डा श्याम गुप्त की कविता--अपन-तुपन...
अपन-तुपन
( डा श्याम गुप्त )
मेरे रूठकर चले आनेपर,
पीछे -पीछे आकर ;
'चलो अपन- तुपन खेलेंगे '
माँ के सामने यह कहकर-
हाथ पकड़कर ,
आंखों मैं आंसू भरकर
तुम मना ही लेतीं थी , मुझे-
इस अमोघ अस्त्र से ,
बार- बार , हर बार;
सारा क्रोध ,गिले- शिकवे
काफूर होजाते थे ,और-
बाहों मैं बाहें डाले ,
फ़िर चलदेते थे ,खेलने-
हम-तुम ,
अपन- तुपन।
----सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२।
मो-०९४१५१५६४६४.
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( डा श्याम गुप्त )
मेरे रूठकर चले आनेपर,
पीछे -पीछे आकर ;
'चलो अपन- तुपन खेलेंगे '
माँ के सामने यह कहकर-
हाथ पकड़कर ,
आंखों मैं आंसू भरकर
तुम मना ही लेतीं थी , मुझे-
इस अमोघ अस्त्र से ,
बार- बार , हर बार;
सारा क्रोध ,गिले- शिकवे
काफूर होजाते थे ,और-
बाहों मैं बाहें डाले ,
फ़िर चलदेते थे ,खेलने-
हम-तुम ,
अपन- तुपन।
----सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२।
मो-०९४१५१५६४६४.

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