डा श्याम गुप्त का गीत --मधु कल्पना हो ....
तुम ख्यालों की मेरी मधु कल्पना हो।
तुम सवालों से सजी नव अल्पना हो।
रंग तुम हो तूलिका के,
काव्य का हर अंग हो।
काव्य स्फुरणा से तुम,
मन में उठी तरंग हो।
तुम रचयिता मन की,
सुन्दर औ सुखद सी प्रेरणा ।
तुम हो रचना धर्मिता,
रस भाव की उत्प्रेरणा ।
काव्य भावों से भरे, शुचि-
ज्ञान की तुम व्यंजना।
मन बसी सुख स्वप्न सी,
भावुक क्षणों की संजना ।
तुम चलो तो चल पढ़े संसार का क्रम।
तुम रुको थम जाय सारा विश्व उपक्रम।
तुम सवालों से सजी मन- अल्पना हो ।
तुम ख्यालों की मेरी मधु कल्पना हो ॥
जलज दल पलकें उठालो,
नित नवीन विहान हो।
तुम अगर पलकें झुकाओ,
दिवस का अवसान हो।
तुम सृजन की भावना,
इस मन की अर्चन वन्दना।
तुम ही मेरा काव्य सुर हो,
तृषित मन की रंजना।
तुम ज़रा सा मुस्कुरालो ,
मुस्कुराए ये जहां ।
तुम ज़रा सा गुनगुनालो,
खिलखिलाए ये जहां ।
तुम बनालो मीत तो खिलजाय तन मन।
तुम छिटक दो हाथ हो ये विश्व अनमन ।
तुम ख्यालों की मेरी मधु कल्पना हो।
नित सवालों से सजी नव अल्पना हो ॥
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तुम सवालों से सजी नव अल्पना हो।
रंग तुम हो तूलिका के,
काव्य का हर अंग हो।
काव्य स्फुरणा से तुम,
मन में उठी तरंग हो।
तुम रचयिता मन की,
सुन्दर औ सुखद सी प्रेरणा ।
तुम हो रचना धर्मिता,
रस भाव की उत्प्रेरणा ।
काव्य भावों से भरे, शुचि-
ज्ञान की तुम व्यंजना।
मन बसी सुख स्वप्न सी,
भावुक क्षणों की संजना ।
तुम चलो तो चल पढ़े संसार का क्रम।
तुम रुको थम जाय सारा विश्व उपक्रम।
तुम सवालों से सजी मन- अल्पना हो ।
तुम ख्यालों की मेरी मधु कल्पना हो ॥
जलज दल पलकें उठालो,
नित नवीन विहान हो।
तुम अगर पलकें झुकाओ,
दिवस का अवसान हो।
तुम सृजन की भावना,
इस मन की अर्चन वन्दना।
तुम ही मेरा काव्य सुर हो,
तृषित मन की रंजना।
तुम ज़रा सा मुस्कुरालो ,
मुस्कुराए ये जहां ।
तुम ज़रा सा गुनगुनालो,
खिलखिलाए ये जहां ।
तुम बनालो मीत तो खिलजाय तन मन।
तुम छिटक दो हाथ हो ये विश्व अनमन ।
तुम ख्यालों की मेरी मधु कल्पना हो।
नित सवालों से सजी नव अल्पना हो ॥

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