और बढ़ गए थे. महिला थानाध्यक्ष की आगुवाई वाली टीम ने सोमवार(११-०१-१०) को डा. मनीष मोहन को घर से गिरफ़्तार कर लिया. ताजा घटनाक्रम के बाद आरोपी ससुरालीजन भूमिगत भूमिगत हो गए. पुलिस ने मुख्य आरोपी को कोर्ट में पेश किया जहां से उन्हें चौदह दिन की न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया.
घटना-दो
दहेज़ लोभियों ने वधू को जलाया, हालत गंभीर
कानपुर, ( मेआसु ). बच्चा न होने तथा दहेज़ की मांग पूरी न होने पर चकेरी क्षेत्र में एक महिला को उसके ससुरालवालों ने जला दिया और फरार हो गए. मकर संक्रांति पर खिचड़ी देने पहुंचे भाई को मामले की जानकारी हुई. महिला को शहर के उर्सला अस्पताल में भारती कराया गया है. हालात गंभीर बनी हुई.
छोटी गुटैया स्वरुप नगर निवासी चंदू प्रसाद यादव ने अपनी पुत्री उमा ( ३२ वर्ष ) की शादी चार साल पहले श्याम नगर नटियन चकेरी निवासी कार चालक राजेन्द्र यादव के साथ की थी.सोमवार ( ११-०१-१० ) सुबह उमा का छोटा भाई सुनील मकर संक्रांति पर खिचड़ी देने बहन की ससुराल पहुंचा. सुनील ने जब मुख्य द्वार खटखटाया तो वह अपनेआप खुल गया. अन्दर पहुंचने पर सुनील को जब कोई दिखाई नहीं दिया तो वह छत पर बने कमरे में गया. कमरे में कदम रखते ही सुनील की चीख निकल पड़ी. बहन उमा जली अवस्था में अचेत पड़ी थी. सुनील ने शोर मचाकर पड़ोसियों को एकत्र किया और उनकी मदद से बहन उमा को उर्सला अस्पताल में भारती कराया. उमा के परिजनों ने ससुरालवालों के खिलाफ़ चकेरी थाने में तहरीर दी है. सुनील ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही उमा के ससुरालवाले दहेज़ में तीस हज़ार रुपए और मांग कर रहे थे. मांग पूरी न होने पर उमा का उत्पीड़न करने लगे. शादी के दो साल बीत जाने पर ससुरालवाले उसे बच्चा न होने का ताना भी देने लगे और मारपीट करने लगे. पति राजेन्द्र दूसरी शादी की धमकी भी देने लगा. सुनील का आरोप है कि दहेज़ और बच्चे के लिए उसकी बहन उमा को ससुरालवालों ने मिट्टी का तेल डालकर जाला दिया.
( स्रोत: राष्ट्रीय सहारा,१२-०१-१० )
आज राष्ट्रीय युवा दिवस है. स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिन है. भारत सरकार ने आज के दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने कि घोषणा की है. उपरोक्त दोनों घटनाओं के मुख आरोपी युवा जगत से ताल्लुक रखते हैं. बढ़ते भौतिकवाद, बाजारवाद और वैश्वीकरण के सबसे ज्यादा शिकार युवा जगत ही है. जिस मुल्क की सत्तर प्रतिशत से ज्यादा आबादी युवा है, उस मुल्क की बहन, बेटियां सुरक्षित नहीं है. यह एक विचारणीय मुद्दा है. सिर्फ सांस्कृतिक आयोजनों से राष्ट्रीय युवा दिवस की सार्थकता सिद्ध नहीं होगी.
कहीं किसी की बेटी जला दी जाती है, कहीं किसी की बहन के साथ बलात्कार होता है. राह चलते लड़कियों पर अभद्र शब्द-बाण चलाए जाते है. इन सब बुरी हरकतों में भारत के उसी सत्तर फीसदी युवा पीढ़ी के नुमाइंदे लिप्त होते हैं. फिर कैसे मनाएं हम राष्ट्रीय युवा दिवस ? काहे का राष्ट्रीय युवा दिवस ? यह तो सरासर स्वामी विवेकानंद के उसूलों के साथ बलात्कार होगा. उनकी छवि धुल धूसरित होगी.
उपरोक्त दोनों घटनाओं को प्रस्तुत करने का मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि ऐसी घटित होने वाली घटनाओं में प्रमुख भूमिका युवाओं की ही होती है. युवाओं को अपनी भूमिका का नए सिरे से मूल्यांकन करना होगा. ये आग वो आग है जो मुद्दतों से हमारे परिवार और समाज को जलाती आ रही है. ये आग कब बुझेगी....?? इस सवाल का जवाब हम राष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर ढूंढ सके तो उचित होगा. सही मायनों में तभी विवेकानंद जयंती अपने राष्ट्रीय युवा दिवस की सार्थकता को सिद्ध कर पाएगी. हम सत्तर फीसदी से अधिक भारतीय युवा आज मिलकर ये शपथ लें कि भविष्य में किसी की बहन, बेटी और माँ दहेज़ और बच्चे के लिए आग में न जलने पाए.
अंत में भारत के नौजवानों का आह्वान करती मेरी ये ग़ज़ल....
२१वीं सदी के आखिरी दशक की आखिरी शाम. ये साल बहुतों के लिए बहुत अच्छा रहा होगा तो बहुतों के लिए बहुत बुरा. कुछ लोगों के लिए ये साल मिलाजुला रहा होगा. सभी अपने - अपने तरीके से बीत रहे साल २००९ का मूल्यांकन कर रहे हैं. भारत का आम आदमी इस साल जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है उनमें क्रमशः महंगाई, मंदी, महामारी, बेरोज़गारी, अव्यवस्था आदि.
आज मैंने भी इस गुजर रहे साल का अपने तरीके से मूल्यांकन करने बैठा तो विचार गद्द की जगह पद्द के रूप में निकल पड़े. इन्हीं विचारों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ........
ऑल इंडिया ब्लॉगर्स एसोसियेशन ALL INDIA BLOGGERS' ASSOCIATION
ब्लॉगर्स बन्धुवों !
आप सभी को हर्ष और बधाई के साथ यह सूचना देना चाहता हूँ कि LBA अपनी सफलता के उस मुक़ाम तक आ चुका है कि इसकी सदस्यता संख्या अपने चरण तक पहुँच चुकी है और जो ब्लॉगर्स बन्धु इससे जुड़ने की इच्छा रख रहे हैं और जिनके मेल मुझे मिल रहे हैं उसको मद्देनज़र रखते हुए नयी सदस्यता के इच्छुक ब्लॉगर्स को एक और भी शक्तिशाली और नया मंच का गठन आज किया जा रहा है जिसका नाम है 'ऑल इंडिया ब्लॉगर्स असोसिएशन' अर्थात AIBA ! इस मंच का हिस्सा सभी भारतीय बन सकते है, फ़िर चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहें हों !!!